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शिक्षक, समाजसेवी और संवेदनशील कर्मयोगी हैं देवेन्द्र जी

भूमिका

झुग्गियों के संकरे रास्तों में जब शिक्षा का उजाला पहुँचता है, तो वह केवल किताबों का नहीं, बल्कि उम्मीदों का विस्तार होता है। ऐसे ही उजाले का नाम हैं डॉ. देवेंद्र कुमार नागर—शिक्षक, समाजसेवी और संवेदनशील कर्मयोगी। दिल्ली में रहते हुए उन्होंने झुग्गी क्षेत्रों के बच्चों को न केवल शिक्षा से जोड़ा, बल्कि उनके स्वास्थ्य, आत्मसम्मान और भविष्य की ज़रूरतों को भी अपनी कार्ययोजना का हिस्सा बनाया। ‘उम्मीद’ संस्था के माध्यम से निःशुल्क शिक्षण, पुस्तक बैंक, कृत्रिम अंग वितरण, मेडिकल कैंप और आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराना—ये सभी प्रयास उनके उस विश्वास को साकार करते हैं कि शिक्षा पर सबका समान अधिकार है*

। प्रस्तुत साक्षात्कार में डॉ. नागर के इन्हीं विचारों, अनुभवों और कौशलों को प्रश्नोत्तर के माध्यम से समझने का प्रयास किया गया है।

प्रश्न 1: डॉ. नागर, झुग्गी में रहने वाले बच्चों के लिए काम करने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?

उत्तर: "मैंने बहुत पास से देखा है कि प्रतिभा गरीबी नहीं देखती, लेकिन अवसर अक्सर दूरी बना लेते हैं। झुग्गियों में रहने वाले बच्चों में सीखने की तीव्र इच्छा होती है, पर संसाधनों का अभाव उन्हें पीछे रोक देता है। यही असमानता मुझे भीतर से विचलित करती रही और यहीं से यह यात्रा शुरू हुई।"

प्रश्न २. आप पिछले आठ वर्षों से इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। इस दौरान सबसे बड़ी चुनौती क्या रही?

उत्तर: "सबसे बड़ी चुनौती भरोसा जीतना था—बच्चों का भी और उनके अभिभावकों का भी। जब तक वे यह न समझें कि शिक्षा वास्तव में उनके जीवन को बदल सकती है, तब तक काम आगे नहीं बढ़ता। धीरे-धीरे संवाद, निरंतरता और निस्वार्थता से यह भरोसा बना।"

प्रश्न ३. ‘उम्मीद’ संस्था की स्थापना के पीछे आपकी मूल सोच क्या थी?

उत्तर: " 'उम्मीद’ मेरे लिए एक शब्द नहीं, बल्कि एक भाव है। मैंने चाहा कि एक ऐसा मंच बने जहाँ शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रहे, बल्कि जीवनोपयोगी बने। संस्था के माध्यम से हम शिक्षा, स्वास्थ्य और मानवीय गरिमा—तीनों पर एक साथ काम कर रहे हैं।"

प्रश्न ४. आप निःशुल्क शिक्षा सामग्री भी उपलब्ध कराते हैं। इसका प्रभाव कैसे देखते हैं?**

उत्तर: "जब बच्चे अपनी किताबें खुद की समझते हैं, तो उनमें आत्मविश्वास आता है। निःशुल्क सामग्री केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि यह संदेश भी है कि *तुम्हारी पढ़ाई हमारे लिए महत्त्वपूर्ण है।"

प्रश्न ५. हाल ही में आपने पुस्तक बैंक की शुरुआत भी की है। इसका उद्देश्य क्या है?

उत्तर: "पुस्तक बैंक का उद्देश्य यह है कि कोई भी बच्चा केवल इसलिए न पढ़ पाए क्योंकि उसके पास किताब नहीं है। एक किताब कई हाथों तक पहुँचे—यह संसाधनों का मानवीय पुनर्चक्रण है। इससे पढ़ने की संस्कृति भी विकसित होती है।"

प्रश्न ६. शिक्षा के साथ आप स्वास्थ्य पर भी विशेष ध्यान देते हैं। यह विचार कैसे जुड़ा?

उत्तर: "स्वस्थ शरीर के बिना स्वस्थ मस्तिष्क की कल्पना अधूरी है। कई बच्चे छोटी-छोटी स्वास्थ्य समस्याओं के कारण पढ़ाई छोड़ देते हैं। इसलिए निःशुल्क मेडिकल कैंप, परामर्श और आवश्यक सहायता को हमने अपने कार्य का अभिन्न हिस्सा बनाया।"

प्रश्न ७. कृत्रिम अंग वितरण जैसे कार्य शिक्षा से अलग लगते हैं, फिर भी आप इन्हें जोड़ते हैं—क्यों?

उत्तर: "मेरे लिए शिक्षा केवल अक्षर ज्ञान नहीं है। यदि कोई बच्चा या व्यक्ति शारीरिक अक्षमता के कारण पीछे रह जाता है, तो समाज की जिम्मेदारी बनती है कि उसे बराबरी पर लाया जाए। कृत्रिम अंग वितरण उसी समावेशी सोच का हिस्सा है।"

प्रश्न ८. इन सभी कार्यों के लिए संसाधन और सहयोग कैसे जुटाते हैं?

उत्तर: "बहुत कुछ समाज की संवेदनशीलता पर निर्भर करता है। जब लोग ईमानदार प्रयास देखते हैं, तो सहयोग अपने आप मिलने लगता है। कई लोग समय देते हैं, कोई सामग्री देता है, कोई मार्गदर्शन—यह सामूहिक प्रयास है।"

प्रश्न ९. आपको व्यक्तिगत रूप से सबसे अधिक संतोष किस क्षण में मिलता है?

उत्तर: "जब कोई बच्चा पहली बार आत्मविश्वास से कहता है—“सर, मैं भी कुछ बन सकता हूँ।” वही क्षण मेरी सारी थकान मिटा देता है।"

प्रश्न १०. आगे के लिए आपकी क्या योजनाएँ हैं?

उत्तर: "हम चाहते हैं कि यह मॉडल और क्षेत्रों तक पहुँचे। डिजिटल शिक्षा, कौशल विकास और अभिभावकों की जागरूकता पर भी काम करने की योजना है। लक्ष्य यही है कि शिक्षा किसी की पहुँच से बाहर न रहे।"

प्रश्न ११. अंत में, समाज और नीति-निर्माताओं के लिए आपका संदेश क्या है?

उत्तर: "यदि हम वास्तव में समान समाज चाहते हैं, तो शिक्षा को दया नहीं, अधिकार के रूप में देखना होगा। हर बच्चे में भविष्य छिपा है—ज़रूरत है तो बस उसे अवसर देने की।"

सूचना स्रोत 

 
                श्री देवेंद्र जी नागर
कल्पनाकार
 

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 



 







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