तस्वीर देखकर लिखी हुई एक रचना
मनोभावों को विस्तार देने वाली एक अद्भुत कृति।
भूमिका
यह काव्य रचना प्रेम को किसी आकर्षण या क्षणिक भाव नहीं, बल्कि जीवन की दीर्घ यात्रा में साथ निभाने वाले अपनत्व के रूप में देखती है। यहाँ इश्क़ का अर्थ बाहरी सौंदर्य, यौवन या शब्दों की चमक से नहीं, बल्कि उस सहज स्पर्श से है जो उम्र के हर पड़ाव पर सहारा बनता है। कांपते हाथों को थाम लेने की संवेदना, सफ़ेद बालों में स्नेह से हाथ फेरने की सरलता, धीमी होती चाल के साथ धैर्यपूर्वक चलने की तत्परता—ये सब मिलकर उस गहरे अपनत्व की पहचान बनते हैं, जिसे कवयित्री इश्क का वास्तविक रूप मानती हैं।
इस रचना का मूल भाव यह है कि सच्चा प्रेम समय के साथ कम नहीं होता, बल्कि अधिक आत्मीय और शांत हो जाता है। बाहरी परिवर्तन, झुर्रियाँ, कमज़ोर होती देह या धीमी पड़ती इंद्रियाँ प्रेम की ऊष्मा को कम नहीं करतीं; बल्कि अपनत्व की गहराई को और स्पष्ट कर देती हैं। यहाँ इश्क किसी घोषणा का विषय नहीं, बल्कि अनुभव का विस्तार है—एक ऐसी मौन अनुभूति जो देखभाल, धैर्य और निरंतर साथ में प्रकट होती है।
कवयित्री यह संकेत करती हैं कि सच्चा इश्क़ शब्दों से अधिक व्यवहार में बसता है। यह किताबों, शायरी या परिभाषाओं में सीमित नहीं होता, बल्कि रिश्तों की सादगी और आत्मीयता में जीवित रहता है। इसलिए इस रचना के केंद्र में “अपनत्व का नाम ही इश्क है” का भाव स्वाभाविक रूप से उभरता है—जहाँ प्रेम का सबसे प्रामाणिक रूप वही है जो बिना आडंबर, बिना प्रदर्शन, केवल महसूस किया जाता है और जीवन के हर दौर में सहारे की तरह साथ बना रहता है।
तस्वीर देखकर लिखी हुई एक रचना
उम्र के हर दौर में जो चाहें
कांपते हाथों को भी थामें
बालो की सफेदी में भी हाथ फिराएं
झुकी कमर भी जब बलखाये
तो समझना कि वो इश्क है
चश्में वाली आंखे भी जब गहरी हो
झाइयां भी जब लगे सुनहरी हो
ऊंचा सुनने पर कोई प्यार से बतियाये
कदमों की चाल तेरे लिए धीमी हो जाएं
समझ लेना वो इश्क़ ही है
कशिश जब संध्या तक बनी रहे
बेताबी जब आखिरी बेला में भी हो
कांपते हाथ भी रोमांचित कर दे
झुर्री वाला चेहरा भी पुलकित कर दे
यकीनन वो इश्क ही है
ये इश्क जनाब किताबों में नही मिलता
शेरों शायरी में भी नहीं दिखता
कोई इसे लिख ही नहीं सकता
ये तो बस रूह ही महसूस कर सकता
महसूस करने का नाम है इश्क।
रचनाकार
प्रमिला त्रिवेदी

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें