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आत्मकथ्य : डॉ. अशोक कुमार चौधरी

आत्मकथ्य : डॉ. अशोक कुमार चौधरी

जब मैंने हमारे पूर्वज और हमारे जीवन मूल्य का सृजन आरंभ किया था, तब मन में केवल एक ही भाव था—कि हमारे समाज की जड़ें, हमारे संस्कार और हमारे पूर्वजों का जीवन-दर्शन वर्तमान पीढ़ी तक ससम्मान पहुँचे। आज जब यह कृति समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संवाद का माध्यम बन रही है, तो यह मेरे लिए केवल लेखक होने का नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व निभाने का क्षण है।

मेरठ–मवाना संसदीय क्षेत्र से निवर्तमान सांसद रहे आदरणीय श्री हरीशपाल जी से उनके आवास पर हुई शिष्टाचार भेंट मेरे लिए स्मरणीय रही। उस सौहार्दपूर्ण वातावरण में समाज, संस्कृति और मूल्यों पर हुआ संवाद इस विश्वास को और दृढ़ कर गया कि विचार यदि ईमानदार हों, तो वे सीमाओं से परे जाकर स्वीकार किए जाते हैं। आदरणीय श्री हरीशपाल जी एवं उनके सुपुत्र श्री नीरजपाल को पुस्तक भेंट करते समय जो अपनत्व और संवेदनशील प्रतिक्रिया मिली, वह मेरे लेखन की सार्थकता का मौन प्रमाण थी।

इसी क्रम में संघ की बैठक के दौरान क्षेत्रीय संघ चालक श्री सूर्यप्रकाश टांक जी तथा जाट समाज के विद्वान एवं समाजचिंतक श्री अशोक बालियान जी को पुस्तक भेंट करने का अवसर भी मेरे लिए विशेष रहा। विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों के विद्वानजनों द्वारा पुस्तक के भाव को आत्मसात किया जाना इस बात का संकेत है कि मूल्य, परंपरा और संस्कार किसी एक समाज तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे समूचे राष्ट्र की साझा विरासत हैं।

इन दोनों अवसरों ने मुझे यह अनुभूति कराई कि यह पुस्तक केवल मेरी नहीं रही, बल्कि समाज की धरोहर बनने की दिशा में अग्रसर है। इस यात्रा में जिन सहयोगियों ने मेरा साथ दिया—श्री ब्रह्मपाल लखवाया जी, ‘उलझन सुलझन’ के प्रतिनिधि, तथा वे सभी शुभचिंतक जिन्होंने इस प्रयास को ऊर्जा दी—उन सभी के प्रति मैं हृदय से कृतज्ञ हूँ।

मैं विश्वास करता हूँ कि हमारे पूर्वज और हमारे जीवन मूल्य आने वाली पीढ़ियों को आत्मचिंतन, सामाजिक समरसता और नैतिक दृढ़ता की ओर प्रेरित करेगी। यदि यह पुस्तक किसी एक मन को भी अपनी जड़ों से जोड़ पाने में सफल होती है, तो मैं अपने लेखन को धन्य समझूँगा।

झलकियाँ 






सूचना स्रोत

डॉ अशोक कुमार चौधरी

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 




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