भूमिका
यह प्रयास जीवन संध्या को केवल एक अवस्था नहीं, बल्कि भावों की वह परिपक्व भूमि मानकर प्रस्तुत करता है, जहाँ अनुभूतियाँ अपने शोर को त्यागकर अर्थ की ऊँचाइयों तक पहुँचती हैं। यहाँ भाव किसी क्षणिक संवेदना के रूप में नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली शक्ति के रूप में उभरते हैं—स्मृति, स्वीकार, करुणा और आत्मबोध के रूप में। अंतर्संबंध ब्लॉग की यह भूमिका जीवन संध्या में भावों की उसी केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करती है, जहाँ संबंध शब्दों से अधिक अनुभूति बनते हैं और अनुभव जीवन के शेष क्षणों को गरिमा, संतुलन और सार्थकता प्रदान करते हैं। यह लेखन उन भावों को प्रमुखता देता है जो जीवन की संध्या में दीपक बनकर मार्ग रोशन करते हैं और बताते हैं कि अंततः मनुष्य अपने रिश्तों और अनुभूतियों से ही पूर्ण होता है।
याद आते हैं वो पल
मेरी दीदी…
क्या दिल का दर्द बयान करना आसान होता है?
अपने लोगों का दर्द जितना देखना कठिन होता है, उतना ही उसे शब्दों में ढालना भी कठिन होता है।
अक्सर हमारे दिल की गहराइयों में छुपा दर्द शब्दों का साथ नहीं पकड़ पाता। भावनाएँ भीतर उमड़ती रहती हैं, पर अभिव्यक्ति का रास्ता नहीं मिलता। दिल के दर्द के बारे में लिखना इसलिए भी आसान नहीं होता, क्योंकि वह हमारे सबसे निजी अनुभवों से जुड़ा होता है। जब हम उसे लिखने बैठते हैं, तो अपने ही भीतर उतरना पड़ता है—और यह सामना हर किसी के लिए सहज नहीं होता।
फिर भी, कई लेखकों और कवियों के लिए लिखना एक प्रकार की चिकित्सा बन जाता है। शब्द उन्हें अपने दर्द को समझने, स्वीकारने और दूसरों से साझा करने की शक्ति देते हैं। इसी प्रक्रिया में दर्द एक अर्थ पा लेता है।
मैं भी अपने दर्द को लिखने का निर्णय लेती हूँ।
अपनी दीदी के बारे में लिखते हुए मैं सबसे पहले बचपन की कुछ यादों से शुरुआत करना चाहती हूँ, ताकि आप जान सकें कि वह कितनी खुशमिज़ाज और खिलंदड़ स्वभाव की है।
हम पाँच भाई-बहन हैं। दीदी सबसे बड़ी है, लेकिन मस्ती में सबसे आगे। उसे हर समय डाँट भी पड़ती रहती है—
“तू सबसे बड़ी है, तू ही मस्ती करेगी तो ये सब भी तुझसे ही सीखेंगे।”
पर उसे इसकी परवाह नहीं होती।
कोई घर आ रहा हो तो वह दरवाज़े के पीछे छुपकर खड़ी हो जाती है और जैसे ही कोई अंदर आता है, ज़ोर से “भौ!” करके डराने में उसे बड़ा मज़ा आता है। हमारे दादाजी ज्योतिषी हैं, लोग अक्सर अपनी पत्रिकाएँ दिखाने आते रहते हैं—दीदी उन्हें भी नहीं छोड़ती, सबको डरा देती है।
ऐसी है मेरी बहना—
चुलबुली, शरारती और जीवन से भरी हुई।
शेष… फिर कभी।
प्रमिला त्रिवेदी

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