साथ चलती स्मृतियाँ
एक जीवनसाथी की मौन पीड़ा
“Those we love don’t go away; they walk beside us every day.”
यह पंक्ति केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के हृदय की गहराइयों से निकली अनुभूति है, जिसने अपने जीवन का सबसे प्रिय सहचर खोया है, पर उसे अपने भीतर अब भी जीवित महसूस करता है।
उत्तराखंड की डॉली डबराल के लिए यह शब्द केवल सांत्वना नहीं, बल्कि उनका जीने का आधार बन चुके हैं। जीवनसाथी का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं होता, वह जीवन के एक पूरे अध्याय का मौन हो जाना होता है। घर का वही आँगन, वही दीवारें, वही वस्तुएँ — सब कुछ पहले जैसा होता है, पर फिर भी सब कुछ बदल जाता है।
दर्द की सबसे गहरी परिभाषा वही समझ सकता है जिसने अपने जीवन के सहयात्री को खोया हो। जीवनसाथी केवल रिश्ते का नाम नहीं होता; वह आदतों में बस जाता है, दिनचर्या में घुल जाता है, और मन की हर धड़कन में शामिल हो जाता है। जब वह नहीं रहता, तब उसकी अनुपस्थिति हर छोटी-सी बात में महसूस होती है — चाय का खाली कप, मौन संवाद, और अधूरी मुस्कान में।
डॉली के मन में यह भाव निरंतर रहता है कि प्रेम कभी समाप्त नहीं होता। शरीर चला जाता है, पर साथ निभाने की अनुभूति स्मृतियों के रूप में जीवित रहती है। यही कारण है कि यह पंक्ति उनके जीवन का सच्चा प्रतिबिंब बन गई है।
उन्हें लगता है कि उनके जीवनसाथी कहीं दूर नहीं गए, बल्कि उनके हर कदम के साथ, हर कठिन क्षण में, और हर मुस्कान के पीछे अब भी मौजूद हैं।
यह पीड़ा केवल आँसुओं की नहीं होती, यह एक शांत पीड़ा होती है — जिसमें रोना भी है, यादें भी हैं, और एक गहरा अपनापन भी। डॉली के लिए उनके जीवनसाथी की याद कोई बोझ नहीं, बल्कि एक ऐसी छाया है जो उन्हें संभालती है, सहारा देती है और आगे बढ़ने की शक्ति देती है।
समाज अक्सर कहता है कि समय सब कुछ भर देता है, पर सच्चाई यह है कि समय केवल हमें उस दर्द के साथ जीना सिखा देता है। प्रेम की स्मृतियाँ मिटती नहीं, वे जीवन का स्थायी हिस्सा बन जाती हैं।
डॉली के जीवन में भी यही हुआ — अनुपस्थिति ने शून्य तो बनाया, पर स्मृतियों ने उस शून्य को अर्थ दे दिया।
इस पंक्ति के पीछे छिपा संदेश यही है कि सच्चा प्रेम मृत्यु से भी परे होता है। जो सच में हमारे अपने होते हैं, वे दूरी में नहीं, हमारी चेतना में बस जाते हैं।
डॉली के लिए उनके जीवनसाथी अब एक स्मृति नहीं, बल्कि एक अदृश्य सहयात्री हैं — जो हर दिन उनके साथ चलते हैं, हर पल उन्हें शक्ति देते हैं, और उनके जीवन को मौन रूप से दिशा प्रदान करते हैं।
यही प्रेम की पराकाष्ठा है — जहाँ बिछड़ना अंत नहीं, बल्कि स्मृतियों के साथ एक नए साथ की शुरुआत बन जाता है।
श्रद्धांजलि
दिवंगत श्री विनोद कुमार डबराल जी को कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण' की विनम्र श्रद्धांजलि
मुक्तक
आज चारों ओर देखो ग़म के बादल छा रहे हैं।
लग रहा जैसे परिंदे राग ग़म का गा रहे हैं।
डॉली जी का दर्द लखकर दर्द खुद ही रो रहा है।
हृदय रूपी सिन्धु में आंसू समाते जा रहे हैं।
पास नहीं हैं शब्द मेरे तो कैसे मन की पीर सुनाऊँ।
विनोद सभी के आदरणीय थे याद उन्हें कर नीर बहाऊँ।
खिली कली सी डॉली जी थीं आज रहीं दिख मुरझाईं सी।
मन का मोती ढूंढ रही हैं मोती की बन परछाईं सी।
विनोद जी से मिला था जब भी उनको हंसते ही पाया था।
डॉली जी के लेखन पर तो उनकी कृपा को पाया था।
बड़े प्यार से अपनी कहते मेरी भी मन से सुनते थे।
मिलो समर्पित पत्नी उनको ईश्वर की कृपा कहते थे।
ऋषि तुल्य ही मैंने उनका सदा सदा जीवन आंका था।
समझा वो ही केवल जिसने भक्ति दर्पण में झाँका था।
वर्षों से देखा था उन पर रोगों का निर्मम साया था।
डॉली जी ने सेवा करके सदा आत्मिक सुख पाया था।
अमित-निधि परिवार सहित ही डूबे हैं ग़म के सागर में।
सारा ही ग़म भर डाला है अपने नयनों की गागर में।
काया नश्वर माया नश्वर हम सब नश्वरता में जीते।
हम सब साधारण मानव हैं इसीलिए बिछुड़न को पीते।
मिले शांति परिवार को ईश्वर से विनती करता हूँ।
विनोद आत्मा ईश चरण में होगी ये आशा रखता हूं।
डॉली जी धीरज धारी हैं धर्म धैर्य अपनाएंगी।
जो भी पड़े अधूरे लेखन उन में फिर से जुट जायेंगी।
डॉली जी अनुजा मेरी हैं पल-पल उनके साथ रहूंगा।
विगत नहीं जो भूला जाता भूलो उनको यही कहूँगा।
बोझिल मन से श्रद्धांजलि मैं विनोद जी को देता हूं।
सबको विरह सहन शक्ति दे हरि से यही वचन लेता हूँ।
सृजक
श्री कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण'
22.02.2026
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति







सृजन कर्ता ने जीवनसाथी को खोने के भाव को बहुत ही खूबसूरती से व्यक्त किया है
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