पुस्तक सृजन
पुस्तक विवरण
'देवमाली: आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक सरोकार' का संबंध अध्यात्म, भारतीय संस्कृति और विज्ञान से गहरा जुड़ा है। परम्पराओं, मान्यताओं के पीछे अध्यात्म और विज्ञान का मूल आधार होता है। समयानुकूल जिन संस्कारों का प्रादुर्भाव होता है, वह हमारे आंतरिक जीवन को समृद्ध बनाते है। संस्कृति, किसी समाज में व्याप्त गुणों का समग्र स्वरूप ही तो है। संस्कृति, मानसिकता की उन्नति को दर्शाती है। जिसके घटकों में कलात्मक अनुभव, दार्शनिक अंतर्दृष्टि, चरित्र, सद्गुण, और सभ्यता के मूल्य शामिल होते हैं।
अध्यात्म और विज्ञान, दोनों ही वास्तविक प्रकृति के पूर्ण रूप हैं। दोनों ही अनुभवजन्य साक्ष्य के साथ-साथ सांसारिकता की गहरी जिज्ञासा रखते हैं, जिससे छिपे हुए सत्य को उजागर करने की कोशिश की जाती है। कह सकते हैं कि अध्यात्म, मानव आत्मा, आत्म-अध्ययन, धार्मिकता और अनुभूति पर केंद्रित है। विज्ञान, प्रमाण और तथ्यों पर आधारित तरीके से जगत का अध्ययन करता है। अध्यात्म, चेतना और परमात्मा के नजरिए से जीवन और जगत को देखता है। वहीं विज्ञान रासायनिक प्रतिक्रियाओं के चलते जीवन घटित हुआ मानता है। अध्यात्म को आत्मा या आत्मा का विज्ञान भी कह सकते हैं। आध्यात्मिकता व्यक्तिपरक अनुभव और अंतर्ज्ञान पर ज्यादा केंद्रित होती है जबकि विज्ञान अनुभव जन्य साक्ष्य और प्रयोग पर ।
देवमाली अध्यात्म और समृद्ध सांस्कृतिक सरोकारों की जीवंत परम्पराओं की निर्वाहनता का सशक्त परिचायक है, जो विश्व में अन्यत्र दुर्लभ है। विष्णु अवतार भगवान श्री देवनारायण जी का अवतरण काल अध्यात्म, विज्ञान की अद्भुतता से धन्य है। जब हम अध्यात्म और विज्ञान को गूढ़ता से जान पाते है तब समझ पाते हैं कि अटूट विश्वास, श्रद्धा आस्था की जनक यही तो है। तभी प्राणवान परंपराएं उपजती हैं, जिनसे युगों का सूत्रपात होता है। पाखंड तो अज्ञानता के कोश से आता है।
देवमाली के सांस्कृतिक सरोकार स्पष्ट करते हैं कि श्री देवनारायण जी के अवतरण काल में स्थापित सामाजिक मूल्य मानवीय सर्वेदनाओं से समृद्ध रहे। प्राकृतिक संपदा का संरक्षण संवर्धन लोक कल्याण हेतु हुआ। अन्य लोक जीवधारियों की जैविक क्षमताओं को भी संवर्धित किया गया। नवलोक सृजना में पावन पवित्र संस्कारों से प्राण भरे। देवमाली का अस्तित्व भू भाग पर विश्व के लिए शौर्य प्रतीक हुआ।
अपने संस्कारों, परंपराओं, अस्तित्व को मूल स्वरूप में बनाए रखना दृढ़ विश्वास, श्रद्धा, आस्था, संकल्प शक्ति के उज्जवल भाव से ही संभव है। वैश्विकता के परिवर्तनकारी दौर में देवमाली का प्राच्य स्वरूप साक्षी है कि भगवान श्री देवनारायण जी का अवतरण काल जगत उन्नति और वसुधैव कुटुंबकम् की परिणीति के साथ-साथ लोक कल्याण के सार्थक आत्मिक भाव से संसार को आलाहादित करता है। श्री देवनारायण जी की लोक धारणाएं जहां धार्य हैं वहां सुख, शांति, समृद्धता व वैभवता है।
हमारी भारतीय संस्कृति में धर्म या जाति को समानता से आदर दिया जाता है। जो योग का उपदेश देती है। विष्णु अवतार भगवान श्री देवनारायण जी ने सनातन संस्कृति में पोषित गुर्जर कुल माता के आंचल में अवतरण लेकर इस कुल को सदा सदा हेतु धन्य कर दिया। इस गुर्जर कुल ने श्री देवनारायण जी के लोक कल्याण के पूजित भावों को अपनाकर उनके कृपा पात्र होकर, अनुकरणीय संदेशों की सुस्थापना में लोकजीवन समर्पित किया है। इसलिए यह कुल लोक जगत में सिरमौर है।
भारतीय संस्कृति का विश्वास रहा है कि एक ही परम सत्ता अलग-अलग अवतरण रूपों में अवतरित हई है। लोक देवी-देवता उसी परमेश्वर के विभिन्न रूपों के द्योतक हैं। लोक में पूजित देवताओं में विष्णु अवतार भगवान देवनारायण जी का विशिष्ट स्थान है। परोपकार, साहस, वचन निर्वाह, आत्म त्याग जैसे कई लौकिक और अलौकिक गुणों के कारण वह लोक आस्था के केंद्र सदियों से बने हुए हैं। श्री देवनारायण जी पशु एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए विशिष्ट पहचान रखते हैं।
देवनारायण जी की लोक गाथा परंपरा से प्राप्त अखंड भारत के लोक जीवन और दर्शन को अभिव्यक्त करती है। देवनारायण जी की लीला भागवत कथा स्वरूप है। गुर्जर लोक संस्कृति में श्री देवनारायण जी की फड़ और लोक वार्ता अनहद नाद शब्द ब्रह्म रूप है।
प्रेम और समरसता के व्यापक सन्देश में देवनारायण जी का महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने जल, वन, पशु और औषधि संरक्षण संवर्धन में अविस्मरणीय कार्य किए। उनका चरित्र लोक हितकारी है। वे परस्पर प्रेम, भाईचारे और समरसता के माध्यम से समाज के नव निर्माण में जुटे रहे। उन्होंने सृष्टि प्रेम का चिंतन प्रस्तुत किया और लोक कल्याण के कार्यों को करने की प्रेरणा दी।
'देवमालीः आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक सरोकार' ग्रंथ के माध्यम से अध्यात्म और संस्कृति संस्कारों का जीवंत स्वरूप प्रस्तुत करने का महती प्रयास किया गया है। देवमाली से जुड़ी अद्भुत आस्था, अटूट विश्वास, परंपराओं एवं चमत्कारों का वर्णित किया जाना श्री देव कृपा का ही प्रताप है। आशा है हमारा यह प्रयास श्री देव के आशीष फलस्वरूप प्राणवान होगा। यही हमारे सांसारिक जीवन पथ में देव निधि है जो सदैव मानवीय संवेदनाओं को पोषित करती रहेगी।
'देवमाली: आध्यात्मिक और सांस्कृतिक सरोकार' का सृजन भगवान श्री देवनारायण जी की अतिशय कृपा से संभव हुआ, जो अंतर्भाव से श्री देव के चरण कमलों में समर्पित है।
📝 डॉ. राकेश छोकर
अलौकिक विवरण
देवमालीः एक परिचय
देवमाली भारत के राजस्थान राज्य के ब्यावर जिले में स्थित एक प्राचीन मध्य युगीन शैली का आध्यात्मिक सरोकारों, परंपराओं को जीवंत बनाये रखने वाला सात्विक गांव है। इस गांव के सभी लोग गुर्जर जाति के, एक ही पिता की संतान हैं और अपने इष्ट देव श्री देवनारायण भगवान को अपना आराध्य मानते हैं। इस अनोखे गांव को भारत का सर्वश्रेष्ठ पर्यटन गांव घोषित किया गया है। जो भगवान देवनारायण को समर्पित है और यहां सख्त सांस्कृतिक परंपराएं हैं। देवमाली गांव के बारे में एक अनोखी बात है कि गांव की करीब 3500 बीघा से अधिक जमीन भगवान देवनारायण को समर्पित है। गांव वासियों के पास जमीन के मालिकाना हक से जुड़े कोई दस्तावेज नहीं हैं। गांव वालों के लिए गांव की जमीन भगवान देवनारायण की है। देवमाली के लोग भगवान देवनारायण के सच्चे भक्त हैं और अपने देवता को दिये वचन पर सदियों से अडिग हैं। परंपराओं एवं मान्यताओं के चलते गांव में कोई पक्का घर नहीं है। देवमाली का हर घर मिट्टी का बना हुआ है जिसकी छतें छप्पर की हैं। यही कारण है कि घरों के निर्माण में किसी भी कंक्रीट या धातु की छड़ का उपयोग नहीं किया जाता है। गांव में एकमात्र स्थायी संरचनाएं सरकारी भवन और देवनारायण मंदिर, हथान, हनुमान एवं माता मंदिर हैं। गांव में कोई भी व्यक्ति दुर्व्यसन में लिप्त नहीं है, संपूर्ण गांव सात्विक है। इसके अलावा, केरोसिन और नीम की लकड़ी जलाने पर पूरी तरह से प्रतिबंध है। गांव के किसी भी घर में ताले नहीं हैं। यहां चोरी या डकैती का कोई मामला नहीं हुआ है। गांव की मिट्टी या पत्थर गांव की सीमा से बाहर नहीं ले जाया जा सकता हैं। केवल बिला बिली सागर का जल या मिट्टी, वह भी चर्म रोगों, कोढ़ को दूर करने के लिए औषध रूप में ले जाई जा सकती है। श्री देव कृपा से इस गांव की लोकप्रियता और स्थानीय संस्कृति को संरक्षित करने में स्थानीय लोगों का अपने आराध्य देव में दृढ़ विश्वास, श्रद्धा विश्व में एक अनोखा उदाहरण है जो अन्यत्र कहीं नहीं। इस अद्भुत गांव के बारे में बहुत कुछ जानने और समझने के लिए "देवमाली: आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक सरोकार" का अध्ययन बहुत कुछ बताता है, जिसमें स्थानीय लोगों की अमृतमयी सिद्ध वाणी साक्षात सत्य वर्णित करती है।
📝 डॉ.राकेश छोकर
लेखकगण
डॉ. संजीव कुमारी
(लेखिका एवं पर्यावरणविद )
हिंदी, पंजाबी, हरियाणवी भाषाओं पर पकड़।
राजस्थानी साहित्य पर कई पुस्तकों का सृजन।
शासकीय, अशासकीय, राष्ट्रीय, और प्रादेशिक सहित अंतर्राष्ट्रीय स्तर
पर अनेक पुरस्कारों से विभूषित।
डॉ. राकेश छोकर
(पत्रकार एवं लेखक)
पत्रकारिता में पैंतीस वर्षों का अनुभव।
अनेकों पुस्तकों का सृजक।
राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्मंतर के मंचों पर वृहद सहभागिता।
सैंकड़ों राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित ।
शिखा कुमारी
हिन्दी एवं हरियाणवी भाषाओं की ज्ञाता।
जर्मनी में सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट के पद पर कार्यरत।
राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से सम्मानित प्रतिभा।
✨ लेखक से साक्षात्कार
भूमिका
प्रस्तुत साक्षात्कार स्पष्ट करता है कि ‘देवमाली: आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक सरोकार’ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि आस्था, अध्यात्म, विज्ञान और संस्कृति के समन्वित दृष्टिकोण का जीवंत दस्तावेज है—जो परंपरा को आधुनिक चेतना से जोड़ते हुए मानवता के व्यापक हित की ओर संकेत करता है।
साक्षात्कारकर्ता
उलझन सुलझन प्रतिनिधि
उत्तरदाता 📝
डॉ. राकेश छोकर
प्रश्न १. (प्रतिनिधि) आपके ग्रंथ ‘देवमाली: आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक सरोकार’ की मूल प्रेरणा क्या रही?
उत्तर (डॉ. राकेश छोकर): "इस पुस्तक की मूल प्रेरणा देवमाली की उस जीवंत परंपरा से आई, जो अध्यात्म, संस्कृति और विज्ञान के समन्वित स्वरूप को अपने भीतर धारण किए हुए है। मैंने अनुभव किया कि हमारी परम्पराएँ केवल आस्था का परिणाम नहीं, बल्कि उनके पीछे गहन आध्यात्मिक और वैज्ञानिक आधार भी निहित है। इन्हीं आधारों को समग्रता में प्रस्तुत करना इस कृति का उद्देश्य रहा।"
प्रश्न २. आपने अध्यात्म और विज्ञान को साथ-साथ रखने का प्रयास किया है। क्या ये दोनों परस्पर विरोधी नहीं हैं?
उत्तर: "बिलकुल नहीं। अध्यात्म और विज्ञान विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्य के दो आयाम हैं। विज्ञान प्रयोग और प्रमाण के माध्यम से जगत को समझता है, जबकि अध्यात्म चेतना और आत्मानुभूति के माध्यम से उसी सत्य का बोध कराता है। विज्ञान कहता है कि जीवन रासायनिक प्रक्रियाओं का परिणाम है, पर अध्यात्म उसे चेतना और परमात्मा से जोड़कर देखता है। दोनों का लक्ष्य छिपे हुए सत्य का अनावरण करना है। जब हम इन दोनों को गहराई से समझते हैं, तब श्रद्धा अंधविश्वास नहीं रहती, बल्कि अनुभूत सत्य बन जाती है।"
प्रश्न ३. देवमाली को आप आध्यात्मिक दृष्टि से किस रूप में देखते हैं?
उत्तर: "देवमाली केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि जीवंत परंपराओं का केंद्र है। यह स्थान भगवान श्री देवनारायण जी के अवतरण से पावन हुआ। उनका अवतरण काल अध्यात्म और लोकविज्ञान की अद्भुतता से परिपूर्ण रहा। यहां स्थापित सामाजिक मूल्य मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत थे। प्रकृति संरक्षण, पशु संवर्धन, लोक कल्याण—ये सब उनके जीवन के अभिन्न आयाम रहे।"
प्रश्न ४. क्या आप मानते हैं कि श्री देवनारायण जी का अवतरण किसी विशेष सांस्कृतिक धारा से जुड़ा है?
उत्तर: "निश्चित ही। वे विष्णु अवतार माने जाते हैं और सनातन संस्कृति में उनका विशेष स्थान है। उनका अवतरण गुर्जर कुल में हुआ, जिसने लोक कल्याण और समरसता के संदेश को आत्मसात किया। भारतीय संस्कृति का मूल विश्वास रहा है कि एक ही परम सत्ता विभिन्न अवतारों में प्रकट होती है। श्री देवनारायण जी उसी परंपरा के द्योतक हैं।"
प्रश्न ५. आपके अनुसार देवमाली की सांस्कृतिक विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर: "देवमाली की संस्कृति में कला, दर्शन, चरित्र, सद्गुण और सभ्यता के मूल्य समाहित हैं। यहां की लोकगाथाएँ, विशेषकर देवनारायण जी की फड़ परंपरा, लोकजीवन और दर्शन का जीवंत दस्तावेज है। यह केवल कथा नहीं, बल्कि ‘शब्द-ब्रह्म’ का रूप है। यहां की परंपराएं युगों से प्राणवान हैं क्योंकि वे श्रद्धा, विश्वास और आस्था पर आधारित हैं—न कि पाखंड पर।"
प्रश्न ६. आपने पर्यावरण और जैविक संरक्षण का भी उल्लेख किया है। क्या यह आधुनिक संदर्भ में प्रासंगिक है?
उत्तर: "अत्यंत प्रासंगिक है। श्री देवनारायण जी ने जल, वन, पशु और औषधि संरक्षण के माध्यम से प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का संदेश दिया। आज जब विश्व पर्यावरण संकट से जूझ रहा है, तब उनके विचार ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना को सशक्त करते हैं। सृष्टि प्रेम ही सच्चा अध्यात्म है।"
प्रश्न ७. क्या देवमाली केवल आस्था का केंद्र है या सामाजिक परिवर्तन का भी आधार?
उत्तर: "देवमाली आस्था का केंद्र तो है ही, साथ ही सामाजिक समरसता और नव निर्माण का भी आधार है। प्रेम, भाईचारा, वचन-पालन, आत्मत्याग और परोपकार—ये सभी गुण लोकजीवन को दिशा देते हैं। जहां श्री देवनारायण जी की लोकधारणाएं जीवित हैं, वहां सुख, शांति और समृद्धि का वास है।"
प्रश्न ८. इस ग्रंथ के माध्यम से आप पाठकों को क्या संदेश देना चाहते हैं?
उत्तर: "मेरा उद्देश्य केवल इतिहास या आस्था का वर्णन करना नहीं, बल्कि अध्यात्म और संस्कृति के जीवंत स्वरूप को प्रस्तुत करना है। जब हम अपने संस्कारों और परंपराओं को मूल रूप में समझते हैं, तब आत्मबल और संकल्प शक्ति का विकास होता है। वैश्विक परिवर्तन के इस दौर में अपनी जड़ों से जुड़े रहना ही सच्ची उन्नति है।"
प्रश्न ९. अंत में, इस कृति को आप किसे समर्पित करना चाहेंगे?
उत्तर: "यह संपूर्ण सृजन भगवान श्री देवनारायण जी के चरण कमलों में समर्पित है। उनकी कृपा के बिना यह संभव नहीं था। यदि यह ग्रंथ मानवीय संवेदनाओं को पोषित कर सके और लोककल्याण की भावना को प्रबल बना सके, तो मैं इसे अपनी साधना का सफल परिणाम मानूँगा।"
सूचना स्रोत
डॉ. राकेश छोकर
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति






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