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साहस - धर्मेन्द्र खटाना

साहस 

आशा और विश्वास का इक ही ठिकाना!

डर और असुरक्षा सिखाते लक्ष्य से भटक जाना!🌹!

बुना है बुना हरी ने भावनाओं का ऐसा ताना- बाना!

खुद ही गर तूने ना जाना, तो क्या जाना!🌹!

साहस, निडरता देती कठिन को सरल बनाना!

अदम्यता की पूर्णता कर, ऐसे मिटे जैसे परवाना!🌹!

कलंदर भी आये, सिकंदर भी आये!

साहस से ही गया उनको पहचाना!🌹!

साहस से ही लिखा जाता इक नया तराना!

साहस ही है विजेताओं का अद्भुत गाना!🌹!

आमने - सामने खड़ी थी जब दो सेनाएं!

गाण्डीव धर धरा पर अर्जुन लड़खड़ाए!🌹!

बोले कान्हा से - गर मारना अपनों को ही!

तो नहीं चाहिए ऐसी जीत सफलतायें!🌹!

त्रिलोकी ने फिर वो भांत भांत से समझाये!

ना कोई जन्मा, ना मारा जाए!🌹!

भ्रम के भ्रम से जो वो भरमाए!

साहस से ही फिर रण को उकसाए!🌹!

साहस ही है जो कूद हनुमत लंक जराये!

जामवंत ने 'बजरंग' को कई कई रंग दिखाए!🌹!

साहस ही है जो असंभव को संभव बनाये!

तीर तरकश पे जिन जिन ने चढ़ाएं!🌹!

जुटा साहस लक्ष्य पर तीर जाए!

साहस से त्याग कि प्रतिमूर्ति बनी पन्ना धाय जैसी मायें!🌹!

साहस से ही लक्ष्मीबाई ने आंगल के छक्के छुड़ाये!

साहस ही है जो निहत्थे "गाँधी" टकराये!🌹!

पता है पता हमको, सब यहाँ आयें जायें!

पर साहस ही असल मुकाम तक पहुचाये!🌹!

फिर क्यूँ ना साहस को ही अपनाएं!

जो बनना है वह साहस ही तुझे बनाये!🌹!

कहत " खटाना धम्मू " होगी मन चाही!

बस कर इतना साहस को जुट जाए!🌹!

रचयिता

धर्मेंद्र खटाना "धम्मू "

दमदमा

प्रस्तुति



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