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अच्छा–बुरा नहीं, हमारी दृष्टि बदलती है

अच्छा–बुरा नहीं, हमारी दृष्टि बदलती है

मान लीजिए तेज़ धूप में चलते-चलते आप थक चुके हैं। प्यास लग रही है और आसपास पानी का कोई साधन नहीं दिखता। आप एक पेड़ की छाया में रुकते हैं। तभी सामने की इमारत की खिड़की से कोई व्यक्ति इशारे से पूछता है—पानी चाहिए? उस क्षण आपके मन में उसके लिए सम्मान और आभार जाग उठता है। आपको लगता है, यह अच्छा इंसान है।

वह नीचे आने का संकेत देकर खिड़की बंद कर देता है। कुछ मिनट बीत जाते हैं। दरवाज़ा नहीं खुलता। अब मन में खिन्नता आती है—शायद मज़ाक कर रहा था, शायद यूँ ही सहानुभूति दिखा दी। सोच बदल जाती है।

थोड़ी देर बाद दरवाज़ा खुलता है। वह व्यक्ति क्षमा माँगते हुए बताता है कि केवल पानी नहीं, नींबू पानी बनाना बेहतर लगा, इसलिए समय लग गया। आपकी राय फिर बदल जाती है। आप राहत महसूस करते हैं।

आप शर्बत पीते हैं, पर उसमें मिठास नहीं है। चेहरा सिकुड़ता है—इतनी देर बाद भी ठीक से नहीं बना। नकारात्मक भाव फिर लौट आता है। तभी वह मुस्कुराकर चीनी या ग्लूकोज़ का पैकेट बढ़ाता है और कहता है कि मिठास हर किसी को अलग-अलग पसंद होती है, इसलिए खुद मिला लीजिए। आप चुप हो जाते हैं। भीतर कहीं समझ जन्म लेने लगती है।

यही पूरी घटना है—एक ही व्यक्ति, एक ही परिस्थिति, लेकिन हमारी राय बार-बार बदलती रही। कारण यह नहीं था कि सामने वाला बदल रहा था, बल्कि इसलिए कि हमारी अपेक्षाएँ बदल रही थीं। हम व्यक्ति को नहीं, अपनी उम्मीदों को कसौटी पर रख रहे थे।

अक्सर हम अधूरी जानकारी के आधार पर जल्दी निष्कर्ष निकाल लेते हैं। किसी की देरी हमें लापरवाही लगती है, किसी की कमी दुर्भावना। जबकि सच यह है कि हर स्थिति के पीछे कारण होते हैं, जो तुरंत दिखाई नहीं देते।

इसलिए ज़रूरी है कि निर्णय देने से पहले ठहरकर समझने की कोशिश की जाए। हर बात का पूरा सच एक ही पल में सामने नहीं आता। कई बार व्यक्ति गलत नहीं होता, हमारी समझ अधूरी होती है। यही समझ जीवन के रिश्तों और व्यवहार को सहज और मानवीय बनाती है।

                               यूट्यूब वीडियो संदर्भ

सृजक

                             श्री रोशनलाल छोकर

पाठ्य उन्नयन और चित्र सृजन

 

प्रस्तुति





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