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होली संबंधी आत्मकथ्य

कवयित्री पूनम जैन अग्रवाल ‘चाँदनी’ का आत्मकथ्य

आज का दिन मेरे लिए केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि एक अनुभूति था। बसंत लाफिंग क्लब की महिला सदस्यों के साथ तिलक होली मनाने का सौभाग्य मिला और मन सचमुच रंगों से भी अधिक भावनाओं से भर उठा।

होली का नाम लेते ही रंग, पानी और उल्लास की छवियाँ मन में उभरती हैं, परंतु आज हमने इस पर्व को एक नई चेतना के साथ जिया। हमने तय किया कि प्रकृति को क्षति पहुँचाए बिना, केवल गुलाल और तिलक के माध्यम से प्रेम का रंग एक-दूसरे के माथे पर सजाएँगे। जब पहली बार मेरे माथे पर स्नेह का तिलक लगा, तो लगा मानो यह केवल रंग नहीं, अपनत्व का आशीर्वाद है।

सामूहिक हास्य योग के साथ जब वातावरण गूँजा, तो लगा जैसे मन के भीतर की सारी थकान और उदासी पिघल गई हो। फूलों की कोमलता और तिलक की गरिमा ने इस होली को एक आध्यात्मिक स्पर्श दे दिया। पारंपरिक गीतों पर जब सभी बहनें थिरकीं, तो लगा जैसे हमारी संस्कृति स्वयं मुस्कुरा रही हो।

मुझे भी अपने स्वरचित होली गीत प्रस्तुत करने का अवसर मिला।

 
अमर उजाला मेरठ संस्करण से साभार

 
पूनम जी की हस्तरचित कविता
जब मैंने अपने शब्दों को सुरों में ढालकर सबके सामने रखा, तो श्रोताओं की आँखों में जो चमक थी, वह मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान था। मेरे गीत में प्रेम, सद्भाव और प्रकृति संरक्षण का संदेश था, और यह देखकर हर्ष हुआ कि सभी ने उसे आत्मसात किया।

हम सबका उद्देश्य स्पष्ट था — अपनी परंपराओं को सहेजते हुए पर्यावरण के प्रति जागरूक रहना। सादगी में भी कितनी गरिमा और आनंद हो सकता है, यह आज अनुभव किया। तिलक होली ने हमें याद दिलाया कि उत्सव का असली रंग हृदयों के मिलन में है, न कि बाहरी आडंबर में।

कार्यक्रम के अंत में जब हमने एक-दूसरे को गुलाल का तिलक लगाकर शुभकामनाएँ दीं, तो लगा जैसे हर माथे पर प्रेम का एक दीप जल उठा हो।

आज की यह होली मेरे लिए स्मृतियों का उजला पृष्ठ बन गई है — जहाँ रंग कम थे, पर भावनाएँ अनंत थीं।

झलकियाँ 








 

सूचना स्रोत 
 
दक्षा जोशी 'निर्झरा' 
स्थानीय सम्पादिका 
उलझन सुलझन, लेडीज विंग 
अहमदाबाद (गुजरात) 
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 










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