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अद्भुत परिघटना का विवरण

भूमिका 

भारतीय काव्य परंपरा में इतिहास तब जीवंत हो उठता है, जब वह केवल घटनाओं का विवरण न रहकर मूल्य-बोध का संवाहक बन जाता है। कवि श्री श्योराज जी बम्बेरवाल ‘सेवक’ इसी परंपरा के सजग साधक हैं। उनकी कविता में इतिहास केवल स्मृति नहीं, संस्कार बनकर उपस्थित होता है। ‘पन्ना’ पर आधारित यह आल्हा-छंदबद्ध रचना उसी काव्य-साधना का सशक्त उदाहरण है।

इस कविता में कवि ने पन्ना धाय के चरित्र को केवल एक ऐतिहासिक प्रसंग के रूप में नहीं, बल्कि त्याग, कर्तव्य और राजधर्म की सर्वोच्च प्रतिमा के रूप में प्रतिष्ठित किया है। आल्हा छंद की वीर-रसात्मक लय में ढली यह कथा लोकमानस को सहज ही अपने साथ बहा ले जाती है। सरल शब्दावली, स्पष्ट घटनाक्रम और भावात्मक आवेग—तीनों का संतुलन कवि की गहन काव्य-समझ का प्रमाण है।

कवि की विद्वत्ता यहाँ इस रूप में उभरती है कि वे मातृत्व की निजी वेदना और राष्ट्रधर्म की व्यापक चेतना के द्वंद्व को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करते हैं। पन्ना का त्याग करुणा का नहीं, बल्कि विवेक और साहस का प्रतीक बनता है। यही दृष्टि कविता को भावुकता से ऊपर उठाकर वैचारिक ऊँचाई प्रदान करती है।

यह रचना पाठक को केवल एक कथा सुनाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि प्रश्न छोड़ जाती है—क्या आज भी ऐसे मूल्य हमारे सामाजिक जीवन में जीवित हैं? इसी आत्मचिंतन की प्रेरणा देना कवि श्योराज जी बम्बेरवाल ‘सेवक’ के काव्य का मूल उद्देश्य है। इस दृष्टि से ‘पन्ना’ केवल अतीत की गाथा नहीं, वर्तमान के लिए भी एक नैतिक प्रकाश-स्तंभ है।

रचना

आल्हा छंद

।।पन्ना।।

पन्ना की तुम सुनो कहानी, ध्यान लगाकर सारे आज

त्यागी जिसने ममता अपनी, करने को परहित के काज।

कर्णावती ने कर दिया था, अपने तन का जब बलिदान

पन्ना को सौंपा उदय सिंह, कहकर इसका रखना ध्यान।

चंदन जैसा इसे मानना, अपने ही निज पूत समान

करना मुझ मां दुखियारी पर, बस इतना सा तुम एहसान।

वायदा किया पन्ना ने जब, चिपका हिय कर करती नाज

पन्ना की तुम सुनो कहानी, ध्यान लगाकर सारे आज।

गोद उठाया उदय सिंह को, मेवाड़ धरा को कर प्रणाम

भोज कराती दूध पिलाती, करती खुद ही सारे काम।

राणा सांगा रहे नहीं थे, अत्याचारी था बनवीर

छल से मार विक्रमादित्य को, अब था उदय खातिर अधीर।

पड़ी भनक जब थी पन्ना को, समझ गई सारा ही राज

पन्ना की तुम सुनो कहानी, ध्यान लगाकर सारे आज।

बारी को बुलवाकर उसने, दिया उदय को कुम्भल भैज

चंदन को दे दी थी उसने, उदय सिंह की प्यारी सेज।

आया बनवीर महल में जब, कर में लेकर के तलवार

समझ उदय ही चंदन को झट, किया जोर से उसपे वार।

नैनों से अश्रु निकल पड़े थे, दबा गई फिर भी आवाज

पन्ना की तुम सुनो कहानी, ध्यान लगाकर सारे आज।

राज धर्म के खातिर जिसने, दिया हाथ से सब-कुछ त्याग

छोड़ा जिसने राज धर्म हित, आप पूत का भी अनुराग।

ऐसी माता कहां मिलेगी, पूछ रहा है ये संसार

जान बचाकर उदय सिंह की, किया खूब ही था उपकार।

जिसके कारण उदय सिंह को, मिला यहां मेवाड़ी ताज

पन्ना की तुम सुनो कहानी, ध्यान लगाकर सारे आज।

रचनाकार

श्योराज बम्बेरवाल 'सेवक'

मालपुरा

पाठ्य भूमिका और चित्र सृजक 

 

प्रस्तुति






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