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अपनों से मन की बात

अपनों से मन की बात - २

मैं यह स्वीकार करता हूँ कि आज वैवाहिक संस्कार को लेकर मन भीतर तक व्यथित है। जिस रिश्ते को हमने कभी जीवन की सबसे पवित्र डोर माना था, वह अब धीरे-धीरे बोझ, भय और प्रदर्शन का कारण बनता जा रहा है। जब मैं समाज को देखता हूँ, तो महसूस करता हूँ कि विवाह अब भावनाओं और संस्कारों का उत्सव कम, और सामर्थ्य की परीक्षा अधिक बन गया है।

मुझे सबसे अधिक पीड़ा तब होती है जब बेटियों के माता-पिता की आंखों में असहायता देखता हूँ। वर्षों की मेहनत, जीवन भर की पूँजी और आत्मसम्मान—सब कुछ एक दिन के आयोजन की भेंट चढ़ जाता है। कर्ज़ का बोझ, सामाजिक ताने और “कम पड़ गया” जैसी फुसफुसाहटें, रिश्तों की नींव को विवाह से पहले ही हिला देती हैं। मैं सोचता हूँ, क्या यही वह संस्कृति है जिसे हम अगली पीढ़ी को सौंपना चाहते हैं?

अक्सर मन प्रश्न करता है—क्या हम सचमुच भूल गए हैं कि दांपत्य का सुख मंच, लाइट और लेन-देन से नहीं उपजता? जिन घरों में आपसी सम्मान, विश्वास और संवाद होता है, वहीं रिश्ते टिकते हैं। इसके विपरीत, जहां शुरुआत ही तुलना और मांग से होती है, वहां तनाव और टूटन देर नहीं लगाती। यह सच्चाई जितनी सरल है, उतनी ही उपेक्षित भी।

मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि विवाह कोई सौदा नहीं है। यह जीवन भर निभाया जाने वाला नैतिक दायित्व है, जिसमें बराबरी, संवेदनशीलता और समझ सबसे बड़ी पूँजी होती है। जब दहेज, फिजूलखर्ची और दिखावा केंद्र में आ जाते हैं, तो प्रेम और संस्कार किनारे धकेल दिए जाते हैं—और यहीं से सामाजिक विघटन की शुरुआत होती है।

आज आत्ममंथन का क्षण है। यदि हम सच में बदलाव चाहते हैं, तो उसे भाषणों से नहीं, अपने निर्णयों से दिखाना होगा। अपने घरों में सादगी को अपनाना होगा, बेटियों को बोझ नहीं बल्कि भविष्य की शक्ति के रूप में देखना होगा, और उन कुरीतियों के विरुद्ध खड़ा होना होगा जो रिश्तों को हिंसा, टूटन और अपराध की ओर ले जाती हैं।

मुझे डर है कि यदि हम अब भी मौन रहे, तो हमारी चुप्पी इतिहास में हमारी सबसे बड़ी भूल के रूप में दर्ज होगी। इसलिए मैं स्वयं से और समाज से आग्रह करता हूँ—आइए, ऐसे विवाह चुनें जो खर्च में हल्के हों, पर मूल्यों में भारी।

जहाँ सम्मान बराबर हो, संस्कार प्राथमिक हों और मानवता सर्वोपरि।

दहेज नहीं—संस्कार चाहिए।

सरल विवाह—सशक्त और सुखी परिवार।


डॉ. रोशनलाल छोकर 

(सामाजिक चिंतक एवं शिक्षाविद्) 

मेरे प्रिय साथियो, विशेषकर गुर्जर समाज के युवाओ,

मनुष्य का जीवन जैसा होता है, वैसी ही उसकी सोच होती है। विचार ही हमारे जीवन की दिशा तय करते हैं। अच्छे, सकारात्मक और रचनात्मक विचार जीवन को आगे बढ़ाते हैं, जबकि नकारात्मक सोच धीरे-धीरे व्यक्ति, परिवार और समाज—तीनों को कमजोर कर देती है।

गुर्जर समाज का इतिहास साहस, परिश्रम, स्वाभिमान औलर संस्कारों से भरा रहा है। यह हमारी पहचान रही है। लेकिन आज यदि हमारी युवा पीढ़ी भ्रम, दिखावे, नशे और गलत आकर्षणों में उलझती है, तो समाज की नींव कमजोर हो सकती है। इसके विपरीत, अगर युवा शिक्षा, चरित्र, अनुशासन और सकारात्मक सोच को अपनाते हैं, तो हमारा समाज नई ऊँचाइयों को छू सकता है।

मैं युवाओं से कहना चाहता हूँ कि डिग्री केवल नौकरी दिलाने का माध्यम हो सकती है, लेकिन संस्कार जीवन को सही दिशा देते हैं। जब सोच सकारात्मक होती है, तभी परिश्रम, आत्मसंयम और लक्ष्य के प्रति समर्पण पैदा होता है। ऐसे युवा न केवल अपने माता-पिता का मान बढ़ाते हैं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा बनते हैं।

समाज तभी मजबूत बनता है जब व्यक्ति और परिवार मिलकर सही सोच को अपनाते हैं। अच्छे विचार अच्छे कर्मों को जन्म देते हैं, और अच्छे कर्म ही एक सशक्त, संस्कारित और प्रगतिशील समाज की नींव रखते हैं। यही सोच हमें दहेज, नशा, हिंसा और अन्य कुरीतियों के खिलाफ खड़ा होने की शक्ति देती है।

आज हर युवा को स्वयं से कुछ सवाल पूछने चाहिए—

क्या मेरी सोच समाज को जोड़ रही है?

क्या मेरे कर्म आने वाली पीढ़ी के लिए सही उदाहरण बनेंगे?

क्या मैं केवल अपने लिए जी रहा हूँ या समाज के लिए भी कुछ कर रहा हूँ?

युवाओं से मेरा सरल सा आग्रह है—अपनी सोच को शुद्ध, शुभ और सकारात्मक बनाइए। क्योंकि समाज का भविष्य युवाओं की सोच से ही बनता है। जब सोच स्वस्थ होगी, तभी समाज भी स्वस्थ, संतुलित और समृद्ध बनेगा।

अंत में, गुर्जर समाज के हर युवा के लिए यही मन की बात है—

सकारात्मक सोच अपनाइए, शिक्षा और संस्कार को जीवन का आधार बनाइए, और अपने कर्मों से समाज को सही दिशा दीजिए। यही सच्ची जिम्मेदारी है, यही समाज के प्रति आपका सच्चा दायित्व है।

सूचना स्रोत 

श्री रोशनलाल छोकर 

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति  




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