प्रस्तावना
🙏🙏 आज से उलझन सुलझन प्रशासित अंतर्संबंध ब्लॉग पर माँ मीरा की जीवनी प्रस्तुत की जा रही है। श्रीमती प्रमिला त्रिवेदी जी की यह महत्वाकांक्षी रचना है जिसको वो नित्यप्रति भेजेंगी। 🙏🙏
जय मीरा, जय गोपाल।
परम भक्तिमती मीरा बाई—जिनके जीवन का एक-एक श्वास, एक-एक क्षण गिरधर गोपाल जी को समर्पित था—उनके परम पावन श्रीचरणों में प्रमिला जी का कोटि-कोटि प्रणाम। उनके भजनों, पदों और चरित्र से जितना जाना, उतना लिखने का प्रयास किया है।
मेरी अपनी बात
— प्रमिला त्रिवेदी, हैदराबाद
मैं प्रमिला त्रिवेदी, हैदराबाद की रहने वाली हूँ। वैसे हम मूल रूप से राजस्थान के ही निवासी हैं। आज भी हमारे सभी रिश्तेदार और पैतृक मकान वहीं हैं।
मैंने स्नातक तक पढ़ाई की। उसके बाद हिन्दी प्रचार सभा, हैदराबाद विश्वविद्यालय से विशारद, भूषण और विद्वान की उपाधियाँ प्राप्त कीं। साहित्य रत्न नहीं कर सकी, क्योंकि तब तक विवाह हो चुका था।
मीराबाई की जीवनी अब अपने अंतिम चरण तक आ पहुँची है। जब मैंने इसे लिखना शुरू किया था, तब मन में एक संकोच भी था—पता नहीं कोई इसे पढ़ेगा या नहीं, पसंद आएगा या नहीं। क्योंकि मीरा की कथा कोई अनजानी नहीं है; लगभग सभी लोग उनके बारे में जानते और पढ़ चुके हैं।
मीराबाई की भक्ति गोपियों की भाँति माधुर्य रस से ओतप्रोत थी। परंतु जब उनकी भक्ति अपने चरम पर पहुँची, तब उन्होंने तुलसीदास जी से पूछकर घर त्याग दिया।
मैं तो सातवीं कक्षा में ही थी, तभी से मीराबाई के पदों और भजनों का संग्रह कर रही हूँ। मेरे पास लगभग सत्तर-अस्सी भजन और लगभग एक सौ तीस पद हैं—कुछ हिन्दी में, कुछ मारवाड़ी भाषा में।
बचपन में मैं दादाजी को भागवत और रामायण पढ़कर सुनाया करती थी। उनकी आँखों से आँसू बहुत गिरते थे, इसलिए वे स्वयं पढ़ नहीं पाते थे। इसीलिए दादा-दादी को रोज़ दो घंटे भागवत सुनाना और सोते समय पाँच भजन सुनाना मेरा नियम बन गया था।
तब मैं बार-बार पूछती थी—कृष्ण भगवान की इतनी रानियाँ थीं, पर मीरा का नाम तो कहीं नहीं आता। तब दादाजी समझाते—कृष्ण तो द्वापर युग में हुए थे और मीराबाई तो कलयुग में हुई थीं। उन्होंने तो कृष्ण को देखा भी नहीं था।
यह सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य होता था कि जिसे देखा भी नहीं, उससे मीरा इतना प्रेम कैसे कर सकती हैं!
कभी-कभी ऐसा लगता कि मीरा तो जैसे अपने ही समय की हैं—यानी कलयुग की। जब दादाजी बताते कि उस समय मुगलों का राज आ चुका था और हमारी मारवाड़ी जाति में छोटी उम्र में ही विवाह हो जाता था, और यह भी कि मीरा राजस्थान की ही थीं—हमारी ही तरह मेवाड़ी—तब वे मुझे बहुत अपनी-सी लगने लगती थीं।
उनकी अनन्य भक्ति मन को आत्मविभोर कर देती थी। दादाजी अनेक संतों के प्रसंग सुनाया करते थे, पर मेरे लिए सबसे प्रिय पात्र हमेशा मीराबाई ही रहीं।
कहा जाता है कि जब-जब संतों को सताया गया, उस स्थान से शांति चली जाती है। राजस्थान भी कभी सूखाग्रस्त रेगिस्तान ही था, पर जब मीराबाई की भक्ति घर-घर में होने लगी, उनके पद गाए जाने लगे, तब भक्ति की एक लहर फैल गई। आज राजस्थान हरा-भरा दिखाई देता है।
ये मेरे कुछ अपने भाव हैं।
प्रमिला त्रिवेदी
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।। मीरा चरित - प्रवेशांक।।
🔸 राव दूदा जी जैसे तलवार के धनी थे, वैसे ही वृद्धावस्था में उनमें भक्ति भी छलकने लगी थी। पुष्कर आने वाले अधिकांश संतों को मेड़ता आमंत्रित किया जाता और सम्पूर्ण राजपरिवार सत्संग-सागर में अवगाहन कर धन्य हो जाता।
🔻 मीरा का लालन-पालन दूदा जी की देख-रेख में होने लगा। मीरा की सौंदर्य-सुषमा अनुपम थी। उनके भक्ति-संस्कारों को दूदा जी निरंतर पोषित कर रहे थे। वर्ष-भर की मीरा ने दूदा जी से कई छोटे-छोटे कीर्तन सीख लिए थे। किसी भी संत के पधारने पर, दूदा जी की प्रेरणा से मीरा अपनी तोतली वाणी में भजन सुनाती और उनका आशीर्वाद प्राप्त करती। अपने बाबोसा की गोद में बैठकर शांत मन से संतों की कथा-वार्ता सुनती रहती।
🔸 दूदा जी की भक्ति की छत्रछाया में धीरे-धीरे मीरा पाँच वर्ष की हो गई। एक बार ऐसा हुआ कि मीरा प्रातःकाल राजमहल में ठहरे एक संत के समीप जा पहुँची। वे उस समय अपने ठाकुर जी की पूजा कर रहे थे। मीरा ने प्रणाम किया और पास ही बैठ गई। जिज्ञासावश उसने अनेक प्रश्न पूछ डाले—
“ये छोटे-से ठाकुर जी कौन हैं?”
“आप इनकी पूजा कैसे करते हैं?”
संत मीरा के प्रश्नों का एक-एक कर उत्तर देते गए। फिर मीरा बोली—
“यदि यह मूर्ति आप मुझे दे दें, तो मैं भी इनकी पूजा किया करूँगी।”
संत बोले—
“नहीं बेटी! अपने भगवान किसी को नहीं दिए जाते। वे हमारी साधना के साध्य हैं।”
🔻 यह सुनकर मीरा की आँखें भर आईं। निराशा से एक निश्वास छोड़ते हुए उसने ठाकुर जी की ओर देखा और मन-ही-मन कहा—
“यदि तुम स्वयं ही न आओ, तो मैं तुम्हें कहाँ से पाऊँ?”
और फिर भरे मन से उस मूर्ति का ध्यान करती हुई मीरा अपने महल की ओर बढ़ गई…
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।। मीरा चरित - द्वितीय अंक।।
🔻 दूसरे दिन प्रातःकाल मीरा ठाकुर जी के दर्शन हेतु उस संत के निवास पर जा पहुँची। मीरा ने प्रणाम किया और एक ओर बैठ गई। संत ने पूजा का समापन कर मीरा को प्रसाद देते हुए कहा—
“बेटी, तुम ठाकुर जी को पाना चाहती हो न?”
🔸 मीरा: बाबा, किंतु ये तो आपकी साधना के साध्य हैं।
(मीरा ने काँपते स्वर में कहा।)
🔻 बाबा: अब ये तुम्हारे पास रहना चाहते हैं—तुम्हारी साधना के साध्य बनकर। ऐसा मुझे इन्होंने कल रात स्वप्न में कहा कि अब मुझे मीरा को दे दो।
(कहते-कहते बाबा के नेत्र भर आए।)
इनके सामने भला किसकी चलती है?
🔸 मीरा: क्या सच?
(आश्चर्य-मिश्रित प्रसन्नता से बोली, जैसे उसे अपने कानों पर ही विश्वास न हो।)
🔻 बाबा: (भरे कंठ से बोले) हाँ। पूजा तो तुमने देख ही ली है। पूजा भी क्या—अपनी ही तरह नहलाना-धुलाना, वस्त्र पहनाना, श्रृंगार करना, खिलाना-पिलाना। केवल आरती और धूप विशेष हैं।
🔸 मीरा: किंतु वे मंत्र, जो आप बोलते हैं, वे तो मुझे नहीं आते।
🔻 बाबा: मंत्रों की आवश्यकता नहीं है, बेटी। ये मंत्रों के वश में नहीं रहते। ये तो मन की भाषा समझते हैं। इन्हें वश में करने का एक ही उपाय है—इनके सम्मुख हृदय खोलकर रख दो। कोई छिपाव या दिखावा नहीं करना। ये धातु के दिखते हैं, पर हैं नहीं। इन्हें अपने जैसा ही मानना।
🔸 मीरा ने संत के चरणों में सिर रखकर प्रणाम किया और जन्म-जन्म के भूखे की भाँति अंजलि फैला दी। संत ने अपने प्राणधन ठाकुर जी मीरा को सौंपते हुए उसके सिर पर हाथ रखा और गद्गद कंठ से आशीर्वाद दिया—
“भक्ति महारानी अपने पुत्र ज्ञान और वैराग्य सहित तुम्हारे हृदय में निवास करें। प्रभु सदा तुम्हारे सानुकूल रहें।”
🔻 मीरा ने ठाकुर जी को दोनों हाथों से छाती से लगा लिया। उन पर छत्र-सी बनकर वह थोड़ा झुक गई और प्रसन्नता से डगमगाते चरणों के साथ अंतःपुर की ओर चल पड़ी…
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।। मीरा चरित - तृतीय अंक।।
🔺 कृपण के धन की भाँति मीरा ठाकुर जी को अपने से चिपकाए माँ के कक्ष में आ गई। वहाँ एक झरोखे के पास लकड़ी की एक चौकी रखी, उस पर अपनी नई ओढ़नी बिछाई और ठाकुर जी को विराजमान कर दिया। फिर थोड़ी दूरी पर बैठकर उन्हें निहारने लगी। रह-रहकर उसकी आँखों से अश्रु झरने लगे।
🔸 आज की इस उपलब्धि के आगे सारा संसार तुच्छ प्रतीत होने लगा। जो अब तक अपने थे, वे सब पराये हो गए और आज आया हुआ यह मुस्कुराता चेहरा ऐसा अपना लगने लगा, जैसा अब तक कोई न था। सारी हँसी, खुशी और खेल-तमाशे—सब कुछ इन्हीं पर न्यौछावर हो गया। हृदय में मानो उत्साह उमड़ पड़ा कि ऐसा क्या करूँ जिससे ये प्रसन्न हों।
🔺 “अहा! यह मेरी ओर कैसे देख रहे हैं! अरे, मुझसे भूल हो गई। तुम तो भगवान हो और मैं तुमसे ‘तू-तुम’ करके बात कर बैठी। आप कितने अच्छे हैं कि स्वयं कृपा कर उस संत के पास से मेरे पास चले आए। मुझसे कोई भूल हो जाए तो आप रूठना मत—बस मुझे बता देना।
अच्छा, बताओ… उन महात्मा की याद तो नहीं आ रही? वे तो तुम्हें मुझे देते समय रो ही पड़े थे। मैं तुम्हें बहुत अच्छे से रखूँगी—स्नान करवाऊँगी, सुलाऊँगी और ऐसे सजाऊँगी कि सब देखते ही रह जाएँगे। बाबोसा से कहकर तुम्हारे लिए सुंदर पलंग, तकिए, गद्दी और बढ़िया वागे (पोशाक) भी बनवाऊँगी। फिर कभी तुम्हें फुलवारी ले चलूँगी और कभी यहाँ के चारभुजानाथ मंदिर के दर्शन को। वे तो सदा ऐसे सजे रहते हैं, जैसे अभी-अभी दूल्हा बने हों।”
🔸 सरल हृदय से मीरा ने ठाकुर जी से न जाने कितनी ही बातें कर डालीं, मानो उनका मन लगाने का यत्न कर रही हो। न उसे भोजन की सुध थी और न किसी अन्य कार्य में मन लगता था। माँ ने जब ठाकुर जी को देखा, तो स्नेहपूर्वक बोलीं—
“क्या अपने ठाकुर जी को भी भूखा रखेगी? चल, उठ… पहले भोग लगा और फिर तू भी प्रसाद पा।”
🔺 मीरा: अरे हाँ! यह बात तो मैं भूल ही गई।
और फिर उसने भोग की समस्त व्यवस्था की।
🔸 दूदा जी का हाथ पकड़कर मीरा उन्हें अपने ठाकुर जी के दर्शन कराने लाई और सब कुछ विस्तार से बताया।
🔺 मीरा: बाबोसा, उन्होंने स्वयं मुझे ठाकुर जी दिए हैं और कहा है कि स्वप्न में ठाकुर जी ने उनसे कहा—अब मैं मीरा के पास ही रहूँगा।
🔸 दूदा जी ने दर्शन कर प्रणाम किया और बोले—
“भगवान को लकड़ी की चौकी पर क्यों? मैं आज ही चाँदी का सिंहासन मंगवा दूँगा।”
🔺 मीरा: हाँ बाबोसा, और मखमल की गद्दी-तकिए, चाँदी के बर्तन, सुंदर वागे और चंदन का हिंडोला भी।
🔸 दूदा जी: अवश्य बेटा, सब कुछ सांझ तक आ जाएगा।
🔺 मीरा: पर बाबोसा, मैं उन महात्मा से ठाकुर जी का नाम पूछना भूल गई।
🔸 दूदा जी: मनुष्य का तो एक ही नाम होता है, पर भगवान के गुण अनंत हैं—और जैसे गुण, वैसे ही उनके नाम भी अनंत। तुम्हें जो नाम प्रिय लगे, वही चुन लो।
🔺 मीरा: हाँ, आप ही नाम बताइए।
🔸 दूदा जी: कृष्ण, गोविंद, गोपाल, माधव, केशव, मनमोहन, गिरधर…
🔺 “बस… बस बाबोसा!”
मीरा उतावली होकर बोली—
“यह ‘गिरधर’ नाम सबसे अच्छा है। इस नाम का अर्थ क्या है?”
🔸 तब दूदा जी ने अत्यंत स्नेहपूर्वक ठाकुर जी की गिरिराज धारण करने की लीला सुनाई। उसी क्षण से उनका नाम पड़ गया—**गिरधर**।
🔺 यह सुनते ही मीरा भाव-विभोर हो गई और मूर्छा खाकर वहीं गिर पड़ी।
आपका लेखन सचमुच साधना की तरह आगे बढ़ रहा है 🌺
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।।मीरा-चरित - चतुर्थ अंक।।
एक दिन मीरा अपने गिरधर की पूजा से निवृत्त होकर माँ के पास बैठी थीं कि तभी बाहर से आती संगीत की ध्वनि से उसका ध्यान भंग हो गया। वह सहसा उठी और झरोखे के पास जाकर बाहर देखने लगी।
मीरा अपनी माँ को भाबू कहा करती थी।
“भाबू! ये इतने लोग सज-धजकर गाजे-बाजे के साथ कहाँ जा रहे हैं?”
मीरा ने उत्सुकता से पूछा।
“यह तो बारात आई है, बेटा!”
उत्तर देते हुए माँ की आँखों में जाने कितने सपने तैर उठे।
“बारात क्या होती है, भाबू? और ये इतने गहने पहने हाथी पर कौन बैठा है?”
मीरा ने फिर पूछा।
“वह बींद (दूल्हा) है, बेटी। बहू को ब्याहने जा रहा है। हमारे नगर-सेठ जी की बेटी से उसका विवाह होगा।”
माँ ने दूल्हे की ओर देखते हुए कहा।
“क्या सभी बेटियों के वर होते हैं? क्या सभी को ब्याहने बींद आते हैं?”
मीरा ने मासूम जिज्ञासा से पूछा।
“हाँ बेटा, बेटियों को तो ब्याहना ही पड़ता है। बेटी बाप के घर नहीं खटती।”
इतना कहकर माँ ने मीरा को झरोखे से हटाने का उपक्रम किया—
“चलो, अब नीचे चलें।”
पर मीरा अपनी ही धुन में मग्न बोली—
“तो भाबू, मेरा बींद कहाँ है?”
“तेरा वर?”
माँ हँस पड़ीं—
“मैं कैसे जानूँ, बेटी, तेरा वर कहाँ है! जहाँ विधाता ने लेख लिखा होगा, वहीं जाना पड़ेगा।”
यह सुनते ही मीरा उछलकर थोड़ी दूर जा खड़ी हुई और ज़िद करते हुए बोली—
“नहीं, आप मुझे बताइए—मेरा वर कौन है?”
उसकी आँखों में आँसू भर आए।
मीरा की ऐसी ज़िद देखकर माँ आश्चर्य में पड़ गईं। बात संभालते हुए बोलीं—
“बड़ी माँ से या अपने बाबोसा से पूछ लेना।”
“नहीं! मैं किसी से नहीं पूछूँगी। बस आप ही मुझे बताइए।”
कहते-कहते मीरा रो पड़ी और भूमि पर लोट गई।
माँ ने उसे स्नेह से उठाया, मनाया और बोलीं—
“अच्छा, मैं बताती हूँ तेरा वर। तू रो मत। इधर देख—यह कौन है?”
“ये? ये तो मेरे गिरधर गोपाल हैं!”
मीरा ने सहज भाव से कहा।
“अरी पगली! यही तो तेरा वर है। उठ—कब से एक ही बात की रट लगाए बैठी है।”
माँ ने उसे बहलाते हुए कहा। की
“क्या सच, भाबू?”
सुख और आश्चर्य से भरे स्वर में मीरा ने पूछा।
“सच नहीं तो क्या झूठ है? अब चल, मुझे देर हो रही है।”
माँ ने हँसते हुए कहा।
मीरा ने गिरधर की ओर ऐसे देखा, मानो आज उन्हें पहली बार देखा हो। आँखों में अद्भुत चाव और विस्मय था। वह रोना भूल गई।
माँ के सहज-से कहे गए वे शब्द केवल सांत्वना नहीं थे—वे मीरा की नियति भी बन गए, और जीवन भर के लिए उसका संबल और आश्वासन भी।
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।।मीरा-चरित - पाँचवाँ अंक।।
मीरा के इस प्रकार अचेत हो जाने से माँ कुछ व्याकुल हो उठीं। उन्होंने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए समस्त बात रतन सिंह जी को बताई।
वीर कुंवरी की इच्छा थी कि मीरा महल में अन्य राजकुमारियों की भाँति शस्त्राभ्यास, राजनीति, घुड़सवारी तथा गृहस्थी के कार्य सीखे, जिससे वह भविष्य में ससुराल जाकर प्रत्येक परिस्थिति का सुचारु रूप से सामना कर सके। किंतु इधर दूदा जी के संरक्षण में मीरा ने योग और संगीत की शिक्षा प्रारम्भ कर दी थी। मीरा का झुकाव दिन-प्रतिदिन ठाकुर-पूजा की ओर बढ़ता देख माँ की चिंता स्वाभाविक थी।
पूजा और अध्ययन के पश्चात् जो भी अवकाश मीरा को मिलता, वह दूदा जी के साथ बैठकर श्री गदाधर जोशी जी से श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करती। पधारने वाले प्रत्येक संत के सत्संग का वह लाभ उठाती। उसके भक्तिभाव से परिपूर्ण प्रश्नों को सुनकर सभी उसकी विलक्षण प्रतिभा से आश्चर्यचकित हो जाते। माँ को मीरा का संतों से इस प्रकार संवाद करना और उनके समक्ष भजन गाना तनिक भी अच्छा नहीं लगता था, किंतु दूदा जी की लाडली मीरा को कुछ कहना उनके लिए भी सरल न था।
दूदा जी की स्नेहिल छत्रछाया में मीरा की भक्ति निरंतर प्रगाढ़ होती चली गई। वृंदावन से पधारे बाबा बिहारीदास जी से मीरा की नियमित संगीत-शिक्षा भी प्रारम्भ हो गई। रनिवास में प्रायः यही चर्चा रहती—
“अहा! इस रूप-गुण की खान को अन्नदाता हुक्म न जाने क्यों साधु-सा बना रहे हैं?”
एक दिन मीरा ने दूदाजी से निवेदन किया—
“बाबोसा, मुझे अपने गिरधर के लिए एक अलग कक्ष चाहिए। माँ के महल में छोरे-छोरियाँ आकर उनसे मिलते हैं और छेड़छाड़ भी करते हैं।”
दूदाजी ने अपनी लाडली के सिर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए कहा—
“हाँ बेटी, क्यों नहीं।”
और दूसरे ही दिन महल के परकोटे से लगी फुलवारी के मध्य गिरधर गोपाल के लिए एक भव्य मंदिर के निर्माण का कार्य आरम्भ हो गया।
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।।मीरा चरित - छठवाँ अंक।।
🌿 महल के परकोटे में लगी फुलवारी के मध्य गिरधर गोपाल के लिए एक मंदिर बनकर दो महीनों में तैयार हो गया।
धूमधाम से गिरधर गोपाल का गृह-प्रवेश और विधिपूर्वक प्राण-प्रतिष्ठा हुई। मंदिर का नाम रखा गया— श्याम कुंज। अब मीरा का अधिकांश समय श्याम कुंज में ही बीतने लगा।
🌿 ऐसे ही धीरे-धीरे समय बीतने लगा। मीरा पूजा करने के पश्चात् भी श्याम कुंज में ही बैठे-बैठे सुनी और पढ़ी हुई लीलाओं के चिंतन में प्रायः खो जाती।
🌿 वर्षा के दिन थे। चारों ओर हरितिमा छाई हुई थी। ऊपर गगन में मेघ उमड़-घुमड़ कर आ रहे थे। आँखें मूँदे हुए मीरा गिरधर के सम्मुख बैठी है। बंद नयनों के समक्ष उमड़ती हुई यमुना के तट पर मीरा हाथ में भरी हुई मटकी थामे बैठी है। यमुना के जल में श्यामसुंदर की परछाईं देख वह पलक झपकाना भूल गई।
यह रूप—ये कारे, कजरारे, दीर्घ नेत्र…!
मटकी हाथ से छूट गई और उसके साथ न जाने वह भी कैसे जल में जा गिरी। उसे लगा कोई जल में कूद पड़ा है और फिर दो सशक्त भुजाओं ने उसे ऊपर उठा लिया और घाट की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए मुस्कुरा दिया।
वह यह निर्णय नहीं कर पाई कि कौन अधिक मारक है—दृष्टि या मुस्कान? निर्णय हो भी कैसे? बुद्धि तो लोप हो गई थी, लज्जा ने देह को जड़ कर दिया था, और मन—? मन तो बैरी बन उनकी आँखों में जा समाया था।
🌿 उसे शिला के सहारे घाट पर बिठाकर वे मुस्कुराते हुए जल से उसका घड़ा निकाल लाए। हँसते हुए, अपनत्व से भरे कितने ही प्रश्न उन्होंने ब्रज भाषा में पूछ डाले।
अमृत-सी वाणी वातावरण में रस घोलती प्रतीत हुई—
“थोड़ा विश्राम कर ले, फिर मैं तेरो घड़ो उठवाय दूँगो।
कहा नाम है री तेरो? बोलेगी नाय?
मो पै रूठी है क्या?
भूख लगी है का?
तेरी मैया ने कछु खवायो नाय?
ले, मो पै फल है। खावेगी?”
उन्होंने फेंट से बड़ा सा अमरूद और थोड़े जामुन निकालकर उसके हाथ पर धर दिए—
“ले, खा।”
🌿 वह क्या कहती! आँखों से दो आँसू ढुलक पड़े। लज्जा ने जैसे वाणी को बाँध लिया था।
“कहा नाम है तेरो?”
“मी…रा…”
बहुत खींचकर बस इतना ही कह पाई।
वे खिलखिलाकर हँस पड़े—
“कितनो मधुर स्वर है तेरो री।”
🌿 “श्यामसुंदर! कहाँ गए प्राणाधार!”
वह एकाएक चीख उठी।
समीप ही फुलवारी से चंपा और चमेली दौड़ी आईं। देखा—मीरा अत्यंत व्याकुल थीं और आँखों से आँसू झर रहे थे। दोनों ने मिलकर शय्या बिछाई और यत्नपूर्वक मीरा को उस पर सुला दिया।
सांयकाल तक मीरा की स्थिति कुछ सुधरी। तब वह तानपुरा लेकर गिरधर के सामने जा बैठी। फिर हृदय के उद्गार प्रथम बार पद के रूप में प्रस्फुटित हो उठे—
मेहा बरसिबो करे रे,
आज तो रमैया म्हारे घरे रे।
नान्हीं-नान्हीं बूंद मेघघन बरसे,
सूखा सरवर भरे रे॥
घणा दिनां सूं प्रीतम पायो,
बिछुड़न को मोहि डर रे।
मीरा कहे अति नेह जुड़ायो,
मैं लियो पुरबलो वर रे॥
🌿 पद पूर्ण हुआ तो मीरा का हृदय भी जैसे कुछ हल्का हो गया। पथ पाकर जैसे जल दौड़ पड़ता है, वैसे ही मीरा की भाव-सरिता भी शब्दों में ढलकर पदों के रूप में उन्मुक्त बह निकली।
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।।मीरा चरित - सातवाँ अंक।।
“मीरा दस वर्ष की हो गई है। इसकी सगाई–संबंध की चिंता नहीं करते आप?”
वीरमदेव जी बोले,
“चिंता तो होती है, पर मीरा का व्यक्तित्व, प्रतिभा और रुचि असाधारण है। फिर बाबोसा मीरा के ब्याह के बारे में क्या सोचते हैं—यह भी पूछना पड़ेगा।”
🌿 “बेटी की रुचि साधारण हो या असाधारण—पर विवाह तो करना ही पड़ेगा,” बड़ी माँ ने कहा।
“पर मीरा के योग्य कोई पात्र ध्यान में हो, तभी मैं अन्नदाता-हुक्म से बात करूँ।”
🌿 “एक पात्र तो मेरे ध्यान में है—मेवाड़ के महाराजकुमार और मेरे भतीजे भोजराज।”
“क्या कहती हो! हँसी तो नहीं कर रही?”
“अगर ऐसा हो जाए तो हमारी बेटी के भाग्य खुल जाएँ। वैसे मीरा है भी उसी घर के योग्य,” प्रसन्न होकर वीरमदेव जी ने कहा।
गिरिजा जी ने अपनी ओर से पूर्ण प्रयत्न करने का आश्वासन दिया।
🌿 मीरा की सगाई मेवाड़ के महाराजकुमार से होने की चर्चा रनिवास में चलने लगी। मीरा ने भी यह सुना। वह पत्थर की मूर्ति की भाँति कुछ देर तक स्थिर रह गई। फिर सोचने लगी—
“माँ ने ही बताया था कि तेरा वर गिरधर गोपाल हैं, और अब माँ ही मेवाड़ के राजकुमार के नाम से इतनी प्रसन्न है… तब किससे पूछूँ?”
वह धीमे कदमों से दूदाजी के महल की ओर चल पड़ी।
🌿 पलंग पर बैठे दूदाजी जप कर रहे थे। मीरा को यूँ अप्रसन्न देखकर बोले,
“क्या बात है, बेटा?”
“बाबोसा! एक बेटी के कितने बींद होते हैं?”
बींद—अर्थात पति।
🌿 दूदाजी ने स्नेह से मीरा के सिर पर हाथ रखा और हँसकर बोले,
“क्यों पूछती हो, बेटी? वैसे एक बेटी का एक ही बींद होता है। एक बींद की बहुत-सी बींणियाँ तो हो सकती हैं, पर किसी भी तरह एक कन्या के एक से अधिक वर नहीं होते। पर ऐसा प्रश्न क्यों?”
🌿 “बाबोसा! एक दिन मैंने बारात देख माँ से पूछा था कि मेरा बींद कौन है। उन्होंने कहा था—तेरा बींद गिरधर गोपाल है। और आज… आज…”
हिलकियाँ भरते हुए वह बोली,
“आज भीतर सब मुझे मेवाड़ के राजकुमार से ब्याहने की बात कर रहे हैं।”
दूदाजी ने अपनी लाडली को चुप कराते हुए कहा,
“तूने भाबू से पूछा नहीं?”
🌿 “पूछा! तो वह कहती हैं—
‘वह तो तुझे बहलाने के लिए कहा था। पीतल की मूरत भी कभी किसी का पति होती है? अरी, बड़ी माँ के पैर पूज। यदि मेवाड़ की राजरानी बन गई तो समझ कि भाग्य खुल गया।’
आप ही बताइए, बाबोसा! क्या मेरे गिरधर केवल पीतल की मूरत हैं? संतों ने कहा है न कि यह विग्रह (मूर्ति) भगवान का प्रतीक है। प्रतीक वैसे ही तो नहीं बन जाता—कोई होता है, तभी उसका प्रतीक बनाया जाता है। जैसे आपका चित्र कागज़ का होता है, पर उसे देखते ही कोई भी कह देगा कि यह दूदाजी राठौड़ हैं। आप हैं, तभी तो आपका चित्र बना है। यदि गिरधर नहीं हैं, तो उनका प्रतीक कैसा?”
🌿 “भाबू कहती हैं—‘भगवान को किसने देखा है? कहाँ हैं? कैसे हैं?’
मैं कहती हूँ, बाबोसा—वे कहीं भी हों, जैसे भी हों, पर हैं; तभी तो मूरत बनी है, चित्र बने हैं। ये शास्त्र, ये संत—सब झूठे हैं क्या? इतनी बड़ी उम्र में आप क्यों राज्य का भार बड़े कुंवरसा पर छोड़कर माला फेरते हैं? क्यों मंदिर पधारते हैं? क्यों सत्संग करते हैं? क्यों लोग अपने प्रियजनों को छोड़कर उन्हें पाने के लिए साधु हो जाते हैं? बताइए न, बाबोसा!”
मीरा ने रोते-रोते कहा।
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।।मीरा चरित - आठवाँ अंक।।
“आप कुछ तो कहिए, बाबोसा! मेरा जी घबराता है। किससे पूछूँ यह सब? भाबू ने पहले मुझे क्यों कहा कि गिरधर ही मेरे वर हैं, और अब स्वयं ही अपने कहे पर पानी फेर रही हैं? जो हो ही नहीं सकता, उसका क्या उपाय? आप ही बताइए—क्या तीनों लोकों के धणी (स्वामी) से भी बड़ा मेवाड़ का राजकुमार है? और यदि है भी, तो होने दो—मुझे नहीं चाहिए।”
🌿 “तू रो मत, बेटा! धैर्य धर।”
उन्होंने दुपट्टे के छोर से मीरा का मुँह पोंछा—
“तू चिंता मत कर। मैं सबको कह दूँगा कि मेरे जीते-जी मीरा का विवाह नहीं होगा। तेरे वर गिरधर गोपाल हैं और वही रहेंगे। किंतु मेरी लाड़ली! मैं बूढ़ा हूँ—कुछ दिन का ही मेहमान।
मेरे मरने के पश्चात यदि ये लोग तेरा ब्याह कर दें, तो तू घबराना मत। सच्चा पति तो मन का ही होता है। तन का पति भले कोई बने, मन का पति ही पति होता है। गिरधर तो प्राणी-मात्र के धणी हैं—और धणी यानी पति। वे अन्तर्यामी हैं; उनसे तेरे मन की बात छिपी नहीं है, बेटा। तू निश्चिंत रह।”
“सच फरमा रहे हैं, बाबोसा?”
“सर्वथा साँच, बेटा।”
🌿 “तो फिर मुझे तन का पति नहीं चाहिए। मन का पति ही पर्याप्त है।”
दूदाजी से यह आश्वासन पाकर मीरा के मन को कुछ राहत मिली।
🌿 दूदाजी के महल से मीरा सीधे श्याम कुंज की ओर चली। कुछ क्षण अपने प्राणाराध्य गिरधर गोपाल की ओर एकटक देखती रही। फिर तानपुरा झंकृत होने लगा। आलाप लेकर वह गाने लगी—
आओ मनमोहना जी, जोऊँ थाँरी बाट।
खान-पान मोहि नेक न भावे, नैणन लगे कपाट॥
तुम आयाँ बिन सुख नहीं मेरे, दिल में बहुत उचाट।
मीरा कहे मैं भई रावरी, छाँड़ो नाहिं निराट॥
🌿 भजन पूरा हुआ तो वह अधीरतापूर्वक नीचे झुकी और दोनों भुजाओं में सिंहासन सहित अपने हृदयधन को बाँधकर चरणों में सिर टेक दिया। नेत्रों से झरते आँसू उनका अभिषेक करने लगे। हृदय पुकार उठा—
“आओ, सर्वस्व! इस तुच्छ दासी की आतुर प्रतीक्षा सफल कर दो। आज तुम्हारी साख और प्रतिष्ठा दाँव पर लगी है।”
🌿 उसे फूट-फूटकर रोते देखकर मिथुला ने धैर्य बँधाया। बोली—
“प्रभु तो अन्तर्यामी हैं। आपकी व्यथा उनसे छिपी नहीं है।”
“मिथुला, तुम्हें लगता है वे मेरी सुध लेंगे? वे तो बहुत बड़े हैं… मेरी क्या गिनती? मुझ जैसे करोड़ों जन बिलबिलाते रहते हैं। किंतु मिथुला! मेरे तो केवल वही एक अवलंब हैं। न सुनें, न आएँ—तब भी मेरा क्या वश है?”
कहते-कहते मीरा ने मिथुला की गोद में मुँह छिपा लिया।
🌿 “पर आप क्यों भूल जाती हैं, बाईसा, कि वे भक्तवत्सल हैं, करुणासागर हैं, दीनबंधु हैं। भक्त की पीड़ा वे नहीं सह पाते—दौड़े आते हैं।”
“किंतु मैं भक्त कहाँ हूँ, मिथुला? मुझसे भजन बनता ही कहाँ है? मुझे तो केवल वे अच्छे लगते हैं। वे मेरे पति हैं—मैं उनकी हूँ। क्या वे कभी अपनी इस दासी को अपनाएँगे? उनके तो सोलह हज़ार एक सौ आठ पत्नियाँ हैं—उनके बीच मेरी प्रेमहीन, रूखी-सूखी पुकार वे सुन पाएँगे क्या? तुझे क्या लगता है, मिथुला—वे कभी मेरी ओर देखेंगे भी क्या?”
इतना कहते-कहते मीरा अचेत होकर मिथुला की गोद में लुढ़क गई।
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।।मीरा-चरित - नवाँ अंक।।
🌿 आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है। राजमंदिर और श्याम कुंज में प्रातःकाल से ही उत्सव की तैयारियाँ आरंभ हो गई हैं। मीरा का मन विकल है, पर कहीं न कहीं यह आश्वासन भी है कि प्रभु आज अवश्य पधारेंगे। बाहर गए हुए लोग, भले ही नौकरी पर गए हों, सभी पुरुष तीज तक घर लौट आते हैं। फिर आज तो उनका जन्मदिन है—कैसे न आएँगे भला? पति के आने पर स्त्रियाँ कितना शृंगार करती हैं—तो मैं क्या ऐसे ही रहूँगी? तब… मैं भी क्यों न पहले से ही शृंगार धारण कर लूँ? कौन जाने, कब पधार जाएँ वे!
🌿 मीरा ने मंगला से कहा, “जा, मेरे लिए उबटन, सुगंध और शृंगार की सारी सामग्री ले आ।” और चंपा से बोली कि माँ के पास जाकर सबसे सुंदर काम वाली पोशाक और आभूषण ले आए।
🌿 सभी को प्रसन्नता हुई कि मीरा आज शृंगार कर रही है। बाबा बिहारी दास जी की इच्छा थी कि आज रात मीरा चारभुजानाथ के यहाँ होने वाले भजन-कीर्तन में उनका साथ दे। बाबा की इच्छा जानकर मीरा असमंजस में पड़ गई। थोड़ी देर सोचने के बाद बोली, “बाबा, रात्रि के प्रथम प्रहर में राजमंदिर में रहकर आपकी आज्ञा का पालन करूँगी और फिर, यदि आप आज्ञा दें, तो जन्म के समय श्याम कुंज में आ जाऊँ?”
“अवश्य, बेटी!” उस समय तो तुम्हें श्याम कुंज में ही होना चाहिए,” बाबा ने मीरा के मनोभावों को समझते हुए कहा। “मेरी तो यह इच्छा थी कि तुम मेरे साथ एक बार मंदिर में गाओ। बड़ी होने पर तो तुम महलों में बंद हो जाओगी। कौन जाने, ऐसा सुयोग फिर कब मिले!”
🌿 आज मीरा नख से शिख तक शृंगार किए चारभुजानाथ के मंदिर में राव दूदाजी और बाबा बिहारी दास जी के बीच तानपुरा लेकर बैठी हुई पदगायन में बाबा का साथ दे रही है। मीरा के रूप-सौंदर्य के अतुलनीय भंडार के द्वार आज शृंगार ने उद्घाटित कर दिए थे। नवबालवधू के रूप में मीरा को देखकर सभी राजपुरुषों के मन में यह विचार स्फुरित होने लगा कि मीरा किसी अत्यंत गरिमामय घर-वर के योग्य है। वीरमदेव जी भी आज अपनी बेटी का रूप देखकर चकित रह गए और मन ही मन दृढ़ निश्चय किया कि चित्तौड़ की महारानी का पद ही मीरा के लिए उपयुक्त स्थान है।
🌿 “बेटी! अब तुम अपने संगीत के द्वारा सेवा करो।” बाबा बिहारी दास जी ने गर्व से अपनी योग्य शिष्या से कहा।
मीरा ने उठकर पहले गुरुचरणों में प्रणाम किया, फिर चारभुजानाथ और दूदाजी आदि बड़ों को प्रणाम कर गायन प्रारंभ किया। आलाप की तान लेते ही मीरा ने संपूर्ण वातावरण को बाँध दिया—
बसो मेरे नैनन में नंदलाल।
मोहिनी मूरत, साँवरी सूरत, नैना बने विशाल।
अधर सुधा-रस, मुरली राजत, उर वैजंती माल॥
क्षुद्र घंटिका कटि-तट शोभित, नूपुर शब्द रसाल।
मीरा प्रभु संतन सुखदायी, भगत-बछल गोपाल॥
🌿 वहाँ उपस्थित सभी भक्तजन मीरा के गायन से मंत्रमुग्ध हो गए। बिहारी दास जी सहित दूदाजी मीरा का वह स्वरचित पद सुनकर चकित एवं प्रसन्न हो उठे। दोनों आनंदित होकर गद्गद स्वर में बोले, “वाह, बेटी!”
मीरा ने संकोचवश अपने नेत्र झुका लिए। बाबा ने उमंग से मीरा से एक और भजन गाने का आग्रह किया, तो उसने फिर से तानपुरा उठाया। इस बार मीरा ने ठाकुर जी की करुणा का बखान करते हुए पद गाया—
सुण लीजो बिनती मोरी,
मैं सरण गही प्रभु तोरी।
तुम तो पतित अनेक उधारे,
भव-सागर से तारे।
…
…
मीरा प्रभु तुम्हरे रंग राती,
या जानत सब दुनियाई॥
🌿 दूदाजी नेत्र मूँदकर एकाग्र भाव से श्रवण कर रहे थे। भजन समाप्त होने पर उन्होंने आँखें खोलीं, प्रशंसा भरी दृष्टि से मीरा की ओर देखा और बोले, “आज मेरा जीवन धन्य हो गया। बेटा, तूने अपने वंश—अपने पिता और पितृव्यों—को धन्य कर दिया।” फिर मीरा के सिर पर हाथ रखते हुए, अपने वीर पुत्रों की ओर देखते हुए, अश्रु-विगलित स्वर में बोले, “इनकी प्रचंड वीरता और देश-प्रेम को कदाचित लोग भूल जाएँ, पर मीरा, तेरी भक्ति और तेरा नाम अमर रहेगा, बेटा… अमर रहेगा।”
उनकी आँखें छलक पड़ीं।
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।।मीरा चरित - दसवाँ अंक।।
“बाबा, आप पधार रहे हैं?”
“हाँ बेटी! वृद्ध हो गया है अब तेरा यह बाबा। अंतिम समय तक वृन्दावन में श्री राधामाधव के चरणों में ही रहना चाहता हूँ।”
“बाबा! मुझे यहाँ कुछ भी अच्छा नहीं लगता। मुझे भी अपने साथ वृन्दावन ले चलिए न, बाबा।”
मीरा ने दोनों हाथों से मुँह ढाँपकर सुबकते हुए कहा।
“श्री राधे! श्री राधे!”
बिहारी दास जी कुछ बोल नहीं पाए। उनकी आँखों से भी अश्रुपात होने लगा। कुछ क्षण पश्चात उन्होंने मीरा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
“हम सब स्वतंत्र नहीं हैं, पुत्री। वे जब, जैसा रखना चाहें… उनकी इच्छा में ही प्रसन्न रहना चाहिए। भगवत्प्रेरणा से ही मैं इधर आया था। मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था कि शिष्या के रूप में तुम जैसा रत्न पा जाऊँगा। तुम्हारी शिक्षा में तो मैं केवल निमित्त मात्र रहा। तुम्हारी बुद्धि, श्रद्धा, लगन और भक्ति ने मुझे सदा आश्चर्यचकित किया है। तुम्हारी सरलता, भोलापन और विनय ने मेरे हृदय के वात्सल्य पर एकाधिपत्य स्थापित कर लिया। राव दूदाजी का प्रेम, विनय और संत-सेवा का भाव—इन सबने मुझ विरक्त को भी इतने दिन बाँध रखा। किंतु बेटा! जाना तो होगा ही।”
“बाबा! मैं क्या करूँ? मुझे आशीर्वाद दीजिए कि…”
मीरा की रोते-रोते हिचकी बँध गई—
“मुझे भक्ति प्राप्त हो, अनुराग प्राप्त हो, और श्यामसुन्दर मुझ पर प्रसन्न हों।”
उसने बाबा के चरण पकड़ लिए।
बाबा कुछ बोल न सके। बस उनकी आँखों से झर-झर आँसू चरणों में पड़ी मीरा को सिक्त करते रहे। फिर भरे कंठ से बोले—
“श्री किशोरी जी और श्रीश्यामसुन्दर तुम्हारी मनोकामना पूर्ण करें। पर जब मैं एक ओर तुम्हारी भाव-भक्ति और दूसरी ओर समाज के बंधनों का विचार करता हूँ, तो मेरे प्राण व्याकुल हो उठते हैं। बस यही प्रार्थना करता हूँ कि तुम्हारा मंगल हो। चिंता न करो, पुत्री! तुम्हारे रक्षक स्वयं गिरधर हैं।”
अगले दिन जब बाबा श्याम कुंज में ठाकुर को प्रणाम करने आए, तो मीरा और बाबा की झरती आँखों ने वहाँ उपस्थित सब जनों को रुला दिया।
मीरा अश्रुओं से भीगी वाणी में बोली—
“आप वृन्दावन जा रहे हैं, बाबा! क्या मेरा एक संदेश ले जाएँगे?”
“बोलो बेटी! तुम्हारा संदेश-वाहक बनकर तो मैं भी कृतार्थ हो जाऊँगा।”
मीरा ने कक्ष में दृष्टि डाली। दासियों-सखियों के अतिरिक्त दूदाजी और रायसल काका भी वहाँ उपस्थित थे। लाज के मारे वह कुछ कह न सकी। शीघ्रता से काग़ज़-कलम लेकर लिखने लगी। हृदय के भाव तरंगों की भाँति उमड़ आए; आँसुओं से दृष्टि धुँधला गई। वह ओढ़नी से आँसू पोंछती और फिर लिखती जाती। लिखकर उसने मन-ही-मन पढ़ा—
🌿 गोविन्द…
गोविन्द, कबहुँ मिलै पिया मेरा।
🌿 चरण-कँवल को हँस-हँस देखूँ,
राखूँ नैना नेरा।
निरखन का मोहि चाव घनेरो,
कब देखूँ मुख तेरा॥
🌿 व्याकुल प्राण धरत नहीं धीरज,
मिल तू मीत सवेरा।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर,
ताप तपन बहु तेरा॥
पत्र को समेटकर, सुंदर रेशमी थैली में रखकर, मीरा ने पूर्ण विश्वास से उसे बाबा की ओर बढ़ा दिया। बाबा ने उसे लेकर सिर से लगाया और उतने ही विश्वास से गोविन्द को देने हेतु अपने झोले में सहेज लिया। सबने गिरधर को प्रणाम किया। मीरा ने पुनः प्रणाम किया।
बिहारी दास जी के जाने से ऐसा प्रतीत हुआ, मानो गुरु, मित्र और मार्गदर्शक—तीनों ही खो गए हों। नीचे **।।मीरा चरित – ग्यारहवाँ अंक।।** को
➡️ **वर्तनी, व्याकरण, विराम-चिह्न, शब्द-प्रयोग, प्रवाह और शैली**—सभी दृष्टियों से **शुद्ध, परिष्कृत और त्रुटिरहित** रूप में प्रस्तुत किया गया है।
भाव, कथ्य और साहित्यिक गरिमा को पूर्णतः सुरक्षित रखा गया है।
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।।मीरा चरित - ग्यारहवाँ अंक।।
राव दूदाजी अब अस्वस्थ रहने लगे थे। अपना अंत समय समीप जानकर उनकी ममता मीरा पर और अधिक बढ़ गई थी। उसके मुख से भजन सुने बिना उन्हें दिन सूना लगता। मीरा भी समय मिलते ही दूदाजी के पास जा बैठती, उनके साथ भगवत्-चर्चा करती और अपने तथा अन्य संतों द्वारा रचे गए पद सुनाती।
ऐसे ही उस दिन मीरा गिरधर की सेवा-पूजा कर बैठी ही थी कि गंगा ने आकर बताया कि दूदाजी ने आपको याद फरमाया है। मीरा जब उनके कक्ष में पहुँची तो देखा—पलंग के पास पाँचों पुत्र, दीवान जी, राजपुरोहित और राजवैद्य जी—सभी उपस्थित थे।
सहसा आँखें खोलकर दूदाजी ने पुकारा,
“मीरा…”
“जी, मैं हाजिर हूँ, बाबोसा,” मीरा पास आकर बोली।
“मीरा, भजन गाओ बेटी!”
मीरा ने ठाकुर जी की भक्तवत्सलता का एक पद गाया। पद पूर्ण होने पर दूदाजी ने चारभुजानाथ के दर्शन की इच्छा प्रकट की। तुरंत पालकी मँगवाई गई। उन्हें पालकी में पौढ़ाया गया और चारों पुत्र कहार बने। वीरमदेव जी छत्र लेकर पिताजी के साथ चले। दो घड़ी तक दर्शन करते रहे। पुजारी जी ने चरणामृत, तुलसी-माला और प्रसाद प्रदान किया।
वहाँ से लौटते समय श्याम कुंज में गिरधर गोपाल के दर्शन किए और मन ही मन कहा—
“अब चल रहा हूँ, स्वामी! अपनी मीरा को संभाल लेना, प्रभु।”
महल में वापस लौटकर वे थोड़ी देर आँखें मूँदकर लेटे रहे। फिर अपनी तलवार वीरमदेव जी को देते हुए बोले—
“प्रजा की रक्षा और राज्य के संचालन का पूर्ण दायित्व तुम्हारे सबल स्कंध वहन करें।”
मीरा और जयमल को पास बुलाकर आशीर्वाद देते हुए कहा—
“प्रभु-कृपा से तुम दोनों के शौर्य और भक्ति से मेड़तिया कुल का यश संसार में गाया जाएगा। भारत की भक्तमाल में तुम दोनों का सुयश पढ़-सुनकर लोग भक्ति और शौर्य के पथ पर चलने का उत्साह पाएँगे।”
उनकी आँखों से मानो आशीर्वाद-स्वरूप आँसू झरने लगे।
वीरमदेव जी ने विनम्रतापूर्वक पूछा,
“पिताजी, आपकी कोई इच्छा हो तो आज्ञा दें।”
“बेटा! सारा जीवन संत-सेवा का सौभाग्य मिलता रहा। अब संसार छोड़ते समय बस संत-दर्शन की ही लालसा है। पर यह तो प्रभु के हाथ की बात है।”
उसी क्षण वीरमदेव जी ने पुष्कर की ओर सवार दौड़ाए—संत की खोज में।
मीरा को आज्ञा मिली तो वह गाने लगी—
🌿 नहीं ऐसो जनम बारंबार।
क्या जानूँ, कुछ पुण्य प्रगटे, मानुसा अवतार॥
🌿 बढ़त पल-पल, घटत दिन-दिन, जात न लागे बार।
बिरछ के ज्यों पात टूटे, लगे नहिं पुनि डार॥
🌿 भवसागर अति जोर कहिए, विषम ऊँडी धार।
राम-नाम का बाँध बेड़ा, उतर परले पार॥
🌿 ज्ञान चौसर मंडी चौहटे, सुरत पासा सार।
या दुनिया में रची बाजी, जीत भावै हार॥
🌿 साधु-संत महंत ज्ञानी, चलत करत पुकार।
दास मीरा लाल गिरधर, जीवणा दिन चार॥
पद पूर्ण कर मीरा ने अभी तानपुरा रखा ही था कि द्वारपाल ने आकर निवेदन किया—
“अन्नदाता! दक्षिण से श्री चैतन्यदास नाम के संत पधारे हैं।”
यह सुनते ही दूदाजी एकदम चैतन्य हो उठे। मानो बुझते हुए दीपक की लौ फिर से भभक उठी हो। आँखें खोलकर उन्होंने संत को ससम्मान पधराने का संकेत किया। सभी लोग राजपुरोहित जी के साथ स्वागत हेतु आगे बढ़ ही रहे थे कि द्वार से एक गंभीर और मधुर स्वर गूँजा—
“राधेश्याम…”
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।।मीरा चरित - बारहवाँ अंक।।
मीरा के दूदाजी, परम वैष्णव भक्त, आज अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर थे। लगभग समस्त परिवार उनके कक्ष में एकत्र था, पर उन्हें एक ही लालसा थी—कि संसार छोड़ते समय वे संत-दर्शन कर पाएं।
उसी क्षण द्वार से मधुर स्वर सुनाई दिया—
“राधेश्याम!”
दूदाजी में मानो चेतना लौट आई। सबकी दृष्टि उस ओर उठ गई। मस्तक पर घुँघराले कृष्ण केश, भाल पर तिलक, कंठ और हाथों में तुलसी-माला से विभूषित, श्वेत वस्त्रधारी, भव्य मुखमंडल वाले एक वैष्णव संत के दर्शन हुए।
संत के मुख से “राधेश्याम”—यह प्रियतम का नाम सुनकर उल्लसित हुई मीरा ने उन्हें प्रणाम किया। फिर दूदाजी से बोली—
“आपको संत-दर्शन की इच्छा थी न, बाबोसा? देखिए, प्रभु ने कैसी कृपा की।”
संत ने मीरा को आशीर्वाद दिया और परिस्थिति समझते हुए स्वयं दूदाजी के समीप चले गए। पुत्रों ने संकेत पाकर पिता को सहारे से बैठाया। दूदाजी ने प्रणाम कर कहा—
“कहाँ से पधारना हुआ, महाराज?”
“मैं दक्षिण से आ रहा हूँ, राजन। मेरा नाम चैतन्यदास है। कुछ समय पूर्व गौड़देश के प्रेमी सन्यासी श्रीकृष्ण चैतन्य तीर्थाटन करते हुए मेरे गाँव पधारे थे और मुझ पर कृपा कर श्रीवृंदावन जाने की आज्ञा दी।”
“श्रीकृष्ण चैतन्य—सन्यासी होकर भी प्रेमी हैं, महाराज?” मीरा ने उत्सुकता से पूछा।
“हाँ,” संत बोले, “वे दिल खोलकर सबको मुक्त रूप से प्रेमदान करते हैं।”
इतना कहते-कहते उनका कंठ भाव से भर आया।
मीरा और दूदाजी—दोनों की आँखें ऐसे रसमय सत्संग को पाकर अश्रुपूरित हो उठीं। फिर संत कहने लगे—
“मैं दक्षिण से पंढरपुर आया, तो वहाँ मुझे एक वृद्ध सन्यासी—केशवानंद जी—मिले। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि मैं वृंदावन जा रहा हूँ, तो उन्होंने मुझे एक प्रसादी माला देते हुए कहा—‘तुम पुष्कर होते हुए मेड़ता जाना और वहाँ के राजा दूदाजी राठौड़ को यह माला देकर कहना कि वे इसे अपनी पौत्री को दे दें।’
पंढरपुर से चलकर मैं पुष्कर आया, और देखिए—प्रभु ने मुझे ठीक समय पर यहाँ पहुँचा दिया।”
इतना कहकर संत ने अपने झोले से माला निकालकर दूदाजी की ओर बढ़ाई।
दूदाजी ने संकेत से मीरा को उसे लेने को कहा। मीरा ने बड़ी श्रद्धा और प्रसन्नता से उसे अंजलि में लेकर मस्तक से लगाया।
दूदाजी लेट गए और बोले—
“केशवानंद जी मीरा के जन्म से पूर्व पधारे थे। उन्हीं के आशीर्वाद का फल है यह मीरा। महाराज, आज तो आपके रूप में स्वयं भगवान पधारे हैं।
यों तो मैंने सदा संतों को भगवत्स्वरूप मानकर, जैसी बन पड़ी, सेवा की है—किन्तु आज महाप्रयाण के समय आपके पधारने से मेरा मरण भी सुधर गया।”
उनके बंद नेत्रों की कोरों से अश्रुधारा बह चली। फिर बोले—
“कर्तव्यपरायण और वीर पुत्र, फुलवारी-सा यह परिवार, भक्तिमती पौत्री मीरा, अभिमन्यु-सा पौत्र जयमल—ऐसे भरे-पूरे परिवार को छोड़कर जाना मेरा सौभाग्य है।”
फिर पुकारा—
“मीरा!”
“हुक्म, बाबोसा!”
“जाते समय एक भजन सुना दे, बेटा।”
मीरा ने आज्ञा पाकर तानपुरा उठाया और गाने लगी—
🌿
मैं तो तेरी शरण पड़ी रे रामा,
ज्यूँ जाणे सो तार।
अड़सठ तीरथ भ्रमि-भ्रमि आयो,
मन नहीं मानी हार।
या जग में कोई नहीं अपणा,
सुणियो श्रवण कुमार।
मीरा दासी राम भरोसे,
जम का फेरा निवार।
🌿
मधुर संगीत और भावमय पद सुनकर चैतन्यदास स्वयं को रोक न सके—
“धन्य, धन्य हो मीरा! तुम्हारा आलौकिक प्रेम, संतों के प्रति श्रद्धा, भक्ति की लगन, मोहित करने वाला कंठ और प्रेम-रस में पगे ये नेत्र—इन सबको देखकर तो ऐसा प्रतीत होता है मानो तुम कोई ब्रज-गोपिका हो।
वे जन धन्य होंगे, जो तुम्हारी भक्ति-प्रेम की वर्षा में भीगकर आनंद लूटेंगे। धन्य है यह वंश, जिसमें यह नारी-रत्न प्रकट हुआ।”
मीरा ने सिर झुकाकर प्रणाम किया और अत्यंत विनम्रता से बोली—
“महाराज, कोई भी अपने से कुछ नहीं होता…”
संत कुछ आहार लेकर चलने को प्रस्तुत हुए। रात्रि बीत गई। दूदाजी का अंतर्मन चैतन्य था, पर शरीर शिथिल हो चला था।
ब्राह्ममुहूर्त में मीरा ने दासियों के साथ धीमे-धीमे संकीर्तन आरंभ किया—
🌿
जय चतुर्भुजनाथ दयाल।
जय सुंदर गिरधर गोपाल॥
🌿
दूदाजी के मुख से अस्फुट स्वर निकले—
“प्र…भु… प…धार… रहे… हैं… जय… हो…”
पुरोहित जी ने तुलसी-मिश्रित चरणामृत दिया।
मीरा की भक्ति-संस्कारों को पोषण देने वाले, मेड़ता राज्य के संस्थापक, परम वैष्णव भक्त, वीर-शिरोमणि राव दूदाजी पचहत्तर वर्ष की आयु में यह भव त्यागकर गोलोक सिधार गए।
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।। मीरा चरित - तेरहवाँ अंक।।
मीरा के विवाह की बात कुंवर भोजराज के साथ चल रही थी।
कुंवर भोजराज पहली बार बुआ गिरिजा के ससुराल आए थे। बुआ के दुलार की तो कोई सीमा ही न थी। एक तो मेवाड़ के उत्तराधिकारी, दूसरे गिरिजा जी के लाडले भतीजे और तीसरे मेड़ता के भावी जमाई—इन तीनों कारणों से पल-पल महल में सभी उनकी आवभगत में लगे रहते थे।
जयमल और भोजराज की सहज ही मैत्री हो गई। दोनों इधर-उधर घूमते-घामते फुलवारी में आ निकले। सुंदर श्याम कुंज मंदिर को देखकर भोजराज के पाँव अनायास ही उसी ओर बढ़ गए। भीतर से आती मीठी रागिनी सुनकर उन्होंने उत्सुकता से जयमल की ओर देखा।
जयमल ने कहा,
“मेरी बड़ी बहन मीरा हैं। इनके रोम-रोम में भक्ति बसी हुई है।”
“और जैसे आपके रोम-रोम में वीरता बसी हुई है,”
भोजराज ने हँसकर कहा।
“भक्ति और वीरता—भाई-बहन की ऐसी जोड़ी कहाँ मिलेगी? विवाह कहाँ हुआ है इनका?”
“विवाह?”
जयमल ठिठक गया।
“विवाह की क्या बात फरमाते हैं आप? विवाह का नाम सुनते ही जीजी की आँखों से तो आँसुओं के झरने बहने लगते हैं। हुआ यूँ कि एक बार किसी बारात को देखकर जीजी ने काकीसा से पूछा—‘हाथी पर यह कौन बैठा है?’
काकीसा ने बताया—‘नगर सेठ की बेटी का वर है।’
यह सुनते ही जीजी ने जिद पकड़ ली—‘मेरा वर बताओ।’
काकीसा ने चुप कराने के लिए कह दिया—‘तेरा वर गिरधर गोपाल है।’
बस, उसी क्षण से इन्होंने भगवान को ही अपना वर मान लिया। दिन-रात भजन-पूजन, भोग-राग, नृत्य-गान—सब उन्हीं में लगी रहती हैं। जब यह गाने बैठती हैं तो स्वयं ही मुख से भजन बहने लगते हैं। बाबोसा के देहांत के पश्चात् पुनः इनके विवाह की चर्चा रनिवास में होने लगी है, इसी कारण यह अलग रहकर श्याम कुंज में ही अधिक समय बिताती हैं।”
जयमल ने बालसुलभ सरलता से सब कुछ भोजराज को बता दिया।
भोजराज गम्भीर स्वर में बोले,
“यदि आज्ञा हो तो ठाकुर जी और राठौड़ों की इस विभूति का मैं भी दर्शन कर लूँ?”
न चाहते हुए भी अतिथि-मर्यादा निभाते हुए जयमल बोले,
“हाँ-हाँ, अवश्य। पधारिए।”
दोनों ने फुलवारी की बहती नाली में हाथ-पाँव धोए और मंदिर में प्रवेश किया। सीढ़ियाँ चढ़ते हुए भोजराज ने करुणा से भरे पद की अंतिम पंक्ति सुनी—
🌿 *मीरा के प्रभु गिरधर नागर,
भव में पकड़ो हाथ॥*
भजन समाप्त होते ही, बेखबर मीरा ने अपने प्राणाधार को मनाते हुए दूसरा भजन आरम्भ कर दिया—
🌿 *गिरधर लाल प्रीत मति तोड़ो।
गहरी नदिया, नाव पुरानी,
अध-बिच काहे छोड़ो॥*
🌿 *थे ही म्हारा सेठ बोहरा,
ब्याज मूल काहे जोड़ो।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर,
रस में विष काहे घोलो॥*
अश्रुसिक्त मुख और भरे कंठ से मीरा, संगीत के माध्यम से अपने हृदय की बात अपने आराध्य से कह रही थी। ठाकुर को उन्हीं के गुणों का वास्ता देकर, उन्हें ही एकमात्र आश्रय मानकर, अत्यंत दीन भाव से कृपा की याचना कर रही थी। वह इतनी तन्मय थी कि किसी के आगमन का उसे भान ही न रहा।
भोजराज ने एक दृष्टि मूर्ति पर डालकर प्रणाम किया। फिर गायिका पर दृष्टि पड़ी—नेत्रों से अविराम अश्रुधारा बह रही थी। उस अश्रुपूर्ण दृश्य ने मीरा के पुष्प-समान मुख को और अधिक कुम्हला दिया। यह देखकर युवा भोजराज का हृदय विचलित हो उठा।
भजन समाप्त होते ही जयमल ने चलने का संकेत किया। तभी मीरा ने इकतारा एक ओर रखा, आँखें खोलीं और धीरे से पूछा—
“कौन है?”
भोजराज को पीछे छोड़ते हुए जयमल आगे बढ़े और स्नेहपूर्ण स्वर में बोले,
“मैं हूँ, जीजी।”
समीप जाकर घुटनों के बल बैठते हुए, अंजलि में बहन का आँसुओं से भीगा मुख थामकर व्याकुल स्वर में पूछा—
“किसने दुख दिया आपको?”
भाई का यह प्रश्न मानो बाँध तोड़ गया। मीरा फूट-फूटकर रो पड़ी और भाई के कंठ से लिपट गई।
“आप मुझसे कहिए, जीजी,”
जयमल बोला,
“यदि जयमल प्राण देकर भी आपको सुखी कर सके, तो स्वयं को धन्य मानेगा।”
दस वर्ष का बालक आज जैसे बहन का रक्षक बन उठा था।
मीरा क्या कहे, कैसे कहे? उसका यह नन्हा भाई क्या जाने कि प्रेम-पीड़ा क्या होती है?
जब-जब जयमल बहन के पास आता या महल में कहीं मिल जाता, मीरा उसे आशीष देते न थकती—
“जीवता रीझो जग में,
काँटा नी भाँगे थांका पग में।”
और—
“हूँ बलिहारी म्हारा वीर,
थांरो ई रूप माथे।”
सदा हँसती रहने वाली बहन को यूँ रोते देख जयमल तड़प उठा—
“एक बार, जीजी, आप कहकर तो देखो… मैं आपको यूँ रोते नहीं देख सकता।”
“भाई!”
मीरा हिलकियों के बीच बोली,
“मुझे बचा लीजिए… सभी लोग मुझे मेवाड़ के महाराज के कुंवर से ब्याहना चाहते हैं। स्त्री का तो एक ही पति होता है, भाई! अब गिरधर गोपाल को छोड़कर मुझे दूसरे को सौंपना चाहते हैं। मुझे इस पाप से बचा लीजिए। आप इतने वीर हैं… मुझे तलवार के घाट उतार दीजिए… पर यह दुख मुझसे सहा नहीं जाता। मैं आपसे… मेरी राखी का मूल्य… माँग रही हूँ… भगवान आपका भला करेंगे।”
जयमल यह सुनकर स्तब्ध रह गया। एक ओर बहन का अथाह दुख, दूसरी ओर अपनी असमर्थता। वह बहन को बाहों में भर रोता हुआ बोला—
“मेरे वीरत्व को धिक्कार है, जीजी, कि आपके किसी काम न आ सका। यह हाथ आप पर उठें, इससे पहले जयमल के प्राण देह त्याग देंगे। मुझे क्षमा कर दीजिए… मेरे वीरत्व को धिक्कार है…”
दोनों भाई-बहन भावनाओं में डूबे रोते रहे और उन्हें यह ज्ञात ही न हुआ कि श्याम कुंज के द्वार पर एक पराया किंतु सम्माननीय अतिथि, स्तब्ध होकर यह सब देख-सुन रहा है।
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।।मीरा चरित - चौदहवाँ अंक।।
श्याम कुंज में मीरा और जयमल—दोनों भाई-बहन—एक-दूसरे के कंठ लगे रुदन कर रहे हैं। जयमल स्वयं को अत्यंत असहाय मान रहे हैं, जो बहन की किसी भी प्रकार सहायता करने में स्वयं को असमर्थ पा रहे हैं। भोजराज श्याम कुंज के द्वार पर खड़े उन दोनों की बातें आश्चर्य से सुन रहे थे। वे थोड़ा समीप आए ही थे कि सीधे मीरा को संबोधित करते हुए बोले—
“देवी!”
उनका स्वर सुनते ही दोनों चौंककर अलग हो गए। एक अंजान व्यक्ति की उपस्थिति से बेखबर मीरा ने मुँह फेरकर उघड़ा हुआ सिर ढक लिया। पलक झपकते ही वह समझ गई कि यह अंजान, तनिक दुख और गरिमा-युक्त स्वर किसी और का नहीं, मेवाड़ के राजकुमार का है। थोड़े संकोच के साथ उसने उनकी ओर पीठ फेर ली।
“देवी! आत्महत्या महापाप है। और फिर बड़ों की आज्ञा का उल्लंघन भी इससे कम नहीं। आपने जिस चित्तौड़ के राजकुमार का नाम लिया, वह अभागा अथवा सौभाग्यशाली जन आपके सामने उपस्थित है। मुझ भाग्यहीन के कारण ही आप जैसी भक्तिमती कुमारी को इतना परिताप सहना पड़ रहा है। उचित तो यह है कि मैं ही देह छोड़ दूँ, ताकि सारा कष्ट ही कट जाए। किंतु क्या इससे आपकी समस्या सुलझ जाएगी? मैं नहीं तो मेरा भाई—या फिर कोई और—राजपूतों में वरों की क्या कमी है? हम लोगों का अपने गुरूजनों पर बस नहीं चलता। वे भी क्या करें? क्या कभी किसी ने सुना है कि बेटी बाप के घर कुंवारी बैठी रह गई हो? पीढ़ियों से जो होता आया है, उसी के लिए तो सब प्रयत्नशील हैं।”
भोजराज ने अत्यंत विनम्रता से अपनी बात समझाते हुए कहा—
“हे देवी! क्या कभी किसी के घर आप जैसी कन्याएँ उत्पन्न हुई हैं कि कोई अन्य मार्ग उनके लिए निर्धारित हुआ हो? मुझे तो इस उलझन का एक ही हल समझ में आया है, और वह यह कि माता-पिता और परिवार के लोग जो करें, सो करने दीजिए और अपना विवाह आप ठाकुर जी के साथ कर लीजिए। यदि ईश्वर ने मुझे निमित्त बनाया तो… मैं वचन देता हूँ कि केवल दुनिया की दृष्टि में बींद बनूँगा—आपके लिए नहीं। जीवन में कभी भी आपकी इच्छा के विपरीत आपकी देह को स्पर्श तक नहीं करूँगा। आराध्य मूर्ति की तरह…”
भोजराज का गला भर आया। एक क्षण रुककर वे बोले—
“आराध्य मूर्ति की भाँति आपकी सेवा ही मेरा कर्तव्य रहेगा। आपके पति गिरधर गोपाल मेरे स्वामी होंगे, और आप… आप… मेरी स्वामिनी।”
भीष्म-प्रतिज्ञा कर भोजराज आँखों से आँसू पोंछते हुए पलट गए और मंदिर की सीढ़ियाँ उतर आए। एक हारे हुए जुआरी की भाँति पाँव घसीटते हुए वे पानी की नाली पर आकर बैठ गए। दोनों हाथों से अंजलि भर-भरकर मुँह पर पानी के छींटे मारने लगे, ताकि आते हुए जयमल से अपने आँसू और उनकी वजह छुपा सकें। पर मन ने तो आज नेत्रों की राह से बह जाने की ठान ही ली थी।
वे अपनी सारी शक्ति समेट उठे और चल पड़े। जयमल शीघ्रतापूर्वक उनके समीप पहुँचे। उन्होंने देखा—आते समय तो भोजराज प्रसन्न थे, परंतु अब तो उदासी मुख से झर रही है। उसने सोचा—संभवतः जीजा के दुख से दुखी हुए हैं, तभी तो ऐसा वचन दिया। कुछ भी हो, जीजी इनसे विवाह कर सुखी ही होंगी।
और भोजराज? वे चलते हुए जयमल से बीच में ही विदा ले मुड़ गए, ताकि कहीं एकांत पाकर अपने मन का अंतर्दाह बाहर निकाल सकें।
भोजराज श्याम कुंज से प्रतिज्ञा कर अपने डेरे लौट आए। वहाँ आकर कटे वृक्ष की भाँति पलंग पर जा पड़े, पर चैन नहीं पड़ा। कमर में बँधी कटार चुभी तो म्यान से बाहर निकाल धार देखते हुए अनायास ही अपने वक्ष पर तान ली…
एक क्षण…
मानो बिजली चमकी हो।
अंतर में मीरा आ खड़ी हुईं—उदास मुख, कमल-पत्र पर ठहरे ओस-कण जैसे आँसू गालों पर चमक रहे हैं। जलहीन मछली-सी आकुल दृष्टि मानो कह रही हो—
“आप ऐसा करेंगे तो मेरा क्या होगा?”
भोजराज ने तड़पकर कटार दूर फेंक दी।
मेवाड़ का उत्तराधिकारी, लाखों वीरों का अग्रणी—जिसका नाम सुनते ही शत्रुओं के प्राण सूख जाते हैं और दीन-दुखी श्रद्धा से जयजयकार कर उठते हैं, जिसे देखकर माँ की आँखों में सौ-सौ सपने तैर उठते हैं—वही मेदपाट का भावी नायक आज घायल शूर की भाँति धरा पर पड़ा है। आशा, अभिलाषा और यौवन की मानो अर्थी उठ गई हो। उनका धीर-वीर हृदय प्रेम-पीड़ा से कराह उठा। उन्हें इस दुख में भाग बाँटने वाला कोई दिखाई नहीं देता।
उनके कानों में मीरा की गिरधर को करुण पुकार गूँज रही है—
🌿 “म्हारा सेठ बोहरा, ब्याज मूल काँई जोड़ो।
गिरधर लाल प्रीति मति तोड़ो॥” 🌿
“हाय! कैसा दुर्भाग्य है इस अभागे मन का? कहाँ जा लगा यह—जहाँ इसकी रत्ती भर भी परवाह नहीं। पाँव तले रौंदे जाने का भाग्य लिखाकर आया बदनसीब!”
“मीरा… कितना मीठा नाम है यह, जैसे अमृत से सिंचित हो। अच्छा, इसका अर्थ क्या है भला? किससे पूछूँ?”
“अब तो… उन्हीं से पूछना होगा—उनके चित्तौड़ आने पर।”
उनके होंठों पर मुस्कान आ गई, हृदय में विद्युत-तरंग थिरक उठी। वे मीरा से मानो प्रत्यक्ष बात करने लगे—
“मुझे केवल तुम्हारे दर्शन का अधिकार चाहिए… तुम प्रसन्न रहो… तुम्हारी सेवा का सुख पाकर यह भोज निहाल हो जाएगा। मुझे और कुछ नहीं चाहिए… कुछ भी नहीं।”
अगले ही दिन भोजराज ने गिरिजा बुआ और वीरमदेव जी से घर जाने की आज्ञा माँगी। गिरिजा जी ने भतीजे का मुख कुछ मलिन देखकर पूछा, तो भोजराज ने हँसकर बात टाल दी। हालाँकि वे मेड़ता में सबका सम्मान करते थे, पर अब उनका यहाँ मन नहीं लग रहा था।
भोजराज चित्तौड़ आ गए, पर उनका मन अब यहाँ भी नहीं लगता था। न जाने क्यों अब उन्हें एकांत प्रिय लगने लगा। एकांत मिलते ही उनका मन श्याम कुंज में पहुँच जाता। रोकते-रोकते भी वह उन बड़ी-बड़ी झुकी आँखों, स्वर्ण-गौर वर्ण, कपोलों पर ठहरी अश्रु-बूँदों, सुघर नासिका, उसमें लगी हीरक कील, कानों में लटकती झूमर, वह आकुल-व्याकुल दृष्टि और उस मधुर कंठ-स्वर के चिंतन में खो जाता।
वे सोचते—
“एक बार भी तो उसने आँख उठाकर नहीं देखा मेरी ओर। पर क्यों देखे? क्या पड़ी है उसे? उसका मन तो अपने आराध्य गिरधर में लगा है। यह तो तू ही है, जो अपना हृदय उनके चरणों में पुष्प की तरह चढ़ा आया है—जहाँ स्वीकृति के कोई आसार नहीं, न ही आशा।”
🙏जय मीरा। जय गिरधर।।
।।मीरा चरित - पंद्रहवाँ अंक।।
दूसरे दिन माँ सुंदर वस्त्राभूषण लेकर एक दासी के साथ मीरा के पास आईं। आग्रहपूर्वक स्थिति समझाते हुए मीरा से सब पहनने को कहा।
मीरा ने बेमन से कहा,
“आज जी ठीक नहीं है, भाबू! रहने दीजिए, किसी और दिन पहन लूँगी।”
माँ खिन्न होकर उठकर चली गईं। तब मीरा ने उदास मन से तानपुरा उठाया और गाने लगी—
🌿
राम नाम मेरे मन बसियो, रसियो राम रिझाऊँ ए माय।
…
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, रज चरणन की पाऊँ ए माय॥
🌿
भजन विश्राम कर वह उठी ही थी कि माँ और काकीसा के साथ चित्तौड़ के राजपुरोहित जी की पत्नी श्याम कुंज में प्रवेश कर गईं। मीरा ने उन्हें यथायोग्य प्रणाम किया और बड़े संकोच के साथ एक ओर हटकर ठाकुर जी को निहारती हुई खड़ी हो गई।
पुरोहितानी जी ने तो ऐसे रूप की कल्पना भी नहीं की थी। वे लज्जा से सकुचाई मीरा के सौंदर्य से विमोहित–सी हो गईं और प्रणाम का उत्तर तथा आशीर्वाद भी स्पष्ट रूप से न दे सकीं। कुछ देर वे मीरा को एकटक निहारती ही बैठी रहीं। दासियों ने आगे बढ़कर चरणामृत और प्रसाद दिया। कुछ समय और यूँ ही मंत्रमुग्ध बैठी रहने के बाद वे काकीसा के साथ चली गईं।
सबके जाने के बाद माँ ने फिर मीरा से कहा,
“तेरा क्या होगा—यह आशंका ही मुझे मारे डालती है। अरे, विनोद में कही भगवान से विवाह करने की बात से क्या जगत का व्यवहार चलेगा? साधु–संग ने तो मेरी कोमलांगी बेटी को बैरागन ही बना दिया है। अब मैं किससे जाकर बेटी के सुख की भिक्षा माँगूँ?”
मीरा ने शांत स्वर में कहा,
“माँ, आप क्यों दुखी होती हैं? सब अपने भाग्य का लिखा ही पाते हैं। यदि मेरे भाग्य में दुख लिखा है तो क्या आप रो–रोकर उसे सुख में पलट सकती हैं? तब जो हो रहा है, उसी में संतोष मानिए।
मुझे एक बात समझ में नहीं आती, भाबू! जो जन्मा है, वह मरेगा ही—यह बात तो आप भलीभाँति जानती हैं। फिर जब आपकी पुत्री को अविनाशी पति मिला है, तो आप क्यों दुख मना रही हैं? आपकी बेटी जैसी भाग्यशालिनी और कौन है, जिसका सुहाग अमर है?”
वीरकुवँरी जी एक बार फिर मीरा के तर्क के आगे चुप हो गईं।
मीरा श्याम कुंज में अकेली रह गई। आजकल दासियों को भी कामों की शिक्षा दी जा रही थी, क्योंकि उन्हें भी मीरा के साथ चित्तौड़ जाना था। मीरा ने एकांत पाकर आर्त मन से प्रार्थना आरंभ की—
🌿
तुम सुनो दयाल, म्हारी अरजी।
भवसागर में बही जात हूँ, काढ़ो तो थाँरी मरजी।
या संसार सगो नहीं कोई, सांचा सगा रघुबर जी॥
🌿
मात–पिता अर कुटुम कबीला, सब मतलब के गरजी।
मीरा की प्रभु अरजी सुण लो, चरण लगावो थाँरी मरजी॥
🌿
मीरा श्याम कुंज में एकांत में गिरधर के समक्ष बैठी है। आजकल उस पर दो ही भाव प्रबल रहते हैं—या तो वह ठाकुर जी की करुणा का स्मरण कर उनसे कृपा की याचना करती है, या फिर अपने ही भाव–राज्य में खोकर अपने श्यामसुंदर से बैठी बातें करती रहती है।
इस समय दूसरा भाव अधिक प्रबल है। मीरा गोपाल से बैठे–बैठे निहोरा कर रही है—
🌿
थाँने काँई काँई कह समझाऊँ,
म्हाँरा साँवरा गिरधारी।
पूरब जनम की प्रीति म्हाँरी,
अब नहीं जात निवारी॥
🌿
सुंदर बदन जोवताँ सजनी,
प्रीति भई छे भारी।
म्हाँरे घराँ पधारो गिरधर,
मंगल गावें नारी॥
🌿
मोती चौक पूराऊँ व्हाला,
तन–मन तो पर वारी।
म्हाँरो सगपण तो सूँ साँवरिया,
जग सूँ नहीं विचारी॥
🌿
मीरा कहे गोपिन को व्हालो,
हम सूँ भयो ब्रह्मचारी।
चरण शरण है दासी थाँरी,
पलक न कीजे न्यारी॥
🌿
मीरा गाते–गाते अपने भाव–जगत में खो गई। वह सिर पर छोटी–सी कलशी लिए यमुना–जल लेकर लौट रही है। उसके तृषित नेत्र इधर–उधर निहारकर अपना धन खोज रहे हैं—वो यहीं कहीं होंगे… आएँगे… नहीं आएँगे… बस इसी ऊहापोह में वह धीरे–धीरे चल रही थी कि पीछे से किसी ने मटकी उठा ली।
वह अचकचाकर ऊपर देखती है—कदंब पर एक हाथ से डाल पकड़े और एक हाथ में कलशी लटकाए मनमोहन बैठे हँस रहे हैं। लाज के मारे उसकी दृष्टि ठहर नहीं पा रही। लज्जा नीचे और प्रेम–उत्सुकता ऊपर देखने को विवश कर रही है। वे एकदम वृक्ष से उसके सम्मुख कूद पड़ते हैं। वह चौंककर चीख पड़ती है और साथ ही उन्हें देखकर लजा जाती है।
“डर गई न?”
उन्होंने हँसते हुए पूछा और हाथ पकड़कर कहा,
“चल आ, थोड़ी देर बैठकर बातें करें।”
सघन वृक्ष तले एक शिला पर दोनों बैठ गए। वे मुस्कुराकर बोले,
“तुझे क्या लगा—कोई वानर कूद पड़ा है क्या? अभी पानी भरने का समय है क्या? दोपहर में घाट नितांत सूने रहते हैं। जो कोई सचमुच वानर आ जाता तो?”
“तुम हो न…”
उसके मुख से निकला।
“मैं क्या यहीं बैठा रहता हूँ? गैयाँ नहीं चरानी मुझे?”
“एक बात कहूँ?”
मीरा ने सिर नीचा किए हुए कहा।
“एक नहीं, सौ कह—पर माथा तो ऊँचा कर! तेरो मुख ही नाय दिख रहो मोकू।”
उन्होंने उसका मुख ऊँचा किया तो फिर लाज ने आ घेरा।
“अच्छो–अच्छो, मुख नीचो ही रहने दे। कह, का बात है?”
“तुम्हें कैसे प्रसन्न किया जा सकता है?”
बहुत कठिनाई से मीरा ने कहा।
“सखी! तोहे मैं अप्रसन्न दीख रहयो हूँ?”
“नहीं… मेरा वह मतलब नहीं था। सुना है… तुम प्रेम से वश में होते हो।”
“मोको वश में करके क्या करेगी सखी? नाथ डालेगी कि पगहा बाँधेगी? मेरे वश हुए बिना तेरो कहा काज अटक्यो है भला?”
“सो नहीं, श्यामसुंदर!”
“तो फिर क्या? कब से पूछ रहो हूँ। तेरो मोहड़ों तो पूरो खुले हु नाय। एकहु बात पूरी नाय निकसै। अब मैं भोरो–भारो कैसे समझूँगो?”
“सुनो श्यामसुंदर!”
मीरा ने आँख मूँदकर पूरा ज़ोर लगाकर कह दिया—
“मुझे तुम्हारे चरणों में अनुराग चाहिए।”
“सो कहा होय सखी?”
उन्होंने अंजान बनते हुए पूछा।
अपनी विवशता पर मीरा की आँखों में आँसू भर आए। घुटनों में सिर देकर वह रो पड़ी।
“सखी, रोवै मति।”
उन्होंने उसके आँसू पोंछते हुए पूछा—
“और ऐसो अनुराग कैसो होवे री?”
“सब कहते हैं, उसमें अपने सुख की आशा–इच्छा नहीं होती।”
“तो और कहा होय?”
“बस, तुम्हारे सुख की इच्छा।”
“और कहा अब तू मोकू दुख दे रही है?”
ऐसा कहकर हँसते हुए उसकी मटकी लौटाते हुए बोले—
“ले, अपनी कलशी! बावरी कहीं की!”
और वह वन की ओर दौड़ गए।
मीरा वहीं सिर पर मटकी रखे, ठगी–सी बैठी रह गई।
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।।भजन - समक्ष श्री कृष्ण।।
।।फूल।।
हर खुशी है मगर कुछ कमी रह गई।
मेरी पलकों में जाने क्यूं नमी रह गई।
तेरी महफ़िल में, खुल के वो कह ना सकी।
बात जो दिल में थी, वो दबी रह गई।
मुझको अगर तू फूल बनाता ओ सांवरे।
मन्दिर मैं तेरा खूब सजाती ओ सांवरे।
तेरा चित्र इत्र इत्र, तेरी बात इत्र की।
मंदिर में तेरे होती है, बरसात इत्र की ।
छींटा तो कोई मुझ पे भी आता ओ सांवरे।
मन्दिर मैं तेरा रोज सजाती ओ सांवरे।
मेरी शाम काम आती, तेरे श्रृंगार में।
तेरे भक्त पिरो देते, मुझको भी हार में।
मुझको गले तू , रोज़ लगाता ओ सांवरे।
मन्दिर मैं तेरा रोज़ सजाती ओ सांवरे।
बनके गुलाब कांटों में, रहना कबूल है।
किस्मत में मेरी गर तेरे, चरणों की धूल है।
दासी ये सर ना दर से उठाती ओ सांवरे।
मंदिर मै तेरा रोज सजाती, ओ सांवरे।
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।।मीरा चरित - सोलहवाँ अंक।।
अक्षय तृतीया का मुहूर्त था—मीरा के लग्न का,
अक्षय तृतीया का पावन प्रभात।
प्रातःकाल मीरा जब पलंग से उठी, तो दासियाँ चकित रह गईं। वे दौड़कर माँ वीरकुँवरी जी और पिता रत्नसिंह जी को सूचना देने पहुँचीं। दोनों ने आकर देखा—मीरा विवाह के श्रृंगार से सजी हुई थी।
बाहों में खाँचो सहित चंदरबाई का चूड़ला था—
(विवाह के समय वर-पक्ष से वधू को पहनाने हेतु विशेष रूप से सोने के पानी से चित्रित चूड़ा, जो कोहनी से ऊपर ‘खाँच’ तक पहना जाता है।)
गले में तमण्याँ *(ó से आने वाला मंगल आभूषण)*,
नाक में नथ,
सिर पर रखड़ी (शिरोभूषण),
हाथों में रची मेहंदी,
दाहिनी हथेली में हस्तमिलाप का चिह्न,
साड़ी के पल्लू में पीतांबर का गठबंधन,
चोटी में गुँथे हुए फूल—
और कक्ष में व्याप्त दिव्य सुगंध…
मानो मीरा पलंग से नहीं, विवाह-मंडप से उठ रही हो।
“यह क्या, मीरा! बारात तो आज आएगी न?”
रत्नसिंह राणावत जी ने हड़बड़ाकर पूछा।
“आप सबको मुझे ब्याहने की बहुत जल्दी थी न?
आज पिछली रात मेरा विवाह हो गया।”
मीरा ने सिर झुकाए, पाँव के अँगूठे से धरती पर रेख खींचते हुए कहा—
“प्रभु ने कृपा कर मुझे अपना लिया, भाभो हुकुम!
मेरा हाथ थामकर उन्होंने मुझे भवसागर से पार कर दिया।”
कहते-कहते उसकी आँखों से हर्ष के आँसू बह निकले।
“ये गहने तो अमूल्य हैं, मीरा!
कहाँ से आए?”
माँ ने घबराकर पूछा।
“पड़ले *(वर-पक्ष से आने वाली सामग्री अथवा वरी)* में आए हैं, भाबू!
बहुत-सी पोशाकें, श्रृंगार-सामग्री, मेवे और अन्य वस्तुएँ भी हैं।
वे सब यहीं रखी हैं—आप देखकर सँभाल लीजिए, भाबू।”
मीरा ने लजाते हुए धीमे स्वर में कहा।
पोशाकें और आभूषण देखकर सबकी आँखें फैल गईं…
जरी के वस्त्रों पर हीरे-जवाहरात का ऐसा काम था कि अँधेरे में भी वे चमचमा रहे थे।
वीरमदेव जी ने भी यह सब सुना। वे भाइयों के साथ आए।
सब कुछ देखा, समझा—और आश्चर्यचकित रह गए।
मीरा के अलौकिक प्रेम और अटूट विश्वास को देखकर वीरमदेव जी मन ही मन विचार करने लगे—
“क्यों विवाह करके हम अपनी सुकुमार बेटी को दुख दे रहे हैं?
किन्तु अब तो घड़ियाँ घट रही हैं…
कुछ भी अब हमारे वश में नहीं रहा।”
वे एक गहरी निश्वास छोड़कर बाहर चले गए।
मीरा श्याम-कुंज में जाकर नित्य की ठाकुर-सेवा में लग गई।
माँ ने लाड़ से समझाते हुए कहा—
“बेटी! आज तो तेरा विवाह है।
चल, सखियों, काकियों और भौजाइयों के बीच बैठ।
खा, खेल—आज यह भजन-पूजन रहने दे।”
“भाबू! मैं वही काम कर रही हूँ, जो मुझे अच्छा लगता है।
सबको एक जैसे खेल अच्छे नहीं लगते।
आज यह पड़ला और मेरी हथेली का चिह्न देखकर भी
यदि आपको विश्वास नहीं हुआ, तो सुनिए—
🌿 *माई म्हाँने सुपना में परण्या गोपाल।*
*राती पीली चूनर ओढ़ी, मेहंदी हाथ रसाल॥*
🌿 *काँई करूँ और संग भावूँ, म्हाँने जग जंजाल।*
*मीरा प्रभु गिरधर लाल सूँ करी सगाई हाल॥*
🔺 *परण्या — परिणय अर्थात विवाह।*
“तूने तो मुझे कह दिया कि जग जंजाल है,
पर बेटा, तुझे पता है—
तेरी तनिक-सी ‘ना’ मेड़ता में कितना अनर्थ कर देगी?
तलवारें म्यानों से बाहर निकल आएँगी।”
माँ ने चिंतित स्वर में कहा।
“आप चिंता न करें, माँ।
जब भी कोई रीति करनी हो—मुझे बुला लीजिएगा,
मैं आ जाऊँगी।”
“वाह, मेरी लाड़ली!
तूने तो मेरा सारा दुख ही हर लिया।”
कहती हुई, प्रसन्न मन से माँ बलैयाँ लेती हुई चली गई।
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।।मीरा चरित - सत्रहवाँ अंक।।
🌿 महल के परकोटे में लगी फुलवारी के मध्य गिरधर गोपाल के लिए एक मंदिर बनकर दो महीनों में तैयार हो गया।
धूमधाम से गिरधर गोपाल का गृह-प्रवेश और विधिपूर्वक प्राण-प्रतिष्ठा हुई। मंदिर का नाम रखा गया— “श्याम कुंज”। अब मीरा का अधिकांश समय श्याम कुंज में ही बीतने लगा।
🌿 ऐसे ही धीरे-धीरे समय बीतने लगा। मीरा पूजा करने के पश्चात् भी श्याम कुंज में ही बैठे-बैठे सुनी और पढ़ी हुई लीलाओं के चिंतन में प्रायः खो जाती।
🌿 वर्षा के दिन थे। चारों ओर हरितिमा छाई हुई थी। ऊपर गगन में मेघ उमड़-घुमड़ कर आ रहे थे। आँखें मूँदे हुए मीरा गिरधर के सम्मुख बैठी है। बंद नयनों के समक्ष उमड़ती हुई यमुना के तट पर मीरा हाथ में भरी हुई मटकी थामे बैठी है। यमुना के जल में श्यामसुंदर की परछाईं देख वह पलक झपकाना भूल गई।
यह रूप—ये कारे, कजरारे, दीर्घ नेत्र…!
मटकी हाथ से छूट गई और उसके साथ न जाने वह भी कैसे जल में जा गिरी। उसे लगा कोई जल में कूद पड़ा है और फिर दो सशक्त भुजाओं ने उसे ऊपर उठा लिया और घाट की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए मुस्कुरा दिया।
वह यह निर्णय नहीं कर पाई कि कौन अधिक मारक है—दृष्टि या मुस्कान? निर्णय हो भी कैसे? बुद्धि तो लोप हो गई थी, लज्जा ने देह को जड़ कर दिया था, और मन—? मन तो बैरी बन उनकी आँखों में जा समाया था।
🌿 उसे शिला के सहारे घाट पर बिठाकर वे मुस्कुराते हुए जल से उसका घड़ा निकाल लाए। हँसते हुए, अपनत्व से भरे कितने ही प्रश्न उन्होंने ब्रज भाषा में पूछ डाले।
अमृत-सी वाणी वातावरण में रस घोलती प्रतीत हुई—
“थोड़ा विश्राम कर ले, फिर मैं तेरो घड़ो उठवाय दूँगो।
कहा नाम है री तेरो? बोलेगी नाय?
मो पै रूठी है क्या?
भूख लगी है का?
तेरी मैया ने कछु खवायो नाय?
ले, मो पै फल है। खावेगी?”
उन्होंने फेंट से बड़ा सा अमरूद और थोड़े जामुन निकालकर उसके हाथ पर धर दिए—
“ले, खा।”
🌿 वह क्या कहती! आँखों से दो आँसू ढुलक पड़े। लज्जा ने जैसे वाणी को बाँध लिया था।
“कहा नाम है तेरो?”
“मी…रा…”
बहुत खींचकर बस इतना ही कह पाई।
वे खिलखिलाकर हँस पड़े—
“कितनो मधुर स्वर है तेरो री।”
🌿 “श्यामसुंदर! कहाँ गए प्राणाधार!”
वह एकाएक चीख उठी।
समीप ही फुलवारी से चंपा और चमेली दौड़ी आईं। देखा—मीरा अत्यंत व्याकुल थीं और आँखों से आँसू झर रहे थे। दोनों ने मिलकर शय्या बिछाई और यत्नपूर्वक मीरा को उस पर सुला दिया।
सांयकाल तक मीरा की स्थिति कुछ सुधरी। तब वह तानपुरा लेकर गिरधर के सामने जा बैठी। फिर हृदय के उद्गार प्रथम बार पद के रूप में प्रस्फुटित हो उठे—
मेहा बरसिबो करे रे,
आज तो रमैया म्हारे घरे रे।
नान्हीं-नान्हीं बूंद मेघघन बरसे,
सूखा सरवर भरे रे॥
घणा दिनां सूं प्रीतम पायो,
बिछुड़न को मोहि डर रे।
मीरा कहे अति नेह जुड़ायो,
मैं लियो पुरबलो वर रे॥
🌿 पद पूर्ण हुआ तो मीरा का हृदय भी जैसे कुछ हल्का हो गया। पथ पाकर जैसे जल दौड़ पड़ता है, वैसे ही मीरा की भाव-सरिता भी शब्दों में ढलकर पदों के रूप में उन्मुक्त बह निकली।
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।।मीरा चरित - अठारहवाँ अंक।।
मीरा को चित्तौड़ आए कुछ मास बीत गए। गिरधर की राग-सेवा नियमित रूप से चल रही थी। एक दिन मीरा अपने कक्ष में बैठी गिरधरलाल की पोशाक पर मोती टाँक रही थी। कुछ ही दूरी पर मसनद के सहारे भोजराज बैठे थे।
“सुना है आपने योग की शिक्षा ली है। ज्ञान और भक्ति दोनों ही आपके लिए सहज हैं। यदि थोड़ी-बहुत शिक्षा यह सेवक भी प्राप्त कर ले, तो जीवन सफल हो जाए।”
भोजराज ने कहा।
यह सुनकर मीरा मुस्कुराई और उनकी ओर देखती हुई बोली—
“यह क्या फरमाते हैं आप? चाकर तो मैं हूँ। प्रभु ने कृपा की कि आप मिले। कोई दूसरा होता तो अब तक मीरा की चिता की राख भी न बचती। चाकर आप और मैं—दोनों ही गिरधरलाल के हैं।”
“भक्ति और योग में से कौन श्रेष्ठ है?” भोजराज ने पूछा।
“देखिए, दोनों ही अध्यात्म के स्वतंत्र मार्ग हैं। पर मुझे योग में ध्यान लगाकर परमानंद प्राप्त करने से अधिक रुचिकर अपने प्राण-सखा की सेवा लगी।”
“तो क्या भक्ति में, सेवा में, योग से अधिक आनंद है?”
“यह तो अपनी-अपनी रुचि की बात है। अन्यथा संसार में सभी भक्त ही होते, योगी ढूँढ़े भी न मिलते।”
कुछ क्षण रुककर मीरा बोली—
“मुझे आपसे एक बात कहनी थी।”
“एक क्यों, दस कहिए।” भोजराज ने स्नेह से कहा।
“आप जगत-व्यवहार और वंश-परंपरा के लिए दूसरा विवाह कर लीजिए।”
भोजराज हल्के से मुस्कुराए—
“बात तो आपकी सत्य है; किंतु सभी लोग सब कार्य नहीं कर सकते। उस दिन श्याम-कुंज में ही मेरी इच्छा आपके चरणों की चेरी बन गई थी। आप छोड़िए—इन बातों में क्या रखा है?
यदि इनमें थोड़ा भी दम होता तो…”
वे बात अधूरी छोड़कर मीरा की ओर देख मुस्कुराए—
“रूप और यौवन का यह कल्पवृक्ष चित्तौड़ के राजकुँवर को छोड़कर इस मूर्ति पर न्यौछावर न होता, और भोज शक्ति तथा इच्छा का दमन कर इन चरणों का चाकर बनने में अपना गौरव न मानता। जाने दीजिए—आप तो मेरे कल्याण का विचार कीजिए।
लोग कहते हैं, ईश्वर निर्गुण-निराकार है; इन स्थूल आँखों से उसे देखा नहीं जा सकता, केवल अनुभव किया जा सकता है। सत्य क्या है—समझ नहीं पाया।”
मीरा ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया—
“वह निर्गुण-निराकार भी है और सगुण-साकार भी।
निर्गुण रूप में वह आकाश और प्रकाश के समान है—जो चेतन रूप से समस्त सृष्टि में व्याप्त है। वह सदा एकरस है। उसे अनुभव तो किया जा सकता है, पर देखा नहीं जा सकता।
और ईश्वर सगुण-साकार भी है। वह प्रेम से वश में होता है; रुष्ट भी होता है और तुष्ट भी। हृदय की पुकार सुनता है और दर्शन भी देता है।”
कहते-कहते मीरा के शरीर में रोमांच छा गया।
यह देखकर भोजराज कुछ चकित हुए। उन्होंने पूछा—
“भगवान के अनेक नाम और रूप सुने जाते हैं। नाम-रूपों की इस विविधता में मनुष्य भटक नहीं जाता?”
मीरा शांत भाव से बोली—
“भटकने वालों को बहानों की कमी नहीं होती। यदि भटकाव से बचना हो तो सरल उपाय है—जो नाम और रूप स्वयं को प्रिय लगे, उसे दृढ़ता से पकड़ लें और कभी न छोड़ें। साथ ही अन्य नाम-रूपों का भी सम्मान करें। क्योंकि सभी ग्रंथ और सभी संप्रदाय उसी एक ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग बताते हैं।
मन में यदि दृढ़ विश्वास हो, तो उपासना अवश्य फल देती है।”
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।।मीरा चरित - उन्नीसवाँ अंक।।
अत्यन्त विनम्रता से भोजराज, मीरा से भगवान के सगुण-साकार स्वरूप की प्राप्ति के विषय में जिज्ञासा कर रहे थे।
वह बोले, “तो आप कह रही हैं कि भगवान उपासना से प्राप्त होते हैं। वह कैसे? मैं समझा नहीं।”
“उपासना मन की शुद्धि का साधन है। संसार में जितने भी नियम हैं—संयम, धर्म, व्रत, दान—सब के सब जन्म-जन्मान्तरों से मन पर जमे हुए मैले संस्कारों को धोने के उपाय मात्र हैं। एक बार वे धुल जाएँ, तो फिर भगवान तो सामने वैसे ही हैं, जैसे दर्पण के स्वच्छ होते ही अपना मुख उसमें दिखने लगता है।”
मीरा ने स्नेह से कहा, “देखिए, भगवान को कहीं से आना थोड़े ही है कि उन्हें विलम्ब हो। भगवान न उपासना के वश में हैं और न दान-धर्म के। वे तो कृपा-साध्य हैं, प्रेम-साध्य हैं। बस उन्हें अपना समझकर उनके सम्मुख हृदय खोल दें। यदि हम उनसे कोई लुकाव-छिपाव न करें, तो भगवान से अधिक निकट कोई भी हमारे पास नहीं; और यदि यह निकटता नहीं है, तो उनकी दूरी की कोई सीमा भी नहीं।”
“पर मनुष्य के पास अपनी इन्द्रियों को छोड़ अनुभव का कोई अन्य उपाय तो है नहीं। फिर जिसे देखा नहीं, जाना नहीं, व्यवहार में बरता नहीं, उससे प्रेम कैसे सम्भव है?”
“हमारे पास एक इन्द्रिय ऐसी है, जिसके द्वारा भगवान हृदय में साकार होते हैं, और वह इन्द्रिय है—कान। बारम्बार उनके रूप-गुणों का वर्णन श्रवण करने से विश्वास उत्पन्न होता है और वे हृदय में प्रकाशित हो उठते हैं। विग्रह की पूजा, भोग और राग द्वारा हम अपनी साधना में उत्साह बढ़ा सकते हैं।”
“पर बिना देखे प्रतीक (विग्रह) कैसे बनेगा? क्या आपने कभी साक्षात् दर्शन किए हैं?”
प्रश्न सुनकर मीरा की आँखें भर आईं और गला रूँध गया। घड़ी भर में अपने को संभालकर बोलीं—
“अब आपसे क्या छिपाऊँ? यद्यपि यह बातें कहने-सुनने की नहीं होतीं। मन से तो वह रूप पलक झपकने जितने समय के लिए भी ओझल नहीं होता, किन्तु अक्षय तृतीया के प्रभात से पूर्व मुझे स्वप्न आया कि प्रभु मेरे बींद (दूल्हा) बनकर पधारे हैं, और देवता तथा द्वारिकावासी बारात में आए हैं। दोनों ओर चँवर डुलाए जा रहे थे। वे सुसज्जित श्वेत अश्व पर, जिसके केवल कान काले थे, विराजमान थे।
यद्यपि मैंने आपके राजकरण अश्व के समान शुभलक्षण और सुन्दर अश्व नहीं देखा, तथा आपके समान कोई सुन्दर नर भी नहीं दिखाई दिया, पर… पर… उस रूप के सम्मुख… कुछ भी नहीं।”
मीरा बोलते-बोलते रुक गईं। उनकी आँखें कृष्ण-रूप माधुरी के स्मरण में स्थिर हो गईं और देह जैसे काँप उठी।
भोजराज, मीरा का ऐसा प्रेम-भाव देखकर स्तब्ध रह गए। उन्होंने स्वयं को संयत किया और शीघ्रता से मिथुला को मीरा को संभालने के लिए पुकारा।
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।। मीरा चरित - बीसवाँ अंक ।।
मीरा प्रभु को बींद-स्वरूप स्मरण करते-करते भाव में निमग्न हो गई। मिथुला ने जल-पात्र उनके मुख से लगाया तो वह सचेत हुईं।
"फिर? आप बता रही थीं कि प्रभु अक्षय तृतीया को बींद बनकर पधारे थे…" भोजराज ने पूछा।
मीरा ने किंचित लजाते हुए कहा, "जी हुकुम! मेरा और प्रभु का हस्त-मिलाप हुआ। उनके पीताम्बर से मेरी साड़ी की गाँठ बाँधी गई। भाँवरों में मैं उनके अरुण, मृदुल चरणों पर दृष्टि लगाए उनका अनुसरण कर रही थी। हमें महलों में पहुँचाया गया। यह… यह हीरक-हार…।" उसने एक हाथ से अपने गले में पड़े हीरे के हार को दिखाया— "यह प्रभु ने मुझे पहनाया और मेरा घूँघट ऊपर उठा दिया।"
"यह… यह वह नहीं है, जो मैंने नज़र किया था?" भोजराज ने सावधान होकर पूछा।
"वह तो गिरधर गोपाल के गले में है।" मीरा ने कहा और हार में लटकता चित्र दिखाया— "यह, इसमें प्रभु का चित्र है।"
"मैं देख सकता हूँ इसे?" भोजराज चकित हो उठे।
"अवश्य।" मीरा ने हार खोलकर भोजराज की हथेली पर रख दिया। भोजराज ने श्रद्धा से देखा, सिर से लगाया और वापस लौटा दिया। "आगे क्या हुआ?" उन्होंने जिज्ञासा से पूछा।
"मैं प्रभु के चरण स्पर्श को जैसे ही झुकी, उन्होंने मुझे बाँहों में भर उठा लिया।" मीरा की आँखें आनन्द से मुंद गईं। वाणी अवरुद्ध होने लगी— "हा म्हाँरा सर… सर्वस्व… म्हूँ… थारी (दासी)…।"
मीरा की अपार्थिव दृष्टि से आनन्द अश्रु बन ढलकने लगा। ऐसा लगा मानो आँसू मोतियों की लड़ियाँ बनकर टूट-टूट कर झर रहे हों। उसे स्वयं की सुध न रही। भोजराज का मन हुआ कि उठकर जल पिला दें, पर अपनी विवशता स्मरण कर बैठे रहे।
कुछ क्षणों के पश्चात जब मीरा ने निमीलित दृष्टि खोली तो किंचित संकुचित होते हुए बोली, "मैं तो बाँवरी हूँ— कहीं कोई अशोभनीय बात तो नहीं कह दी?"
"नहीं-नहीं! आप ठाकुरजी से विवाह की बात बता रही थीं— कि कक्ष में पधारने पर आपने प्रणाम किया और…"
"जी।" मीरा जैसे खोए से स्वर में बोली— "वह मेरे समीप थे; वह सुगन्धित श्वास, वह देह-गंध… इतना आनन्द मैं कैसे संभाल पाती!"
"प्रातःकाल सबने देखा— वह गँठजोड़ा, हथलेवे का चिन्ह, गहने, वस्त्र, चूड़ा। चित्तौड़ से आया चूड़ा तो मैंने पहना ही नहीं; गहने, वस्त्र सब ज्यों के त्यों रखे हैं।"
"क्या मैं वहाँ से आया पड़ला देख सकता हूँ?" भोजराज बोले।
"अभी मँगवाती हूँ।" मीरा ने मंगला और मिथुला को पुकारा— "मिथुला, थूँ जो द्वारिका शूँ आयो पड़ला कणी पेटी में है? और चित्तौड़ शूँ पड़ला— वा ऊँचा ला, दोनों तो मंगला।"
दोनों पेटियाँ आईं तो दासियों ने दोनों की सामग्री खोलकर अलग-अलग रख दी।
आश्चर्य से भोजराज ने देखा— सब कुछ एक-सा था: गिनती, रंग; पर फिर भी चित्तौड़ के महाराणा का सारा वैभव द्वारिका से आए पड़ले के समक्ष तुच्छ प्रतीत हो रहा था। श्रद्धापूर्वक भोजराज ने सबको छुआ, प्रणाम किया। सब यथास्थान रखकर दासियाँ चली गईं तो भोजराज ने उठकर मीरा के चरणों में माथा धर दिया।
"अरे! यह… यह क्या कर रहे हैं आप?" मीरा ने चौंककर कहा और पाँव पीछे हटा लिए।
"अब आप ही मेरी गुरु हैं; मुझ मतिहीन को पथ सुझाकर ठौर-ठिकाने पहुँचा देने की कृपा करें।" गद्गद कंठ से वह ठीक से बोल नहीं पा रहे थे; उनके नेत्रों से अश्रुओं की बूँदें मीरा के धवल चरणों का अभिषेक कर रही थीं।
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।।मीरा चरित - इक्कीसवाँ अंक।।
भोजराज सजल नेत्रों से, अतिशय भावुक एवं विनम्र होकर, मीरा के चरणों में ही बैठ गए और उनसे मार्गदर्शन की प्रार्थना करने लगे।
मीरा का हाथ सहज ही भोजराज के माथे पर चला गया—
“आप उठकर विराजिए। प्रभु की अपार सामर्थ्य है। शरणागत की लाज उन्हें ही है। कातरता भला आपको शोभा देती है? कृपा करके उठिए।”
भोजराज ने अपने को सँभाला। वे वापस गद्दी पर जाकर विराजे और साफे से अपने आँसू पोंछने लगे। मीरा ने उठकर उन्हें जल पिलाया।
“आप मुझे कोई सरल उपाय बताइए। पूजा-पाठ, नाचना-गाना, मंजीरे या तानपुरा बजाना मेरे बस का नहीं है।” भोजराज ने कहा।
“यह सब आपके लिए आवश्यक भी नहीं है,” मीरा हँस पड़ी। “बस आप जो भी करें, प्रभु के लिए करें और उनके हुक्म से करें; जैसे सेवक स्वामी की आज्ञा से, अथवा उनका रुख देखकर कार्य करता है। जो भी देखें, उसमें प्रभु के हाथ की कारीगरी देखें। कुछ समय के अभ्यास से सारा ही कार्य उनकी पूजा हो जाएगा।”
“युद्धभूमि में शत्रु-संहार, न्यायासन पर बैठकर अपराधियों को दंड देना भी क्या उन्हीं के लिए है?”
“हाँ, हुक्म!” मीरा ने गंभीरता से कहा—
“नाटक के पात्र मरने और मारने का अभिनय नहीं करते क्या? उन्हीं पात्रों की भाँति आप भी समझ लीजिए कि न मैं मारता हूँ, न वे मरते हैं; केवल मैं प्रभु की आज्ञा से उन्हें मुक्ति दिला रहा हूँ। यह जगत तो प्रभु का रंगमंच है। दृश्य भी वही है और द्रष्टा भी वही है। अपने को कर्ता मानकर व्यर्थ बोझ नहीं उठाइए। कर्ता बनने पर तो कर्मफल भी भुगतना पड़ता है; तब क्यों न सेवक की तरह, जो स्वामी चाहे, वही किया जाए? मजदूरी तो कर्ता बनने पर भी उतनी ही मिलती है, जितनी मजदूर बनने पर; पर ऐसे में स्वामी की प्रसन्नता भी प्राप्त होती है। हाँ, एक बात अवश्य ध्यान रखने की है कि जो पात्रता आपको प्रदान की गई है, उसके अनुसार आपके अभिनय में कमी न आने पाए।”
मीरा ने थोड़ा रुककर फिर कहा, “क्या उचित है और क्या अनुचित— यह बात किसी और से सुनने की आवश्यकता नहीं होती। भीतर बैठा अंतर्यामी ही हमें उचित-अनुचित का बोध करा देता है। उसकी बात अनसुनी करने से धीरे-धीरे वह भीतर की ध्वनि मंद पड़ती जाती है, और नित्य सुनने से, उस पर ध्यान देकर, उसके अनुसार चलने पर अंतःकरण की वाणी और स्पष्ट होती जाती है। फिर तो कोई अड़चन नहीं रहती। कर्तव्य-पालन ही राजा के लिए सबसे बड़ी पूजा और तपस्या है।”
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।।मीरा चरित - बाईसवाँ अंक।।
एक दिन मीरा ने भोजराज से कहा, “आपकी आज्ञा हो तो एक निवेदन करूँ।”
“क्यों नहीं? फरमाइए,” भोजराज ने अति विनम्रता से कहा।
“मेड़ते में तो संत आते ही रहते थे। वहाँ सत्संग मिला करता था। प्रभु के प्रेमियों के मुख से झरती उनकी रूप-गुण-सुधा के पान से जो सुख प्राप्त होता है, वह जोशीजी के मुख से पुराण-कथा सुनने में नहीं मिलता। यहाँ सत्संग का अभाव मुझे सदा अनुभव होता है।”
भोजराज गंभीर हो गए— “यहाँ महलों में तो संतों के प्रवेश की आज्ञा नहीं है। हाँ, किले में संत-महात्मा आते ही रहते हैं; किंतु आपका बाहर पधारना कैसे हो सकता है?”
“सत्संग बिना तो प्राण प्यास से मर जाते हैं,” मीरा ने उदास स्वर में कहा।
“ऐसा करते हैं कि कुम्भश्याम के मंदिर के पास एक और मंदिर बनवा दें। वहाँ आप नित्य दर्शन के लिए जाया करें। मैं भी प्रयत्न करूँगा कि गढ़ में आने वाले संत वहाँ मंदिर में पहुँचें। इस प्रकार मैं भी संत-दर्शन करके लाभ ले पाऊँगा और थोड़ा-बहुत ज्ञान मुझे भी मिलेगा।”
“जैसा आप उचित समझें,” मीरा ने प्रसन्नता से कहा।
महाराणा (मीरा के ससुर) का आदेश मिलते ही मंदिर का निर्माण आरंभ हो गया। अंतःपुर में मंदिर-निर्माण चर्चा का विषय बन गया।
“महल में स्थान का संकोच था क्या?”
“यह बाहर मंदिर क्यों बन रहा है?”
“अब पूजा और गाना-बजाना बाहर खुले में होगा?”
“सिसौदियों का विजय-ध्वज तो फहरा ही रहा है; अब भक्ति का ध्वज फहराने के लिए यह भक्ति-स्तंभ बन रहा है।”
जितने मुँह, उतनी बातें। मंदिर बना और शुभ मुहूर्त में प्राण-प्रतिष्ठा हुई। धीरे-धीरे सत्संग की धारा बह चली। उसके साथ ही मीरा का यश भी शीत की सुनहरी धूप-सा सुहावना होकर फैलने लगा। मीरा के मंदिर पधारने पर उसके भजन और उसकी ज्ञान-वार्ता सुनने के लिए भक्तों और संतों का मेला लगने लगा। बाहर से आने वाले संतों के भोजन, आवास और आवश्यकताओं की व्यवस्था भोजराज की आज्ञा से जोशीजी करते।
गुप्तचरों से मंदिर में होने वाली सभी गतिविधियों की बातें महाराणा बड़े चाव से सुनते। कभी-कभी वे सोचते— “बड़ा होना भी कितना दुःखदायी है! यदि मैं महाराणा या मीरा का ससुर न होता, मात्र कोई साधारण जन होता, तो सबके बीच बैठकर सत्संग-सुधा का मैं भी निसंकोच पान करता। मैं तो ऐसा भाग्यहीन हूँ कि यदि वेश भी बदलूँ, तो पहचान लिया जाऊँगा।”
जैसे-जैसे बाहर मीरा का यश विस्तार पाने लगा, राजकुल का स्त्री-समाज उनकी निंदा में उतना ही मुखर हो उठा; किंतु मीरा इन सब बातों से बेखबर अपने पथ पर दृढ़तापूर्वक पग धरती हुई आगे बढ़ती जा रही थी। उन्हें ज्ञात होता भी तो कैसे? भोजराज सचमुच उनकी ढाल बन गए थे; परिवार के क्रोध और अपवाद के भाले वे अपनी छाती पर ही झेल लेते थे।”
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।।मीरा चरित - तेईसवाँ अंक।।
इन्हीं दिनों रत्नसिंह का विवाह हो गया और रनिवास की स्त्रियों का ध्यान मीरा की ओर से हटकर नवविवाहिता वधू की ओर जा लगा।
एक दिन भोजराज और रत्नसिंह दोनों भाई बैठे हास-परिहास कर रहे थे। रत्नसिंह ने बहुत दिनों के बाद भाई को यूँ खुले मन से हँसते हुए देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुआ। एक प्रश्न, जो उसके मन में कई दिन से खटक रहा था, उसने स्नेह, आदर और अधिकार के साथ पूछ ही डाला, “उस दिन आपने झूले पर भाभीसा का नाम ‘आकाश का फूल’ क्यों कहा?”
रत्नसिंह भाई के मुख पर आने वाले उतार-चढ़ाव का निरीक्षण करते रहे और कहने लगे, “भाई! साहित्य की समझ के अनुसार तो इसका अर्थ है—सुन्दर, पर अप्राप्य।”
भोजराज के नेत्र भी भाई की स्नेहपूर्ण जिज्ञासा देखकर सजल हो गये। न-न करते हुए भी उन्होंने कह दिया, “यदि तुम्हें ज्ञात हो जाये कि जिसे तुम ब्याह कर लाये हो, वह पर-स्त्री है, तो तुम क्या करोगे?”
“पर-स्त्री? पर कैसे? क्या मेड़ते वालों ने हमारे साथ धोखा किया?” रत्नसिंह ने व्याकुल होकर कहा।
भोजराज ने भाई को शांत करते हुए, विवाह से पहले मीरा द्वारा श्याम-कुंज में ठाकुर के समक्ष वचन देने की बात से लेकर द्वारिका से आये पड़ले तक का समस्त विवरण बता दिया।
रत्नसिंह के तो पाँवों तले ज़मीन खिसक गई। उसके आँसू रुकते न रुक रहे थे। कभी वह अपने भाई की वचनबद्धता, महानता और विवशता का विचार करता और कभी मीरा की भक्ति के स्वरूप का चिन्तन करने लगता।
भोजराज ने धीमे स्वर में कहा, “यहाँ से गया पड़ला ज्यों का त्यों रखा है, और द्वारिका के वस्त्राभूषण इतने मूल्यवान हैं कि उनका अनुमान लगाना भी कठिन है। मैंने दोनों ही देखे हैं। अभी तीज की रात्रि में भी ठाकुरजी पधारे थे।”
“आपने देखा क्या उन्हें?” आश्चर्य से रत्नसिंह ने पूछा।
“नहीं, मुझे दर्शन तो नहीं हुए; पर जो कुछ देख पाया, उससे ऐसा लगा कि वहाँ कोई तीसरा भी उपस्थित था।”
रत्नसिंह ने साहस से अपना भाव समेटा और कहा, “ठीक है, स्थिति में आपने जो किया, वह सबके बस का नहीं और अतुलनीय है; पर अभी भी क्या कठिनाई है? हाँ, भाभीसा-सी अनिन्द्य सुन्दरी न सही, उनसे कुछ न्यून तो मिल ही सकती है।”
भोजराज का स्वर भारी हो गया, “इतना स्नेह करते हो अपने भाई से? सभी बातों का समाधान कर रहे हो, तो बताओ—इस मन का भी क्या समाधान करूँ, जो पहले दिन से ही तुम्हारी भाभीसा के चरणों से बँध गया है और उन्हें अपनी स्वामिनी मान उनकी प्रसन्नता में ही अपना भाग्य देखता है?”
रत्नसिंह स्वयं को संभाल न पाए और भाई की गोद में सिर रखकर सिसकने लगे। कुछ अश्रु-बिन्दु भोजराज की आँखों से ढलककर रत्नसिंह के केशों में कहीं उलझ से गये; पर शीघ्र ही उन्होंने अपने को संभाल लिया।
“भाई! चित्तौड़ के राजकुँवर यूँ तन-मन की पीड़ा से नहीं रोते।” वे रत्नसिंह की आँखों में देखकर मुस्कुराये, “हम कर्तव्य, प्रजा, देश और धर्म की सम्पत्ति हैं। हम अपने लिए नहीं जीते-मरते। इसलिए हमारा जीवन धरोहर है और मृत्यु मंगल-उत्सव। ऐसी दुर्बलता हमें शोभा नहीं देती। उठो, चलें; और ध्यान रहे, आज की बातचीत यहीं गाढ़ देना—इतनी गहरी कि कभी ऊपर न आये।”
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।।मीरा चरित - चौबीसवाँ अंक।।
मीरा ने भोजराज को आसक्ति के बारे में बताया कि यों तो आसक्ति बुराइयों की जड़ है, पर यदि यही आसक्ति भक्ति या किसी सच्चे भक्त में हो जाए तो कल्याणकारी हो सकती है।
“यदि भक्त में आसक्ति होने से कल्याण सम्भव है, तो फिर मुझे चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं। आप परम भक्तिमती हैं और मुझमें आसक्त के सारे लक्षण जान पड़ते हैं,” भोजराज ने संकोच से कहा।
“मनुष्य का जीवन बाजी जीतने के लिए मिलता है। कोई हारने की बात सोच ही ले, तो फिर उपाय क्या है?” मीरा ने कहा।
“विश्वास की बात न फरमाइएगा। वह मुझमें नहीं है। उसके लिए तो आपको ही मुझ पर दया करनी पड़ेगी। मेरे योग्य कोई सरल उपाय हो तो बताने की कृपा करें।”
“भगवान का जो नाम मन को भाए, उठते-बैठते, चलते-फिरते और काम करते लेते रहें। मन में प्रभु का नाम लेना अधिक अच्छा है, किन्तु मन धोखा देने के अनेक उपाय जानता है। बहुत बार साँस की गति ही ऐसी हो जाती है कि हमें जान पड़ता है कि मानो मन नाम ले रहा है। अच्छा है, आरम्भ मुख से ही किया जाए। इसके साथ ही यदि सम्भव हो तो जिसका नाम लेते हैं, उसकी छवि, रूप-माधुरी का ध्यान किया जाए, उसकी लीला-माधुरी के चिन्तन की चेष्टा की जाए। एक तो इस प्रकार मन खाली नहीं रहेगा और दूसरे, मन में उल्टे-सीधे विचार नहीं आ पाएँगे।”
“जी! अब ऐसा ही प्रयत्न करूँगा,” भोजराज ने समझते हुए कहा।
भोजराज किसी राज्य-कार्य से उठकर गए तो देवर रत्नसिंह भाई को ढूँढ़ते हुए इधर आ निकले। उस दिन भाई से हुई वार्ता के पश्चात रत्नसिंह की दृष्टि में अपनी भाभीसा का स्वरूप पहले से कहीं अधिक सम्माननीय एवं पूजनीय हो गया था। मीरा ने झटपट दासियों की सहायता से जलपान और अन्य मिष्ठान्न स्नेह से दिए।
“अरोगो, लालजीसा! इस राजपरिवार में अपनी भौजाई को ‘औगणो’ ही समझ लीजिए। गिरधरलाल की सेवा में रहने के कारण अधिक कहीं आ-जा नहीं पाती। भली-बुरी जैसी भी हूँ, आप सभी की दया है कि निभा रहे हैं।”
“ऐसा क्यों फरमाती हैं आप?” रत्नसिंह ने प्रसाद लेते हुए कहा। “हमारा तो सौभाग्य है कि हम आपके बालक हैं। लोग तीर्थों और भक्तों के दर्शन के लिए दूर-दूर तक भटकते फिरते हैं। हमें तो विधाता ने घर बैठे ही आपके स्वरूप में तीर्थ सुलभ कराए हैं। मेरा तो आपसे हाथ जोड़कर यही निवेदन है कि जो आपको न समझ पाए और जो कोई कुछ कह भी दे, तो उन्हें नासमझ मानकर आप उन पर कृपा रखिए।”
“यह क्या फरमाते हैं आप? किस पर नाराज़ होऊँ, लालजीसा! अपने ही दाँतों से जीभ कट जाए तो क्या हम दाँतों को तोड़ देते हैं? सृष्टि के सभी जन मेरे प्रभु के ही सिरजाए हुए हैं। इनमें से किसको बुरा कहूँ?”
रत्नसिंह ने स्नेह से अपनी आध्यात्मिक जिज्ञासा रखते हुए कहा, “एक बात पूछूँ, भाभीसा हुकम? अगर समस्त जगत ईश्वर से ही बना है, तो आप गिरधर गोपाल की मूर्ति के प्रति ही इतनी समर्पित क्यों हैं? हम सबमें भी उतना ही भगवान है जितना उस मूर्ति में, फिर उसका इतना आग्रह क्यों और दूसरों की इतनी उपेक्षा क्यों? संतों के साथ का उत्साह क्यों और दूसरों के साथ अलगाव का भाव क्यों?”
“आखिर मेवाड़ के राजकुँवर मतिहीन कैसे होंगे?” मीरा हँस दी। “बहुत सुन्दर प्रश्न पूछा है आपने, लालजीसा। जैसे इस सम्पूर्ण देह की रग-रग में आप हैं और इसका कोई भी अंग आपसे अछूता नहीं, इतने पर भी आप सभी अंगों और इन्द्रियों से एक सा व्यवहार नहीं करते। ऐसा क्यों भला? आपको कभी अनुभव हुआ कि पैरों से मुँह जैसा व्यवहार न करके उनकी उपेक्षा कर रहे हैं? गीता में भी भगवान ने समदर्शन का उपदेश दिया है, समवर्तन का नहीं। चाहने पर भी हम वैसा नहीं कर सकेंगे। वैसे भी यह जगत सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणों का विकार है। इन तीनों के समन्वय से ही पूर्ण सृष्टि का सृजन हुआ है।”
रत्नसिंह धैर्य से भाभीसा के कहे एक-एक शब्द का भावार्थ हृदयंगम करते जा रहे थे।
मीरा ने फिर सहजता से कहा, “अच्छा और बुरा क्या है, यह समझना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना यह कि आप उसको कहाँ और किससे जोड़ते हैं। रावण और कंस आदि ने तो बुराई पर ही कमर बाँधी और मुक्ति ही नहीं, उसके स्वामी को भी पा लिया।
पर यदि मैं अपनी समझ से कहूँ, तो अपने सहज स्वभावानुसार चलना ही श्रेष्ठ है। ज्ञान, भक्ति और कर्म—ये सरल साधन हैं। इन्हें अपनाने वाला इस जन्म में नहीं तो अन्य किसी जन्म में अपना लक्ष्य पा ही लेगा। जैसे छोटा बालक उठता-गिरता-पड़ता अंत में दौड़ना सीख ही लेता है, वैसे ही मनुष्य सत् के मार्ग पर चलकर प्रभु को पा ही लेता है।”
रत्नसिंह मन्त्रमुग्ध-सा मीरा के उच्चारित प्रत्येक शब्द का आनन्द ले रहा था और अनजाने में ही मीरा की प्रेम-भक्ति धारा में एक और सूत्र जुड़ता जा रहा था—और रत्नसिंह भी, चाहे बेखबर ही सही, इस भक्ति-पथ पर अग्रसर होने का शुभारम्भ कर चुका था।
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।।मीरा चरित - पच्चीसवाँ अंक।।
मीरा की अवस्था कभी दो-दो दिन और कभी तीन-चार दिनों तक भी सामान्य नहीं रहती थी। वे कभी भगवान से मिलने के हर्ष में, तो कभी विरह के आवेश में, जगत और देह की सुध ही भूल जाती थीं। कभी यूँ ही बैठे-बैठे खिलखिलाकर हँस पड़तीं, कभी मान करके निःशब्द बैठी रहतीं, और कभी रोते-रोते अपनी आँखें सुजा लेतीं। ऐसे दिनों में यदि भोजराज को चित्तौड़ से बाहर जाने का आदेश मिलता, तो यद्यपि वे रणभूमि में प्रसन्नतापूर्वक जाते, तथापि मीरा के भावावेश की चिंता से उनके प्राण व्याकुल हो उठते।
आगरा के समीप सीमा पर भोजराज घायल हो गए। सम्भवतः शत्रु ने विष-बुझे शस्त्र से प्रहार किया था। राजवैद्य ने औषधि लगाकर पट्टियाँ बाँधीं, दवा पिलाई और लेप किया। उपचार के प्रभाव से धीरे-धीरे घाव भी भरने लगा।
एक शीतल रात्रि थी। कुमार अपने कक्ष में थे और मीरा अपने भीतर के कक्ष में। रात्रि काफी बीत चुकी थी, पर घाव की पीड़ा के कारण भोजराज की नींद बार-बार खुल जाती। वे मन ही मन “श्रीकृष्ण, श्रीकृष्ण, श्रीकृष्ण” नाम का जप कर रहे थे।
तभी उन्हें मीरा के कक्ष से जैसे नींद में बड़बड़ाने की ध्वनि सुनाई दी। मीरा खिलखिलाकर हँसती हुई बोली— “चोरजारपतये नमः! आप तो सब चोरों के शिरोमणि हैं; पर आपका यह न्यारा रस-रूप ही मुझे भाता है। रसो वै सः! आप तनिक भी मेरी आँखों से दूर हो जाएँ, यह मुझसे सहा नहीं जाता।”
भोजराज ने अपने पलंग पर बैठे-बैठे देखा— मीरा भी बैठकर मानो किसी से वार्तालाप कर रही थी, पर वह जाग्रत अवस्था में हो, ऐसा प्रतीत नहीं होता था। उन्हें लगा, मीरा प्रभु से ही संवाद कर रही है। थोड़ी देर बाद झपकी लगते ही भोजराज को नींद आ गई।
अचानक मीरा के मुख से पुकार फूटी— “श्यामसुन्दर! मेरे नाथ!! मेरे प्राण!!! आप कहाँ हैं? इस दासी को छोड़कर कहाँ चले गए?”
भोजराज की नींद खुल गई। उन्होंने देखा कि मीरा श्यामसुन्दर को पुकारती हुई झरोखे की ओर दौड़ रही है। उन्हें आशंका हुई कि कहीं वह झरोखे से टकराकर गिर न जाएँ। अतः उन्होंने शीघ्रता से चौकी पर पड़ी गद्दी उठाकर आड़ी कर दी। परन्तु मीरा तो अपनी भाव-तरंग में झरोखे पर ही चढ़ गई। भावावेश में उसने हाथ के एक ही झटके से झरोखे का पर्दा हटा दिया और बाँहें फैलाकर कहने लगी— “मेरे प्रभु! मेरे सर्वस्व!!” और एक पाँव झरोखे के बाहर बढ़ा दिया।
सोचने का अवसर ही न था। पलक झपकते ही भोजराज उछलकर झरोखे तक पहुँचे और शीघ्रता से मीरा को भीतर कक्ष में खींच लिया। एक क्षण का भी विलम्ब हो जाता, तो मीरा की देह नीचे चट्टानों पर गिरकर चूर-चूर हो जाती।
मीरा अचेत हो गई थीं। उनकी देह को सँभालते हुए भोजराज नीचे उतरे। अत्यंत ममता से उन्होंने उन्हें उनके पलंग पर लिटा दिया। मीरा के अश्रुसिक्त चन्द्रमुख पर आँसुओं की मानो रेखाएँ खिंच गई थीं। तभी उनके अधरों से अस्फुट शब्द निकले— “ओह! म्हारा नाथ! तुम्हारे बिना मैं कैसे जीवित रहूँ?”
मीरा के मुख से ये शब्द सुनकर भोजराज मानो चौंक उठे, जैसे किसी गहरी तन्द्रा से जाग गए हों—
“यह… यह क्या किया मैंने? क्या किया? मैं अपने वचन का निर्वाह नहीं कर पाया। मेरा वचन… टूट गया।”
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।।मीरा चरित - छब्बीसवाँ अंक।।
एक दिन एकान्त पाकर भोजराज ने मीरा से कहा, “मैं आपसे कुछ अर्ज करना चाहता हूँ।”
“फरमाइए,” समीप की चौकी पर बैठते हुए मीरा ने पूछा।
“मेरा वचन टूट गया; मैं अपराधी हूँ,” भोजराज ने अटकती वाणी में, नेत्र नीचे करते हुए कहा, “जो दण्ड आप देंगी, उसे सहने के लिए प्रस्तुत हूँ। केवल इतना निवेदन है कि यह अपराधी अब परलोक-पथ का पथिक है। समय अधिक शेष नहीं है; अतः दण्ड ऐसा हो कि यहीं भुगत लिया जाए, अगले जन्म तक कोई ऋण शेष न रहे।”
उन्होंने सजल नेत्रों से मीरा की ओर देखा।
“अरे, यह क्या?” मीरा ने उनके जुड़े हुए हाथ खोलकर उनके आँसू पोंछ दिए, फिर गम्भीर स्वर में बोली, “मैं जानती हूँ, उस समय मैं अचेत थी; पर प्रातः जब साड़ी रक्त से भीगी देखी, तो समझ गई कि कोई आकस्मिक विवशता आ पड़ी होगी। इसमें अपराध जैसा क्या हुआ भला?”
“विवशता ही आ पड़ी थी—या तो आपको झरोखे से नीचे गिरते देखता, या वचन तोड़ता। इतना समय भी नहीं था कि दासियों को पुकारकर जगाता,” भोजराज ने कहा।
“वचन क्यों टूटा, इसका तनिक भी परिताप मुझे नहीं है,” मीरा ने शांत स्वर में कहा, “मेरे मन में आपके प्रति रंचमात्र भी रोष नहीं; फिर दण्ड कैसा? यदि दण्ड मिलना ही चाहिए, तो वह मुझे मिलना चाहिए।”
“आपको क्यों?” भोजराज व्याकुल स्वर में बोल पड़े, “नहीं, नहीं, आपको क्यों? आपने कौन-सा अपराध किया है? हे द्वारिकाधीश! यह निर्दोष हैं, इनका कोई अपराध नहीं है। खोट तो मुझमें है। तेरे दरबार में जो भी दण्ड निश्चित हुआ हो, वह मुझे दे देना; इस निर्मल आत्मा को कभी मत सताना, प्रभु!”
यह कहते-कहते उनकी आँखों से अश्रुधारा बह चली।
“अब यह आप क्या कर रहे हैं?” मीरा ने कोमल उलाहना दिया, “बीती हुई बात पर अश्रुपात करेंगे तो मनोदशा और रोग दोनों ही बढ़ेंगे। कोई देखेगा तो यही कहेगा कि मैं आपको दुःखी कर रही हूँ। आप पहले पूर्णतः स्वस्थ हो जाएँ; तब इस विषय पर पुनः विचार कर लेंगे। सच तो यह है कि मुझे इसमें अपराध जैसा कुछ प्रतीत ही नहीं हुआ। आप शीघ्र स्वास्थ्य-लाभ करें और पूर्णतः स्वस्थ हो जाएँ—बस, यही मेरे लिए पर्याप्त है।”
मीरा की वाणी सुनकर भोजराज हल्का-सा मुस्कुरा पड़े, “अब तो स्वास्थ्य-लाभ अवश्य करूँगा। आपने मुझे क्षमा कर दिया—यह मेरे लिए अत्यन्त बड़ी कृपा है। मैं योग्य तो नहीं, तथापि एक और निवेदन करना चाहता हूँ।”
“ऐसा क्यों कहते हैं?” मीरा ने उनके केशों में स्नेहपूर्वक उँगलियाँ फेरते हुए कहा, “आदेश दीजिए; उसका पालन कर मुझे ही प्रसन्नता होगी।”
।।मीरा चरित - सत्ताईसवाँ अंक।।
थोड़ी देर बाद भोजराज ने कहा, “अब अंत समय निकट है; एक बार प्रभु के दर्शन पा लेता।”
मीरा की बड़ी-बड़ी पलकें मुंद गईं। केशों में घूमती हुई उँगलियाँ रुक गईं। भोजराज को लगा कि उनकी आँखों के सामने सैकड़ों चन्द्रमाओं का प्रकाश फैल गया है। उस दिव्य ज्योति के मध्य खड़ी वह साँवली मूरत मानो रूप का अथाह समुद्र हो। वह सलोनी मूर्ति, नेत्रों में अथाह नेह भरकर बोली—
“भोज, तुमने मीरा की नहीं, मेरी सेवा की है। मैं तुमसे प्रसन्न हूँ।”
“मेरा अपराध, प्रभु…” भोजराज अटकती वाणी में बोले।
वह मूरत हँसी, जैसे रूप-सागर में लहरें उठी हों।
“स्वार्थ से किए गए कार्य ही अपराध बनते हैं, भोज। निःस्वार्थ के तो सभी कर्मफल मुझे ही अर्पित होते हैं। तुम मेरे हो, भोज; और कहो, तुम्हें क्या चाहिए?”
उस मोहिनी मूरत ने दोनों हाथ फैलाकर भोजराज को छाती से लगा लिया। आनंद के आवेश में भोजराज अचेत हो गए।
जब चेतना लौटी, तब उन्होंने हाथ बढ़ाकर मीरा की चरण-रज को माथे से लगा लिया और कहने लगे—
“पारस तो लोहे को सोना बना सकता है, पर यह पारस तो लोहे को पारस ही बना देता है।”
दोनों ही भक्त आनंद-मग्न थे।
दूसरे दिन भोजराज ने अपने छोटे भाई को बुलाकर कहा, “रतनसिंह, तुम्हारी भाभी का भार मैं तुम्हें सौंप रहा हूँ। मुझे वचन दो कि इन्हें कभी कोई कष्ट नहीं होने दोगे।”
“यह क्या कह रहे हैं आप?” यह कहते हुए रतनसिंह भाई की छाती से लगकर रो पड़े।
भोजराज ने पुनः कहा, “वचन दो, भाई! नहीं तो मेरे प्राण सहज नहीं निकलेंगे। अब अधिक समय शेष नहीं रहा।”
रतनसिंह ने अपने भाई के चरणों पर दाहिना हाथ रखकर वचन दिया—
“मैं भाभीसा को अपनी कुलदेवी से भी अधिक पूज्य मानूँगा। इनका प्रत्येक आदेश श्रीजी के आदेश से भी अधिक अनिवार्य समझूँगा। इनके ऊपर आने वाली हर विपत्ति को रतनसिंह अपनी छाती पर झेलेगा।”
भोजराज ने अपने भाई को हृदय से लगा लिया।
दूसरे दिन गम्भीरी के तट पर चंदन की एक चिता जल रही थी। राजमहल और नगर में चारों ओर हाहाकार व्याप्त था। मीरा की आँखों से आँसुओं की अविरल झड़ी लग गई।
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।। मीरा चरित - अट्ठाइसवाँ अंक ।।
राजमाता पुँवार जी, जो मीरा की सासूमाँ थीं, उन्हें मीरा को दी जाने वाली यातनाओं की भनक पड़ चुकी थी। उनके मन में विचार उठा कि एक बार स्वयं जाकर मीरा से मिलें और उसे पीहर चले जाने का आग्रह करें।
एक दिन राजमाता मीरा के महल पधारीं और स्नेहपूर्वक बोलीं, “बेटी! तुम्हें देखती हूँ तो आश्चर्य होता है। राणाजी ने तुम्हें दुख देने में कोई कसर नहीं छोड़ी, पर तुम्हारा धैर्य और भक्ति में अटूट विश्वास अद्भुत है। तुम अपने पथ पर प्रेम-निष्ठा से निरंतर अग्रसर हो। अपने गिरिधर की सेवा में लीन रहकर तुम्हें न अपने कष्टों का भान है और न ही भूख-प्यास का।”
मीरा ने आदरपूर्वक सासूमाँ से कहा, “हुकम! कई बार किसी कार्य में पूर्णतः निमग्न रहने पर मनुष्य को चोट लग जाती है, पर उसका ध्यान उस पीड़ा की ओर जाता ही नहीं। बाद में जब वह घाव देखता है, तब सोचता है कि यह चोट कब और कहाँ लगी; पर स्मरण नहीं आता, क्योंकि उस समय उसका मन पूर्णतः अन्यत्र लगा हुआ था। इसी प्रकार यदि मन को देह से हटाकर प्रभु में लगा दिया जाए, तो देह के साथ क्या हो रहा है, इसका तनिक भी अनुभव नहीं होता।”
राजमाता ने व्याकुल स्वर में कहा, “पर बीनणी! राणाजी तो प्रतिदिन तुम्हें मारने का प्रयत्न करते रहते हैं। किसी दिन सचमुच ही कुछ अनर्थ कर बैठेंगे। यह सब सुन-सुनकर मेरा हृदय व्यथित हो उठता है। पर क्या करूँ? रानी हाँडीजी के अतिरिक्त यहाँ हमारी किसी की चलती नहीं। विक्रमादित्य भी दूसरी रानी का पुत्र है। मैं तो सोचती हूँ कि तुम पीहर चली जाओ।”
मीरा मंद मुस्कान के साथ बोली, “हुकम! हम कहीं भी जाएँ, कुछ भी करें, अपना प्रारब्ध तो हमें कहीं भी भोगना ही पड़ता है। जो दूसरों को दुख देना चाहता है, उसे पहले स्वयं दुख सताता है; जो क्रोध करता है, वह पहले स्वयं क्रोध से जलता है। जितनी पीड़ा वह दूसरे को देना चाहता है, उतनी ही पीड़ा वह भीतर ही भीतर स्वयं भोगता है। और यदि कोई मुझे पीड़ा दे, पर मैं उसे स्वीकार ही न करूँ, तो वह पीड़ा मुझे कैसे स्पर्श करेगी? आप सत्य मानिए, मुझे राणाजी से तनिक भी रोष नहीं। आप निश्चिंत रहें। प्रभु की इच्छा के बिना कोई कुछ नहीं कर सकता, और प्रभु की प्रसन्नता में ही मेरी प्रसन्नता है।”
राजमाता ने आश्चर्य से पूछा, “बीनणी! तुममें इतना विश्वास और धैर्य कहाँ से आया?”
मीरा ने विनम्रता से उत्तर दिया, “हुकम! इसमें मेरा कुछ भी नहीं। यह सब संतों की कृपा है। सत्संग ने ही मुझे सिखाया है कि प्रभु ही जीव के सबसे निकट और घनिष्ठ आत्मीय हैं; वही सर्वोच्च सत्ता हैं। जब प्रभु साथ हों, तब भय का स्थान ही कहाँ रहता है? फिर किसी और की आवश्यकता भी कहाँ रह जाती है? संतों की चरण-रज, उनकी वाणी और उनकी कृपा में अपार शक्ति होती है।”
राजमाता ने गंभीर होकर कहा, “तुम सत्य कहती हो, बीनणी। तभी तो इतने कष्ट सहकर भी तुम सत्संग नहीं छोड़ती। कभी विष भेजा जाता है, कभी सर्प; तुम्हें मारने का प्रयत्न निरंतर होता रहता है। पर एक बात मेरी समझ में नहीं आती—भगवान के घर में यह कैसा अन्याय है कि निरपराध जन अन्याय की घानी में पिसते रहते हैं और अपराधी लोग मौज करते हैं? तुम नहीं जानती, हाँडीजी राजनीति में अत्यंत पटु हैं, और अब विक्रमादित्य को भी तुम्हें कष्ट दिए बिना शांति नहीं मिलती।”
मीरा ने शांत स्वर में कहा, “हुकम! आप मेरी चिंता न करें। बीती बातों को स्मरण करके दुखी होने से क्या लाभ? वे तो बीत गईं, अब लौटेंगी नहीं। आने वाला समय भी हमारे वश में नहीं; फिर उसकी चिंता क्यों? वर्तमान क्षण का ही सदुपयोग करना उचित है। दूसरों के दोषों से हमें क्या? उनका घड़ा भरेगा तो एक दिन फूटेगा भी। न्याय किसी का पक्षपाती नहीं होता, हुकम; भगवान सबके साक्षी हैं। समय आने पर कर्मों की खेती अवश्य फल देती है। हमारे दुख-सुख कोई बाहरी वस्तु नहीं, जिन्हें कोई हमें दे सके। प्रत्येक जीव अपनी ही कमाई का फल भोगता है; अन्य तो केवल निमित्त मात्र होते हैं।”
यह कहकर मीरा ने स्नेहपूर्वक सासूमाँ के आँसू पोंछे, उन्हें ज्ञान-भरी सांत्वना दी और आदर सहित विदा किया।
।।मीरा चरित – उनतीसवाँ अंक।।
एक दिन मीरा सदा के लिए चित्तौड़ छोड़कर मेड़ता की ओर चल पड़ी। जिस वैशाख मास में एक दिन भोजराज के दुपट्टे से गाँठ जोड़कर, गाजे-बाजे के साथ वह इस महल की देहरी पर पालकी से उतरी थी, आज उसी देहरी से सबको विदा लेकर प्रस्थान कर रही थी। ये वही महल-चौबारे थे, जहाँ उसने अनेक उत्सव किए थे; जहाँ उसके गिरधरलाल ने अनेक चमत्कार दिखाए थे; जहाँ उसके प्रिय सखा, कलियुग में द्वापर के भीष्म से भी अधिक भीषण प्रतिज्ञा का पालन करने वाले महाभीष्म भोजराज ने देह त्यागी थी; और जहाँ विक्रमादित्य ने उसके विरुद्ध अनेक षड्यंत्र रचे थे।
एक बार भरपूर दृष्टि से उसने सब ओर देखा। फिर उस कक्ष में पहुँची, जहाँ भोजराज विराजते थे। वहाँ जाकर वह निःशब्द खड़ी हो गई। पंचरंगी लहरिये का साफा, गले में जड़ाऊ कण्ठा-पदक, कटार और तलवार धारण किए, हँसते-मुस्कराते भोजराज मानो उसके सम्मुख साकार खड़े हो गए हों। मीरा की आँखें भर आईं—
“सीख बख्शाइए, महाराजकुमार! विदा, विदा मेरे सखा! मेरे सुदृढ़ कवच! मुझसे जो भूलें, जो अपराध हुए हों, उनके लिए मैं क्षमा याचना करती हूँ।”
यह कहते हुए मीरा ने मस्तक धरती पर रखकर भोजराज को प्रणाम किया—
“मैं अभागिनी आपको कोई सुख न पहुँचा सकी, न कोई सेवा कर सकी। अपने गुणों और धीर-गंभीर स्वभाव से आपने जो मेरी सहायता की, सदा ढाल बनकर रहे, जो भीष्म-प्रतिज्ञा आपने की और अंत तक निभाई—उसके बदले मैं अकिंचन आपको क्या अर्पित करूँ? किन्तु हे मेरे सखा! मेरे स्वामी सर्वसमर्थ हैं। वे ही आपको अपनी इस दासी की सेवा का प्रतिफल देंगे। आपका मंगल हो… आप जहाँ भी हों… मेरा आपको प्रणाम।”
उसने पुनः अश्रुपूरित नेत्रों से धरती पर प्रणाम किया।
बहुत देर से चम्पा स्वामिनी को इस प्रकार भाव-विह्वल होकर रोते देख रही थी। वह बोली—
“बाईसा हुकम! नीचे पालकी आ गई है, सबसे मिलने पधारिए।”
आँसू पोंछकर मीरा उस कक्ष से बाहर आ गई। आवश्यक सामान तथा गिरधर की पोशाकें और आभूषण गाड़ियों पर लदकर पहले ही भेजे जा चुके थे। जो सेवक और दासियाँ चित्तौड़ में ही रहने वाले थे, उनके लिए द्रव्य और जीविका का उचित प्रबंध कर दिया गया था। सब मन ही मन जानते थे कि अब मीरा पुनः चित्तौड़ की ओर मुख न करेगी; अतः उसके प्रियजनों के प्राण व्याकुल थे।
मीरा अपनी सासों और गुरुजनों की चरण-वंदना करने पधारी। सबने उसे भारी मन से विदा दी। धनाबाई सास उसे हृदय से लगाकर बिलख पड़ीं, तो मीरा ने उन्हें स्नेहपूर्वक आश्वस्त किया। हाड़ीजी (विक्रमादित्य की माता) को मीरा ने प्रणाम कर अनजाने में हुए अपराधों के लिए क्षमा माँगी।
हाड़ीजी बोलीं—
“पहले मैं समझती थी कि तुम जानबूझकर हम सबकी अवज्ञा करती हो, बीनणी! किन्तु बाद में समझ गई कि भक्ति के आवेश में तुम्हें किसी का ध्यान ही नहीं रहता। तुमसे पल्ला फैलाकर एक भिक्षा माँगती हूँ… दोगी? हमारे किए अपराधों को मन में स्थान मत देना…”
मीरा ने स्नेहपूर्वक उनका पल्ला हटाकर उनके दोनों हाथ पकड़कर अपने मस्तक से लगाते हुए कहा—
“ये हाथ किसी के सामने फैलाने के लिए नहीं बने हैं। ये हाथ आश्रितों पर छत्रछाया करने और मुझ जैसी अबोध को आशीर्वाद देने के लिए बने हैं। ये चित्तौड़ की जननी के हाथ हैं। आपके ऐसा करने से आपके राजमाता-पद का अपमान होता है।”
“नहीं! मुझे कहने दो, बीनणी!” कहते-कहते हाड़ीजी की आँखों से आँसू बहने लगे।
“नहीं हुकम! कुछ मत फरमाइए। मेरे मन में कभी किसी के लिए रोष नहीं आया। मनुष्य अपने कर्मों का ही फल भोगता है; दूसरा कोई उसे न दुःख दे सकता है, न सुख—यह मेरा दृढ़ विश्वास है। आप निश्चिंत रहें। भगवान कभी किसी का अहित नहीं करते; उनके विधान में सबका हित, सबका मंगल ही निहित होता है।”
यह कहकर मीरा ने स्नेह से सास को हृदय से लगाया, प्रणाम किया और चलने की आज्ञा माँगी।
अब मीरा का लक्ष्य उसे अपनी ओर पुकार रहा था। वह धीरे-धीरे पीछे के रिश्तों को सम्मान देकर आगे बढ़ने लगी। उसके हृदय में कहीं दूर से एक ही मधुर संगीत-ध्वनि गूँज रही थी—
🌿 “चालाँ वाही देस…” 🌿
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।।मीरा चरित - तीसवाँ अंक।।
मीरा की आँखों से आँसुओं की झड़ी लग गई थी, पर दूसरे ही दिन वह उठकर पुनः अपने नित्य कर्मों में लग गईं। दसवें दिन कुछ बूढ़ी विधवा स्त्रियाँ आईं और मीरा की चूड़ियाँ तथा बिंदी उतारने लगीं। मीरा ने आश्चर्य से पूछा— “आप सबको किसने कहा है कि मेरे पति मर गए हैं? क्या ठाकुर जी कभी मरते हैं?”
स्त्रियों ने कहा— “पति नहीं तो फिर वे आपके क्या थे? ऐसा बचपना अच्छा नहीं लगता। आप तो उनके साथ ही यहाँ पधारी थीं।”
मीरा शांत स्वर में बोलीं— “वे मेरे मित्र थे; वे लाए तो मैं आ गई। अब यदि आप मुझे वापस भेज देंगी तो मैं चली जाऊँगी। परंतु पति रहते चूड़ियाँ क्यों उतारूँ?”
यह बात महाराणा तक पहुँची। सुनकर वे एक बार तो क्रोधित हो उठे, किंतु रतनसिंह ने आकर कहा— “भाभीसा तो पहले से ही फरमाती हैं कि ठाकुर जी ही उनके पति हैं। आज उन्होंने ऐसा कौन-सा नया वचन कह दिया, जिससे सब इतने व्याकुल हो उठे? यदि वे चूड़ियाँ नहीं उतारना चाहतीं, तो उन पर किसी प्रकार का जोर-ज़बरदस्ती करना उचित नहीं है।”
रतनसिंह की इस बात पर महाराणा साँगा ने मौन धारण कर लिया। तत्पश्चात रतनसिंह रनिवास में जाकर स्त्रियों को डाँट दिया। जिसने भी यह प्रसंग सुना, वह आश्चर्य में डूब गया। स्त्रियों में निंदा और कुचर्चा होने लगी। उसी दिन से मीरा उपेक्षित तथा घृणा की दृष्टि से देखी जाने लगीं।
परंतु दूसरी ओर संत समाज में उनका मान निरंतर बढ़ता जा रहा था। पुष्कर आने वाले संत, मीरा के दर्शन और सत्संग के बिना अपनी यात्रा को अधूरी मानते थे। उनके सरल, सीधे-सादे, किंतु अत्यंत मार्मिक भजन जनसाधारण के मानस को सहज ही आकृष्ट कर लेते थे।
।।मीरा चरित - इकतीसवाँ अंक।।
🌿 अपने प्रियतम के देश—अपने सच्चे देश—पहुँचने की सोई हुई लालसा मानो मीरा के हृदय का बाँध तोड़कर आकाश छूने लगी। ज्यों-ज्यों वृन्दावन निकट आता जाता, त्यों-त्यों उसके हृदय का आवेग अदम्य होता जाता। बड़े प्रयत्न से वह स्वयं को संयत रखती। उसके बड़े-बड़े नेत्र आसपास के वनों में अपने प्राणाराध्य की खोज में चंचल हो उठते; मानो कहीं श्यामसुन्दर वंशीवादन करते हुए किसी वृक्ष के नीचे खड़े अभी दृष्टिगोचर हो जाएँगे।
🌿 वह बार-बार पालकी या रथ रुकवाकर पैदल चलने लगती। बड़ी कठिनाई से चम्पा, चमेली, केसर आदि दासियाँ उन्हें समझा-बुझाकर, मनुहार कर यह निवेदन कर पातीं कि अभ्यास न होने से वे धीरे चल रही हैं और साथ चल रहे यात्रियों को असुविधा हो रही है। किन्तु इसके बाद भी मीरा पैदल चलने से विरत न होती। उनके चरण छिल गए थे; उनमें छाले उभरकर फूट गए थे, परन्तु वह इन सब कष्टों से निस्संग थीं। दासियों और सेवकों की आँखें भर आतीं। मीरा हँसकर उन्हें अपनी सौगंध देकर पुनः रथ या गाड़ी पर बैठा देती।
🌿 मीरा भजन गाती, करताल बजाती आगे बढ़ती जातीं; पर दासियों को केवल उनके चरणों की रक्त-छाप दिखाई देती, और प्रत्येक पद के साथ उनका हृदय कराह उठता। जब यह पीड़ा असहनीय हो गई, तो चम्पा रथ से कूद पड़ी और स्वामिनी के चरणों से लिपट गई—
“मुझसे जो भी अपराध हुए हों, बाईसा हुकुम! ऐसी कठोर सज़ा मत दीजिए कि अभागिनी चम्पा सह न सके। हम पर दया कीजिए, स्वामिनी… दया कीजिए…”
यह कहते-कहते वह अचेत-सी होकर उनके चरणों में लुढ़क गई।
“क्या हुआ तुझे?” कहते हुए मीरा स्वयं भूमि पर बैठ गईं। चम्पा को गोद में भरकर उसके आँसू पोंछते हुए स्नेह से बोलीं।
“अपने चरण तो देखिए, बाईसा हुकुम!” चमेली ने जैसे ही मीरा के पाँव को स्पर्श किया, मीरा के मुख से वेदना की हल्की-सी कराह निकल गई।
“मैं तो ठीक हूँ, पगली! तुम क्यों व्याकुल होती हो? यदि कुछ हुआ भी है, तो वह सार्थक हुआ—यह मांस-पिंड प्रभु के धाम की ओर चलने में ही सफल हुआ। इसमें हानि ही क्या है?”
चम्पा रोती हुई बोली—
“हानि तो हमारी हुई है, हुकुम! हम अभागिनियों को, जो सदा सेवा की अभ्यासी हैं, सवारी पर बैठने की आज्ञा मिले; और हमारी सुमन-सुकुमारी स्वामिनी नंगे पाँव चलें; हम उनके घावों से रक्त बहता देखें और स्वयं सवारी का सुख लें—इससे बड़ा दण्ड तो यमराज की शासन-पुस्तिका में भी न होगा!”
यह सुनते ही सभी दासियाँ फूट-फूटकर रो पड़ीं।
🌿 जो यात्री यह दृश्य देख रहे थे, वे भी अपने आँसू न रोक सके। रात्रि में जब पड़ाव के तम्बू में चमेली मीरा के घायल तलवों पर औषधि-लेप लगा रही थी, तब भी मीरा का एक ही आग्रह था—
“अरे, यह सब छोड़! जा, किसी यात्री से पूछकर आ कि वृन्दावन अब कितनी दूर है!”
वृन्दावन समीप जानकर वह तत्काल चलने को उद्यत हो उठती। जो यात्री पहले वहाँ जा चुके थे, उन्हें बुलवाकर दूरी पूछती; वहाँ के घाटों, वनों और कुंजों का वर्णन सुनती; यमुना, गोवर्धन और मंदिरों का हाल पूछती। कभी स्वयं उनकी महिमा का गान करती, तो कभी दूसरों के मुख से सुनकर पुलकित हो उठती।
🌿 प्रातःकाल जब यात्रियों की टोली पुनः चली, तो मीरा के चरण मानो मन की गति पाकर उड़ने लगे। उसका पुलकित हृदय शब्दों में आनंद उँडेलने लगा—
🌿चलो मन गंगा-जमना तीर॥
गंगा-जमना निर्मल पानी, सीतल होत शरीर।
बंसी बजावत गावत कान्हा, संग लिए बलबीर॥
मोर-मुकुट पीताम्बर सोहे, कुण्डल झलकत हीर।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, चरण-कमल पर सीर॥🌿
🌿 कहीं एक साथ नदी, पर्वत और वन दिखाई देते, तो मीरा को तत्काल वृन्दावन की स्फुरणा हो आती। वह गाती, नृत्य करती और भूमि पर प्रणिपात करने लगती। दासियाँ प्रत्येक कदम पर उन्हें सँभालतीं। बड़ी कठिनाई से समझा पातीं—
“बाईसा! अभी वृन्दावन थोड़ी दूर है…”
किन्तु मीरा के लिए दूरी का कोई अर्थ न था। जिसके हृदय में लक्ष्य का प्रकाश प्रज्वलित हो उठता है, उसके लिए पथ की वेदना भी वंदनीय हो जाती है। जिन चरणों में भक्ति की अग्नि जलती है, वे रक्त से नहीं, प्रेम से रंगे होते हैं।
मीरा का यह मार्ग केवल वृन्दावन की यात्रा न था; यह आत्मा की परमात्मा की ओर उन्मुख होने की यात्रा थी।
जब लक्ष्य पवित्र हो, तो पीड़ा भी पूजा बन जाती है;
जब प्रेम सच्चा हो, तो हर कदम तीर्थ बन जाता है।
वृन्दावन बाहर नहीं—वह उस हृदय में बसता है,
जो हर कष्ट को कह सके—
“यह भी मेरे प्रभु की ओर बढ़ता हुआ एक कदम है।” 🌿
।। मीरा चरित – बत्तीसवाँ अंक ।।
🌿 मीरा का आवास-स्थान सेवाकुंज के समीप एक गली में ही था। सेवाकुंज तो स्वयं सिद्ध पीठ है — मानो वृन्दावन का हृदय; प्रिया और गिरधरलाल की नित्य रास-स्थली। पास ही श्री यमुना महारानी, जो प्रियालाल जी की नित्य रस-केलि की चिर-साक्षी हैं। चारों ओर मंदिर, सत्संग — मीरा का उत्साह तो पल-पल में उफान ले रहा था। वह किसी दूसरे ही जगत में थी।
वृन्दावन-वास के दिन और रात्रि भी इस जगत के कहाँ थे? मीरा को कुछ खाने-पीने की भी सुध कहाँ थी? पर हाँ... उसकी आत्मा अवश्य पुष्ट हो रही थी।
🌿 मीरा की ऐसी स्थिति में भीतर-बाहर का सारा कार्य दासियाँ ही संभाल रही थीं। चमेली बाई अपने पति शंकर और केसर बाई अपने पति केशव को साथ लेकर, वृन्दावन के लिए प्रस्थान करते समय, मीरा के पीछे चल दी थीं।
चमेली की कोई संतान नहीं थी और केसर ने अपना एकमात्र पुत्र गोमती को सौंप दिया था। जब केसर बाई स्वामिनी के पीछे-पीछे चलीं, तो केशव भी साथ हो लिया। मीरा ने जब केसर के पुत्र गोविन्द को माँ के लिए रोते देखा, तो केसर से लौट जाने का बहुत आग्रह किया।
पर केसर ने हाथ जोड़कर निवेदन किया —
“माँ-बाप ने सरकार के विवाह के समय मुझे इन चरणों में सौंपा था। सेवा में पारंगत न होने पर भी ऐसा क्या महान अपराध बन पड़ा, हुकम, कि इस दासी को आप अनाथ कर रही हैं?
बस एक अनुरोध है — वृन्दावन में आप जहाँ भी रहेंगी, मैं आपके दूर से ही दर्शन कर लिया करूँगी। बस इतनी नियामत बख्शें आप इस किंकरी को!”
चमेली ने भी कहा —
“वहाँ तो सब कुछ सीधे-सीधे मिलेगा नहीं। चम्पा श्रीचरणों की सेवा करेगी; तो मैं और केसर लकड़ी लाना, आटा पीसना, कपड़े धोना, बर्तन माँजना, बुहारी लगाना आदि कार्य संभाल लेंगी। इतना जीवन आपकी सेवा में बीता है, तो बाकी का क्यों अभिशाप बने?”
मीरा दोनों की सेवाभावना से निरुत्तर हो गईं।
🌿 चम्पा ने विवाह किया ही नहीं था। वह मीरा की दासी ही नहीं, अंतरंग सखी भी थी — उसके भावों की वाहिका, अनुगामिनी, अनुचरी।
कभी-कभी जब अंतरंग भावों की चर्चा होती, तो उसके भावों की उत्कृष्टता देखकर मीरा चकित हो उठतीं। चम्पा से मीरा को स्वयं चिंतन में सहायता मिलती। वे पूछतीं —
“चम्पा! कहाँ से पा गई तू यह रत्नकोष?”
वह हँसती —
“सब कुछ इन्हीं चरणों से पाया है, सरकार! और किसी को तो जानती नहीं मैं!”
🌿 कथा, सत्संग, मंदिरों के दर्शन, भजन, कीर्तन, नृत्य आदि का उल्लास और उत्साह ऐसा था, मानो परमानंद-सागर में डुबकी पर डुबकी लग रही हो।
मीरा की भजन-ख्याति वृन्दावन में फैलने लगी थी। जिसने भी सुना, वही दौड़ा-दौड़ा आता। आकर कोई प्रणाम करता और कोई आशीर्वाद देता। ब्रज के संतों से विचार-विनिमय और भाव-चर्चा करके मीरा तीव्रतापूर्वक साधना के सोपानों पर चढ़ने लगीं।
यद्यपि मीरा स्वयं सिद्धा संत थीं, पर यहाँ इस पथ में भला ‘इति’ कहाँ है?
🌿 मीरा का मन पूर्णतः वृन्दावन में रच-बस गया था। उसे कभी स्मरण भी नहीं होता कि वह प्रारंभ से यहाँ नहीं थी। उसे वृन्दावन भा गया था, और वहाँ की सात्विकता तथा घर-घर में सहज और स्वाभाविक भक्ति देखकर उसका मन उल्लास से गा उठता —
🌿
आली! म्हाँने लागे वृन्दावन नीको।
घर-घर तुलसी, ठाकुर पूजा — दरसन गोविन्दजी को॥
निरमल नीर बहे जमुना को, भोजन दूध-दही को।
रतन सिंहासन आप विराज्या, मुकुट धर्यो तुलसी को॥
कुंजन-कुंजन फिरूँ साँवरा, सबद सुणत मुरली को।
मीरा रे प्रभु गिरधर नागर — भजन बिना नर फीको॥
।। मीरा चरित – तैंतीसवाँ अंक ।।
🌿 पच्चीस वर्ष व्रज में निवास करके मीरा ने विक्रम संवत 1621 में द्वारिका जाने का निश्चय किया। अपने जीवन के अगले पड़ाव पर पहुँची — द्वारिका। द्वारिका और द्वारिकाधीश के दर्शन कर मीरा प्रसन्न-मग्न हो गई। प्रभु के दर्शन कर उनकी छवि को निहारते ही उसका हृदय गा उठा —
🌿
म्हारों मन हर लीन्हों रणछोड़।
मोर मुगट, सिर छत्र बिराजे, कुंडल री छबि ओर॥
चरण पखारे रतनाकर री धरा, गोमत जोर।
धुजा-पताका तट-तट राजे, झालर री झकझोर॥
भगत जना रा काज सँवार्या, म्हाँरा प्रभु रणछोर।
मीरा रे प्रभु गिरधर नागर, कर गह्ययो नंदकिशोर॥
🌿 मीरा की कीर्ति उनसे पहले ही द्वारिका पहुँच चुकी थी। उनके आगमन का समाचार सुन संत-भक्त सत्संग के लोभ से आने लगे, जैसे पुष्प-गंध पाकर भ्रमरों का झुंड उमड़ आता हो। उनकी अनुभव-पक्व वाणी, स्निग्ध मुखाकृति, तेजोदीप्त नेत्र, त्यागमय जीवन और राग-रागिनियों से युक्त भावपूर्ण, अद्भुत, आलौकिक कंठ-स्वर आने वाले भक्तों के सारे संशयों का नाश कर देते थे।
मीरा की देह में अब हल्की-सी स्थूलता आ गई थी; किन्तु जब वे रणछोड़राय के सम्मुख भाव-विभोर नृत्य करतीं, तो प्रतीत होता मानो किसी अन्य लोक की देवांगना धरा पर अवतरित हो गई हो।
🌿 गोमती की धारा और उसका सागर से मिलन — उस सागर का अंतहीन विस्तार और गहराई — उन्हें अपने स्वामी से मिलने का संदेश देते। वे सब उनके ऐश्वर्य के प्रतीक से लगते। प्रातः वे सागर-गर्भ से उदित होते सूर्य को एकटक निहारा करतीं। इसी प्रकार सांध्यकाल में, जब प्रचंड रश्मियाँ अपना तेज समेट अनुराग-रंजित होकर देवी प्रतीची के भवन-द्वार पर ठहरतीं, उनके प्राण एक अनोखी पीड़ा से छटपटा उठते।
कभी मीरा को लगता कि द्वारिकाधीश उस पार किनारे पर मुस्कराते खड़े हैं, और गोमती की उत्तालित तरंगें ठाकुर के श्रीचरण धोवन हेतु आपस में होड़ लगा रही हैं।
🌿 मीरा की आँखों के सम्मुख द्वापर की द्वारिका मूर्त हो उठती — और उस द्वारिका में सहस्रों भवनों से घिरी वह स्वर्ण-परिखा, वह रत्नजड़ित द्वार! उस द्वार के दर्शन मात्र से वे अधीर हो उठतीं। उनकी देह काँपने लगती, और प्रवेश से पूर्व ही अचेत होकर भूमि पर गिर पड़तीं।
कभी उस द्वार पर टकटकी लगाए कहतीं —
“यह... यह तो अपना ही... अपने स्वामी और उनकी प्रियतम पत्नियों के महलों का द्वार है...! कितने लोग आ-जा रहे हैं इस द्वार से... कितनों को मैं पहचानती हूँ... ये — ये सात्यकी हैं; और ये कृतवर्मा, नारायणी सेना के उद्भट वीर सेनापति। ये साम्ब जा रहे हैं, और ये... उद्धव! प्रद्युम्न... अहा! प्रद्युम्न ने कैसी मुख-छवि पाई है — बिल्कुल अपने पिता की तरह। सहसा देखकर लगता है मानो वही हों...
और वे आ रहे हैं — भुवनपति द्वारिकाधीश! मेरे... मेरे... प्राणपति... मेरे सर्वस्व... मेरे घूँघट की लाज... मेरे जीवन की अवधि... मेरे...”
आगे कुछ कहने को शब्द न मिलते। वह मदगज-चाल, वह मोहन-मुस्कान, दृगों की वह अतिप्यारी चितवन — अहा! उन्होंने मेरी ओर देखा... पहचान आई उनकी दृष्टि में... वे मुस्कराए... मेरी ओर देखकर...!”
🌿 गोमती-तट पर यह सब दर्शन करते-करते मीरा मूर्छित हो जातीं। दासियाँ उपचार में जुट जातीं। दूर खड़े लोग उनकी दशा देख “धन्य! धन्य!” कह उठते। उनकी चरण-रज सिर पर चढ़ाकर स्वयं को कृतार्थ मानते।
उनके अधीर प्राण देह की बाधा लाँघने को व्याकुल हो उठते। दासियाँ, सखियाँ समझातीं; पर उनकी व्याकुलता और बढ़ती जाती। वे गाते हुए अपने भावों का श्रृंगार करतीं —
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राय श्री रणछोड़, दीज्यो द्वारिका रो वास।
शंख, चक्र, गदा, पद्म दरसे मिटे जम की त्रास॥
सकल तीर्थ गोमती के, रहत नित-निवास।
शंख, झालर, झांझर बाजे — सदा सुख की वास॥
तज्यो देसरु वेस हू, तजि तज्यो राणा वास।
दास मीरा सरण आई, थाने अब सब लाज॥
🌿 वह प्रभु से निहोरा करती हुई कहतीं —
“तुम्हारा विरद मुझे प्रिय लगा; इसीलिए सब मेरे वैरी हो गए। अब यदि तुम सुधि न लो, न निभाओ — तो मुझे कहीं कोई सहारा नहीं।”
मीरा ने अपने वे सुंदर, घने केश — जिनमें कहीं-कहीं सफेदी झलक उठी थी — मुँडवा लिए। भगवा-वेश धारण कर, हाथ में इकतारा लेकर वे करुणा और भक्तवत्सलता के पद गाने लगीं।
मीरा के भावों में प्रायः विरह-रस ही मुखर होता — एक ऐसी विरहिणी की दशा, जो ठाकुर के दर्शन-सुख हेतु कब से वन-वन डोल रही है; जो द्वारिकाधीश की एक झलक, एक संदेश के लिए तरस रही है।
गोमती के किनारे, झरती आँखों से, वे घंटों लहरों से अपने प्रियतम का संदेश पूछती हुई कहतीं —
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कोई... कहियो री, हरि आवन की सीतू,
आवन की, मनभावन की...।।
।। मीरा चरित – चौंतीसवाँ अंक ।।
🌿 द्वारिका में मीरा घंटों सागर के तट पर खड़ी रहती। सागर की उत्ताल तरंगें उसे विभोर कर देतीं, किन्तु प्रिय-विरह उन्हें चैन न लेने देता। मीरा को वृन्दावन की उन रात्रियों का स्मरण हो आता, जब वह ललिता सखी के संग गोवर्धन गिरि के कुंजों, यमुना-पुलिन और वृन्दा-वीथियों में श्री श्यामसुन्दर की लीला-दर्शन करती हुई घूमती थी।
मीरा सोचती —
“वृन्दावन पहुँचकर तो लगता था, बस गन्तव्य आ गया। अब कहीं नहीं जाना, कुछ देखना-सुनना बाकी नहीं रहा। किन्तु धणी — यानी मालिक — का कौन मालिक? अब ये द्वारिकाधीश कहाँ परदेस जा बसे कि प्राणों की पुकार सुनते ही नहीं? मेरे हृदय का क्रन्दन उन्हें क्यों सुनाई नहीं देता?
हाय! यह मेरे प्राण इस पिण्ड (शरीर) में क्यों अटके हुए हैं? न तो प्रभु स्वयं दर्शन देते हैं और न ही कोई संदेश भिजवाते हैं। क्यों न मैं कटारी लेकर स्वयं को समाप्त कर लूँ? बस एक बार आपके दर्शन की लालसा ने ही मेरे प्राण बाँध रखे हैं...!”
🌿 मीरा की व्याकुलता दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जाती थी, और उसे शांत करने का एक ही उपाय था — सत्संग। संतों के दर्शन कर उनमें मानो नये प्राणों का संचार हो जाता था। वे स्वयं कहतीं —
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श्याम बिन दुख पावाँ, सजनी — कौन म्हाँने धीर बँधावे?
.........................................
साध-संगत में भूल न जावे, मूरख जनम गमावे।
मीरा तो प्रभु थाँरी सरणाँ, जीव परम पद पावे॥
🌿 कभी-कभी तो मीरा श्रीकृष्ण के विरह में यूँ अचेत हो जातीं, मानो देह में प्राण ही न हों। दासियाँ रो उठतीं, किन्तु मंगला धीर धरकर कीर्तन करने को कहती। उनके संकीर्तन से वे सचेत तो हो जातीं, पर उनकी पीड़ा देख सब पछताने लगते — कि जब तक वह अचेत थीं, पीड़ा भी शांत थी। शायद मूर्छा में प्रभु-दर्शन का सुख पा रही हों!
सचेत होने पर वे कभी नील-वर्ण सागर को अपना प्रियतम जानकर मिलने के लिए दौड़ पड़तीं, और कभी गगन के नीले रंगों में घनश्याम को पकड़ने दोनों हाथ उठाकर रो पड़तीं।
दिन तो जैसे-तैसे साधु-संग, भजन-कीर्तन में निकल जाता; किन्तु रात तो बैरिन बनकर आती। मंगला बारम्बार समझाती —
“बाईसा हुकम! द्वारिकाधीश पधारते ही होंगे। वे आपसे कैसे दूर रह सकते हैं? आप थोड़ा धीरज धारण करें!”
🌿 मीरा प्रभु के विरह में उस मीन की तरह तड़पती, जिसे जल से बाहर निकाल दिया गया हो। वे कहतीं —
“मंगला! अब मैं उनके बिना कैसे रहूँ? मेरा पल-पल युग के समान बीत रहा है। क्या उन्हें मेरी इस पीड़ा का अहसास भी है?
मिलकर बिछुड़ना तो उनका खेल है; पर मैं क्या करूँ? मैं चाहती तो हूँ कि वे जैसे, जिस हाल में मुझे रखें, उनकी प्रसन्नता में प्रसन्न रहूँ; किन्तु... यह देह... देह ही तो बाधा है! पापी प्राण इतना कष्ट पाते हैं, पर देह का मोह छोड़कर निकलते क्यों नहीं?”
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तुमरे कारण सब सुख छोड़या,
अब मोहि क्यूँ तरसावौ हौ।
विरह व्यथा लागी उर अन्तर,
सो तुम आय बुझावौ हौ॥
🌿
अब छोड़त नहीं बनै प्रभुजी,
हँसकर तुरत बुलावौ जी।
मीरा दासी जनम-जनम की,
अंग से अंग लगावौ जी॥
🙏जय मीरा। जय गिरधर।🙏
।।मीरा कांजीपैंतीसवाँ अंक।।
शीर्षक: भक्ति के आगे अहंकार का विसर्जन
मेवाड़ के राजमहलों का सुख, कुल की मर्यादा और राणा सांगा के पुत्रवधू होने का अभिमान—सब कुछ पीछे छोड़कर, दुखों के पहाड़ और अपनों के अत्याचार सहकर Mirabai अंततः अपनी अंतिम शरण, Vrindavan आ पहुँचीं। उनके पैरों में छाले थे, लेकिन हृदय में Krishna से मिलने की प्यास थी।
उस समय वृन्दावन में वैष्णव-सम्प्रदाय के प्रधान और प्रकांड विद्वान Jiva Goswami का बड़ा मान था। मीरा के मन में संतों के प्रति अगाध श्रद्धा थी, इसलिए वे गोस्वामी जी के दर्शन की अभिलाषा लेकर उनके आश्रम पहुँचीं।
परन्तु वहाँ पहुँचते ही उन्हें द्वार पर रोक दिया गया।
शिष्य ने भीतर जाकर संदेश दिया,
“गुरुदेव, मेवाड़ की रानी मीराबाई आपके दर्शन चाहती हैं।”
जीव गोस्वामी ने कठोरता से उत्तर भिजवाया,
“मीरा से कहो कि मैं किसी ‘स्त्री’ से नहीं मिलता। यह मेरे नियमों के विरुद्ध है; वे लौट जाएँ।”
यह सुनकर मीरा के होठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान तैर गई। उन्होंने शिष्य से कहा,
“जाकर अपने गुरुदेव से कहो—मैं तो सोचती थी कि वृन्दावन में केवल एक ही ‘पुरुष’ है, और वे हैं मेरे गिरिधर गोपाल!
बाकी सब तो गोपियाँ (सखियाँ) हैं। मुझे आज ज्ञात हुआ कि श्रीकृष्ण के अलावा यहाँ कोई और भी पुरुष रहता है, जो स्वयं को पुरुष मानता है!”
यह संदेश नहीं, एक व्यंग्य था उस ‘पुरुष-अहंकार’ पर, जो भक्ति के मार्ग में बाधा था।
अगली सुबह जो हुआ, उसने वृन्दावन को हिला कर रख दिया।
ब्रह्ममुहूर्त में जब जीव गोस्वामी जी ने Banke Bihari के मंदिर के पट खोले, तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उनके हाथ से आरती की थाली छूटते-छूटते बची।
सामने सिंहासन पर पीताम्बरधारी कृष्ण नहीं थे!
वहाँ खड़ी थी एक नवयौवना सखी।
भगवान की मूर्ति ने घाघरा-चोली धारण कर रखी थी—कानों में झुमके, नाक में नथनी, माथे पर बिंदी, पैरों में रुनझुन करती पायल और हाथों में हरी चूड़ियाँ।
त्रिभुवन के स्वामी आज ‘स्त्री-वेश’ में मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे।
जीव गोस्वामी का कंठ सूख गया। उन्होंने सेवक से घबराकर पूछा,
“यह किसका दुस्साहस है? मेरे बाद मंदिर में कौन आया था?”
पुजारी और सेवक थर-थर काँपने लगे—
“महाराज, कसम ठाकुर जी की! पट आपने बंद किए थे और आपने ही खोले हैं। यहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता।”
तभी एक वृद्ध सेवक ने डरते हुए कहा,
“गुसाईं जी… क्षमा करें, पर कल जिस महिला (मीरा) को आपने ‘स्त्री’ जानकर लौटा दिया था… लोग कहते हैं उनके एकतारे में जादू है। जब वे गाती हैं, तो पत्थर भी पिघल जाते हैं। कहीं यह ठाकुर जी का आपको कोई संकेत तो नहीं? कहीं आपने साक्षात भक्ति को ही द्वार से नहीं लौटा दिया?”
क्षण भर में जीव गोस्वामी का सारा ज्ञान, सारा अहंकार उस शृंगारित मूर्ति के चरणों में बिखर गया। उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ—भक्ति में कोई स्त्री या पुरुष नहीं होता; वहाँ सब केवल ‘आत्मा’ हैं और परमात्मा एक ही है।
वे नंगे पाँव दौड़े।
धर्मशाला में जाकर देखा—मीरा अपनी मस्ती में मग्न थीं। जीव गोस्वामी, जो किसी के आगे नहीं झुकते थे, आज मीरा के चरणों में दंडवत गिर पड़े।
रुँधे गले से बोले,
“हे देवी! मुझ अज्ञानी को क्षमा कर दें। मैंने देह को देखा, आपने आत्मा को। आज आपने मुझे सिखा दिया कि वृन्दावन में ‘पुरुष’ होने का अहंकार व्यर्थ है।”
मीरा मुस्कुराईं और बोलीं,
“चलिए, मेरे गिरिधर गोपाल राह देख रहे होंगे।”
जब वे दोनों वापस मंदिर पहुँचे, तो एक और चमत्कार उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। भगवान फिर से अपने पीताम्बरधारी रूप में विराजमान थे।
लेकिन उस दिन जीव गोस्वामी की दृष्टि बदल गई थी।
उन्हें कभी मीरा में कृष्ण दिखाई देते, तो कभी कृष्ण में मीरा।
भक्त और भगवान—दो नहीं, एकाकार हो चुके थे।
“मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरा न कोई…” 💗
|| श्री कुंज बिहारी श्री हरिदास || 🌸💐👏🥀
।।मीरा चरित - अंतिम अंक।।
🌿 मीरा ने पाँच -छः दिन तक कोई भी ठोस उत्तर राजपुरोहित जी को नहीं दिया।
क्यों कि मीराबाई के मायके से और ससुराल से दोनों तरफ से उसे लेने के लिए आए थे।
उसे कभी भी वापस चित्तौड़ लौटकर जाना ही नहीं था - वह तो ऐसे ही कुछ दिन और बिता रही थी। पर राजपुरोहित जी को जब कोई अनुकूल उत्तर नहीं मिला तो उन्होंने अनशन करने का निश्चय कर लिया ।राठौड़ों के पुरोहित जी भी उनके समीप साथ देने बैठ गये।
अनशन की बात सुनकर मीरा ने कई प्रकार से उन्हें समझाने का यत्न किया, पर उन्होंने खाली हाथ लौटने की अपेक्षा मरना श्रेयस्कर समझा। दो दिन और निकल गये। ब्राह्मणों को यूँ भूखे मरते देख वह व्याकुल हो उठी। अंत में मीरा ने उन्हें आश्वासन दिया - " मैं प्रभु से पूछ लूँ। वे आज्ञा दे देंगें तो मैं आपके साथ चलूँगी।"
🌿 उस समय द्वारिकाधीश की मंगला आरती हो चुकी थी और पुजारी जी द्वार के पास खड़े थे। दर्शनार्थी दर्शन करते हुये आ जा रहे थे। राणावतों और मेड़तियों के साथ मीरा मंदिर के परिसर में पहुँची। मीरा ने प्रभु को प्रणाम किया। पुजारी जी मीरा को पहचानते थे और उन्हें यह विदित था कि इन्हें लिवाने के लिए मेवाड़ के बड़े बड़े सामन्तों सहित राजपुरोहित आये हैं। चरणामृत और तुलसी देते हुये उन्होंने पूछा - " क्या निश्चित किया? क्या जाने का निश्चय कर लिया है? आपके बिना द्वारिका सूनी हो जायेगी।"
"हाँ जी महाराज! वही निश्चित नहीं कर पा रही!! अगर आप आज्ञा दें तो भीतर जाकर प्रभु से ही पूछ लूँ!!!"
"हाँ हाँ !! पधारो बा!! बा, गुजराती में मां को कहते हैं, आपके लिए मन्दिर के भीतर जाने में कोई भी बाधा नहीं !!!" पुजारी जी ने अतिशय सम्मान से कहा।
🌿पुजारी जी की आज्ञा ले मीरा मन्दिर के गर्भगृह में गई। हृदय से प्रभु को प्रणाम कर मीरा इकतारा हाथ में ले वह गाने लगी........
🌿 मीरा को प्रभु .........
साँची दासी बनाओ......... ।🌿
🌿अंतिम पंक्ति गाने से पूर्व मीरा ने इकतारा मंगला के हाथ में थमाया और गाती हुईं धीमें पदों से गर्भगृह के भीतर वह ठाकुर जी के समक्ष जा खड़ी हुईं। वह एकटक द्वारिकाधीश को निहारती बार बार गा रही थीं - " मिल कर बिछुरन मत कीजे ।" एकाएक मीरा ने देखा कि उसके समक्ष विग्रह नहीं बल्कि स्वयं द्वारिकाधीश वर के वेश में खड़े मुस्कुरा रहे हैं। (बोलिये अनंत कोटि बृह्मांड नायक श्रीद्वारकाधीश भगवान की जय 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺)
मीरा अपने प्राणप्रियतम के चरण स्पर्श के लिए जैसे ही झुकी, दुष्टों का नाश, भक्तों को दुलार, शरणागतों को अभय और ब्रह्माण्ड का पालन करने वाली सशक्त भुजाओं ने आर्त विह्वल और शरण माँगती हुई अपनी प्रिया को बन्धन में समेट लिया। क्षण मात्र के लिए एक अभूतपूर्व प्रकाश प्रकट हुआ, मानों सूर्य - चन्द्र एक साथ अपने पूरे तेज के साथ उदित होकर अस्त हो गये हों। इसी प्रकाश में प्रेम दीवानी मीरा समा गई। 😔उसी समय मंदिर के सारे घंटे - घड़ियाल और शंख स्वयं ज़ोर ज़ोर से एक साथ बज उठे। कई क्षण तक वहाँ पर खड़े लोगों की समझ में नहीं आया कि क्या हुआ?
🌿 एकाएक चमेली "बाईसा हुकम " पुकारती मंदिर के गर्भगृह की ओर दौड़ी। पुजारी जी ने सचेत होकर हाथ के संकेत से उसे रोका और स्वयं गर्भगृह में गये। उनकी दृष्टि चारों ओर मीरा को ढूँढ रही थी। अचानक प्रभु के पार्श्व में लटकता भगवा - वस्त्र खंड दिखाई दिया। वह मीरा की ओढ़नी का छोर था। लपक कर उन्होंने उसे हाथ में लिया। पर मीरा कहीं भी मन्दिर में दिखाई नहीं दी।निराशा के भाव से भावित हुए पुजारी ने गर्भगृह से बाहर आकर न करते हुए सिर हिला दिया। उनका संकेत समझ सब हतोत्साहित एवं निराश हो गये।
🌿 " यह कैसे सम्भव है? अभी तो हमारे सामने उन्होंने गाते हुये गर्भगृह में प्रवेश किया है। भीतर नहीं हैं तो फिर कहाँ है? हम मेवाड़ जाकर क्या उत्तर देंगे।" - वीर सामन्त बोल उठे।
"मैं भी तो आपके साथ ही बाहर था।मैं कैसे बताऊँ कि वह कहाँ गई? स्थिति से तो यही स्पष्ट है कि मीरा बाई प्रभु में समा गई, उनके विग्रह में लीन हो गई।" पुजारी जी ने उत्तर दिया।
🌿 पर चित्तौड़ और मेड़ता के वीरों ने पुजारी जी की आज्ञा ले स्वयं गर्भगृह के भीतर प्रवेश किया। दोनों पुरोहितों ने मूर्ति के चारों ओर घूम कर मीरा को ढूँढने का प्रयास किया।सामन्तों ने दीवारों को ठोंका, फर्श को भी बजाकर देखा कि कहीं नीचे से नर्म तो नहीं!! अंत में जब निराश होकर बाहर निकलने लगे तो पुजारी ने कहा,"आपको बा की ओढ़नी का पल्ला नहीं दिखता, अरे बा प्रभु में समा गई है।"
दोनों पुरोहितों ने पल्ले को अच्छी तरह से देखा और खींचा भी, पर वह तनिक भी खिसका नहीं, तब वह हताश हो बाहर आ गये।
🌿इस समय तक ढोल - नगारे बजने आरम्भ हो गये थे। पुजारी जी ने भुजा उठाकर जयघोष किया - "बोल, मीरा माँ की जय! श्रीद्वारिकाधीश की जय! भक्त और भगवान की जय!!!" लोगों ने जयघोष दोहराया।
🌿 तीनों दासियों का रूदन वेग मानों बाँध तोड़कर बह पड़ा हो। अपनी आँखें पौंछते हुये दोनों पुरोहित उन्हें सांत्वना दे रहे थे। इस प्रकार मेड़ता और चित्तौड़ की मूर्तिमंत गरिमा अपने अराध्य में जा समायी।
🌿 नृत्यत नुपूर बाँधि के गावत ले करतार,
देखत ही हरि में मिली तृण सम गनि संसार॥
मीरा को निज लीन किय नागर नन्दकिशोर,
जग प्रतीत हित नाथ मुख रह्यो चुनरी छोर॥
🌾॥श्री राधारमणाय समर्पणं ॥🌾
जय मीरा जय गोपाल🌺🌺
आप सभी का बहुत बहुत आभार, मैंने छोटा सा प्रयास किया है। और! यह कोई नया नहीं है जैसे वाल्मीकि रामायण महाकाव्य है, और उससे प्रेरित होकर बहुत सारे लोगों ने लिखी,
एक छोटा सा प्रयास मैंने भी किया है बस और कुछ नही।
जैसे तुलसी बाबाजी कहते हैं, स्वातंसुखाय, के लिए ही लिखा।
भक्तिमार्ग में मेरी प्रिय पात्र मीराबाई है। उनके लिए लिखना गाना, सुनना सब अच्छा लगता है। आप लोगों ने बहुत प्रेम से पढ़ा है बहुत बहुत आभार व्यक्त करती हूँ।
जय श्री कृष्ण, जय मीरा मां।🙏🌹🙏🌹
मीरा चरित
https://youtube.com/shorts/vfw9x1-SPBc?si=7rSTSblDT1WyFhBj
रचनाकार





































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