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डॉ. रोशनलाल छोकर का आत्मकथ्य

भूमिका

समाज में नेतृत्व की बहुत अहम भूमिका है और इस भूमिका को निभाने वाले ही समाज की दिशा और दशा का निर्धारण करके समाज को बनाने का काम करते हैं। आगे दिया गया विवरण श्री रोशनलाल छोकर जी के भावों का स्पष्ट आईना है।

आत्मकथ्य

नेतृत्व का वास्तविक अर्थ कार्य से पहचान या फिर प्रचार से नहीं

डॉ. रोशनलाल छोकर

नेतृत्व शब्द सुनने में जितना सरल लगता है, उसका वास्तविक अर्थ उतना ही गहरा और जिम्मेदारी से भरा हुआ है। मेरे विचार में सच्चा नेतृत्व वही है जो समाज को सही दिशा दे, लोगों की समस्याओं को समझे और उनके समाधान के लिए स्वयं आगे बढ़कर कार्य करे। नेतृत्व केवल बोलने या दिखने का नाम नहीं, बल्कि करने का नाम है।

पहले समय में नेतृत्व का अर्थ कर्तव्य, सेवा और जिम्मेदारी से जुड़ा हुआ था। आज दुर्भाग्यवश कई जगह नेतृत्व को प्रचार, दिखावे और मंचीय उपस्थिति तक सीमित कर दिया गया है। यह स्थिति समाज के लिए चिंताजनक है और हमें आत्मचिंतन के लिए विवश करती है।


सच्चा नेतृत्व

शब्दों से नहीं, कर्मों से

मैंने अपने सामाजिक अनुभवों में देखा है कि कुछ लोग मंचों पर बड़े-बड़े भाषण देते हैं, लेकिन ज़मीनी कार्यों से उनका कोई वास्तविक जुड़ाव नहीं होता। ऐसे नेतृत्व से समाज को न दिशा मिलती है, न समाधान।

सच्चा नेता यह नहीं सोचता कि लोग उसके बारे में क्या कहेंगे, वह यह सोचता है कि वह समाज के लिए क्या कर सकता है।

वह प्रचार की चकाचौंध में नहीं रहता, बल्कि लोगों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को सुनता है, उन्हें समझता है और समाधान खोजने का प्रयास करता है।

हमारे समाज के असली नायक

मैं गर्व के साथ कहना चाहता हूँ कि हमारे गुर्जर समाज में आज भी अनेक ऐसे लोग हैं जो बिना किसी प्रचार के समाज की सेवा कर रहे हैं।

कोई बच्चों को पढ़ा रहा है,

कोई युवाओं को रोजगार से जोड़ रहा है,

कोई करियर मार्गदर्शन दे रहा है,

तो कोई सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जागरूकता फैला रहा है।

ये सभी लोग बिना किसी फोटोशूट, बैनर या सम्मान समारोह के समाज के लिए कार्य कर रहे हैं। मेरे लिए यही लोग समाज के वास्तविक नेता और नायक हैं।

दुर्भाग्य से कई बार ऐसा होता है कि काम करने वाले लोग पीछे रह जाते हैं और केवल बोलने वाले लोग आगे दिखाई देने लगते हैं। यह प्रवृत्ति समाज को कमजोर करती है और सच्चे कर्मयोगियों का मनोबल तोड़ती है।

नेतृत्व पद नहीं, जिम्मेदारी है

मेरे मत में किसी का अध्यक्ष, सचिव या संयोजक बन जाना ही नेतृत्व नहीं है।

नेतृत्व तब सार्थक होता है जब—

* समाज की समस्याओं का समाधान हो,

* कार्य में निष्पक्षता और ईमानदारी हो,

* निर्णयों में पारदर्शिता हो,

* और समाज पर सकारात्मक प्रभाव दिखाई दे।

यदि कोई व्यक्ति केवल पद पर बैठा है और समाज के लिए कोई ठोस कार्य नहीं कर रहा, तो वह नेतृत्व नहीं, बल्कि पद का दुरुपयोग है।

नेतृत्व के तीन आधार

किसी भी समाज को आगे बढ़ाने के लिए नेतृत्व में तीन बातें अनिवार्य हैं—

1. पारदर्शिता

2. जवाबदेही

3. परिणाम

नेता कम बोले, यह कोई समस्या नहीं है, लेकिन उसका कार्य ऐसा होना चाहिए कि समाज स्वयं उसे पहचान ले।

युवाओं से मेरी अपेक्षा

आज का युवा समाज का भविष्य है। यदि युवा भी केवल प्रचार, दिखावे और सोशल मीडिया की चमक में उलझ गए, तो समाज मजबूत नहीं हो पाएगा।

उन्हें यह समझना होगा कि—

* असली नेतृत्व पोस्ट से नहीं,

* असली सफलता भाषणों से नहीं,

* और असली पहचान प्रचार से नहीं बनती।

असली नेतृत्व समाज में वास्तविक परिवर्तन लाने से बनता है।

समाज का उत्थान नारों और भीड़ से नहीं होता, वह होता है सच्चे कर्मयोगी नेताओं से, उनकी ईमानदारी से और समाज के प्रति उनके समर्पण से।

जो नेता कार्य से पहचान बनाता है, वही समाज को सही दिशा देता है। और! जो नेता केवल प्रचार से चमकता है, वह समाज को भ्रमित करता है।

आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि हम काम करने वाले नेतृत्व को आगे लाएँ और केवल बोलने वाले नेतृत्व से दूरी बनाएँ।

क्योंकि कर्म ही नेतृत्व की सच्ची भाषा है और वही समाज की वास्तविक शक्ति भी है।

सूचना स्रोत


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