भूमिका
त्योहार केवल तिथियाँ नहीं होते, वे स्मृतियों के ऐसे दीप होते हैं जिनकी लौ जीवन भर बुझती नहीं। मकर संक्रांति भी ऐसा ही एक पर्व है, जो पूजा, दान और सूर्योपासना से आगे बढ़कर बचपन की उन्मुक्त हँसी, छतों पर उड़ती पतंगों और घर की रसोई से आती तिल-रेवड़ी की खुशबू से जुड़ जाता है। समय के साथ परंपराओं के रूप बदल जाते हैं, भूमिकाएँ बदल जाती हैं, लेकिन मन के किसी कोने में बैठा वह बचपन आज भी वैसा ही चंचल बना रहता है।
यह संस्मरण मकर संक्रांति के धार्मिक महत्व के साथ-साथ उन निजी पलों को भी सहेजता है, जहाँ बहनों की होड़, माँ-दादी की पुकार, छत से उतरने की अनिच्छा और पीपल के पेड़ में अटकी पतंगें जीवन की अमिट धरोहर बन जाती हैं। आज जब हम स्वयं परंपराओं के वाहक बन चुके हैं और हमारे बच्चे वही शरारतें दोहरा रहे हैं, तब यह लेख हमें अपने भीतर झाँकने का अवसर देता है—उस बचपन तक, जो कभी छूटता नहीं।
मकर संक्रांति पर्व
छत, पतंगें और बचपन व उल्लास
मकर संक्रांति की यादें तो सचमुच यादें ही होती हैं—जीवन भर साथ चलने वाली। यह मेरा सबसे पसंदीदा त्योहार हुआ करता था। मेरी और मेरी बड़ी बहन के बीच हर साल एक अनकही होड़ लगी रहती थी। स्कूल से आते ही हम दोनों छत की ओर दौड़ लगाते—जिसने पहले पतंग को छू लिया, पतंग उसी की मानी जाती।
घर के पास ही एक बहुत बड़ा पीपल का पेड़ था। उसकी विशाल शाखाएँ हमारी छत तक फैली हुई थीं और अक्सर पतंगें उन्हीं में आकर अटक जाया करती थीं। उन पतंगों को निकालने का साहस और हुनर सिर्फ दीदी के पास था। पतंग “लूटने” के लिए हमने एक बांस भी रख छोड़ा था, जिससे पेड़ में फँसी पतंगों को निकाला जा सके। नीचे से माँ और दादी की आवाज़ें लगातार आती रहतीं—
“पतंग मिल गई तो अब नीचे आ जाओ!”
यूं और जब पतंग मिल जाती, तब नीचे उतरना भी किसी जीत से कम नहीं लगता। घर में तिल के लड्डू, पापड़ी और रेवड़ी खूब बनती थीं। इस दिन स्नान और दान का विशेष महत्व होता था। माँ और दादी पूजा की तैयारियों में लगी रहतीं। अगर उस समय वे कोई काम बता देतीं, तो हमारा जवाब तय होता—
“शाम को ला देंगे।”
हमारे घर में दिया-बाती हो जाने के बाद बाहर जाने की अनुमति नहीं होती थी। तब हम गुस्से में एक-दूसरे से कहते रहते—
“तू जा… तू जा…”
लेकिन सच तो यह था कि छत छोड़कर कहीं जाने का मन ही नहीं करता था। आज सोचती हूँ तो लगता है—सब दिन जैसे आँखों के सामने उतर आए हों।
मकर संक्रांति का धार्मिक महत्व भी उतना ही गहरा है। इस दिन भगवान सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं, इसलिए सूर्यदेव की पूजा का यह विशेष पर्व माना जाता है।
समय बदल गया है। अब हम स्वयं पूजा, दान और परंपराओं में व्यस्त रहते हैं, और हमारे बच्चे उसी तरह छतों पर उधम मचाते हैं जैसे कभी हम मचाया करते थे। उन्हें देखकर अपना बचपन बार-बार याद आ जाता है—
वही पतंगें, वही छत, वही उल्लास।
रचनाकार






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