भूमिका
यह आलेख सच्चे भावों की धड़कन से रचा गया है—न तो अतिशयोक्ति, न अलंकार का बोझ; केवल जीवन की सच्ची गवाही। और! ये मनोभाव व्यक्त करने वाले हैं श्री जितेंद्र सिंह (यूपीएससी टॉपर कुमारी कशिश के पिता)।
साक्षी बनते पिता, साक्षी बनती संतान भी
“पिता साक्षी थे मेरी पहली साँस के,
और मैं साक्षी हूँ पिता की आख़िरी साँस का…”
ये पंक्तियाँ किसी साहित्यिक कल्पना की उपज नहीं हैं, बल्कि उस जीवन-दर्शन का सार हैं जहाँ पिता होना केवल संबंध नहीं, एक मौन साधना है। UPSC टॉपर कशिश के पिता, श्री जितेंद्र जी, ने अपने शब्दों में नहीं—अपने आचरण में—यह सिद्ध किया कि श्रेष्ठ पेरेंटिंग भाषणों से नहीं, निरंतर समर्पण से जन्म लेती है।
एक पिता, जो जन्म प्रमाण-पत्र पर हस्ताक्षर करते समय शायद यह नहीं जानता कि उसकी कलम एक ऐसे सफ़र की शुरुआत कर रही है, जिसका अंतिम पड़ाव मृत्यु प्रमाण-पत्र तक पहुँचेगा—पर इस बीच वह जो संस्कार लिखता है, वही बच्चे का भविष्य बनता है। उन्होंने अपनी संतान के लिए केवल वस्त्र नहीं खरीदे, उन्होंने विश्वास बुना। केवल शिक्षा का प्रबंध नहीं किया, बल्कि आत्मबल का आधार रखा।
आज जब समाज सुविधाओं और परिणामों की दौड़ में उलझा है, वहाँ यह कथा हमें याद दिलाती है कि बच्चों की सफलता का बीज परिस्थितियों में नहीं, अभिभावक की दृष्टि में होता है। सीमित संसाधन, संघर्ष, असुविधाएँ—ये सब बाधाएँ नहीं बनतीं, यदि घर के भीतर यह भरोसा हो कि “तुम कर सकते हो”।
कशिश की सफलता कोई चमत्कार नहीं, वह एक पिता के रोज़मर्रा के छोटे-छोटे निर्णयों का स्वाभाविक परिणाम है—जहाँ प्राथमिकता स्वयं नहीं, संतान का भविष्य था। जहाँ थकान के बावजूद हौसला दिया गया, जहाँ असफलता के क्षणों में तुलना नहीं, विश्वास दिया गया।
और यही वह विरासत है जो मृत्यु के साथ समाप्त नहीं होती। पिता चले जाते हैं, पर उनकी पेरेंटिंग जीवित रहती है—पुत्री की उपलब्धियों में, पुत्र के पथ-चयन में, और उस समाज में जो उनसे प्रेरणा लेता है।
क्योंकि जब एक पिता अपनी अंतिम साँस तक अपने बच्चों के सपनों का साक्षी बनता है, तब वही बच्चे जीवन भर उस पिता के मूल्यों के साक्षी बनकर चलते हैं।
और! यही उत्कृष्ट पेरेंटिंग की सबसे सच्ची पहचान है।
सूचना स्रोत
श्री जितेंद्र सिंह
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति



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