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श्रद्धा, साहित्य और सहज जीवन की कहानी है प्रमिला जी से संवाद

एक सजीव साक्षात्कार 

श्रद्धा, साहित्य और सहज जीवन की कहानी है प्रमिला जी से संवाद

प्रश्न: प्रमिला जी, सबसे पहले आप अपने बारे में थोड़ा परिचय दीजिए।

उत्तर: "मैं हैदराबाद की रहने वाली हूँ और मारवाड़ी समाज से संबंध रखती हूँ। मूल रूप से राजस्थान के सोजत गाँव की हूँ, जो अपनी विश्वप्रसिद्ध मेहंदी के लिए जाना जाता है। मेरा बचपन, पढ़ाई-लिखाई और जीवन का बड़ा हिस्सा हैदराबाद में ही बीता है।"

प्रश्न: आपका पारिवारिक जीवन कैसा रहा?

उत्तर: "नागपुर में ससुराल था। मेरे दो बच्चे हैं—एक बेटा और एक बेटी। बच्चों के काम हैदराबाद में होने के कारण हम यहीं सेटल हो गए। अब दोनों बच्चों की शादी हो चुकी है—बेटी बेंगलुरु में है और बेटा मुंबई में। एक छोटा-सा, खुशहाल परिवार है, जिसमें संतोष और अपनापन सबसे बड़ी पूँजी है।"

प्रश्न: आपकी शिक्षा और साहित्यिक रुचि के बारे में बताइए।

उत्तर: "मैंने स्नातक तक शिक्षा प्राप्त की, उसके बाद हिन्दी में विशारद, भूषण और विद्वान किया। साहित्य रत्न करना चाहती थी, लेकिन शादी के कारण वह अधूरा रह गया। पढ़ने का शौक बचपन से रहा है और थोड़ा-बहुत लिख भी लेती हूँ। साझा संकलनों में मेरी रचनाएँ तीन पुस्तकों में प्रकाशित हुई हैं।"

प्रश्न: आप रचनाएँ पढ़ते समय किस बात को सबसे ज़रूरी मानती हैं?

उत्तर: "मैं पहले पूरी रचना पढ़ती हूँ, समझती हूँ और फिर प्रतिक्रिया देती हूँ। मुझे लगता है कि यही किसी रचना और रचनाकार के प्रति सच्चा सम्मान है।"

प्रश्न: घरेलू जीवन और आपके शौक—इनके बीच संतुलन कैसे बनता है?

उत्तर: "मैं एक घरेलू महिला हूँ। खाना बनाना, नई-नई डिशेज़ आज़माना मुझे बहुत अच्छा लगता है। साथ ही प्रकृति से गहरा लगाव है—खूबसूरत नज़ारे देखना, अपनी ही दुनिया में मस्त रहना… यही मेरी ऊर्जा का स्रोत है।"

प्रश्न: साहित्यिक मंच “उलझन सुलझन” से आपका जुड़ाव कैसे हुआ?

उत्तर: "इस मंच से मुझे बहुत अपनापन मिला। कल्पना जी ने जो स्नेह और बहनों जैसा प्यार दिया, उसी प्रीत में खिंचे चले आए। यहाँ एक परिवार जैसा माहौल है—जहाँ लिखने पर स्नेह मिलता है, समझ मिलती है और संवाद का अवसर मिलता है।"

प्रश्न: मीराबाई पर आपकी लेख-श्रृंखला पाठकों को बहुत पसंद आई। इसकी शुरुआत कैसे हुई?

उत्तर: "सच कहूँ तो शुरुआत में मन में संशय था—पता नहीं कोई पढ़ेगा भी या नहीं, पसंद आएगा या नहीं। मीराबाई की कथा तो सब जानते हैं। लेकिन मीरा की भक्ति, उनका माधुर्य रस, उनका साहस—ये सब मुझे हमेशा अपनी ओर खींचते रहे।"

प्रश्न: मीरा से आपका लगाव कब से है?

उत्तर: "सातवीं कक्षा से। तभी से मैंने मीराबाई के भजन और पद इकट्ठा करने शुरू किए। आज मेरे पास सत्तर-अस्सी भजन और लगभग 130 पद हैं—कुछ हिन्दी में, कुछ मारवाड़ी भाषा में।"

प्रश्न: इस भक्ति संस्कार की नींव कहाँ पड़ी?

उत्तर: "मेरे दादाजी और दादी से। दादाजी की आँखों से पानी गिरता था, वे पढ़ नहीं पाते थे, इसलिए मैं उन्हें रोज़ दो घंटे भागवत और फिर सोते समय पाँच भजन पढ़कर सुनाती थी। यह हमारा दैनिक नियम था। उन्हीं दिनों प्रश्न उठते थे—कृष्ण की इतनी रानियाँ, पर मीरा का नाम क्यों नहीं? तब दादाजी समझाते कि कृष्ण द्वापर के हैं और मीरा कलयुग की।"

प्रश्न: इस उत्तर का आप पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर: "बहुत गहरा। यह सोचकर आश्चर्य होता था कि जिसे मीरा ने देखा भी नहीं, उससे इतना प्रेम कैसे? तभी लगा कि मीरा तो हमारे ही समय की हैं—कलयुग की, हमारी जैसी, मेवाड़ी। यही अपनापन उन्हें मेरे और करीब ले आया।"

प्रश्न: मीरा की भक्ति को आप कैसे देखती हैं?

उत्तर: "जब भक्ति घर-घर पहुँची, पद गाए जाने लगे, तो मानो भक्ति की लहर चल पड़ी। मेरे भाव से कहूँ तो—जहाँ संतों को सताया गया, वहाँ शांति चली गई; और जहाँ भक्ति आई, वहाँ हरियाली आई। राजस्थान का हरा-भरा होना मुझे उसी भक्ति का प्रतीक लगता है।"

प्रश्न: आपकी मीराबाई श्रृंखला अब अंतिम चरण में है—कुछ कहना चाहेंगी?

उत्तर: "कल मेरा आख़िरी लेख होगा। यह मेरे लिए भावनात्मक क्षण है। मीरा की जीवनी लिखना केवल लेखन नहीं था, वह मेरे जीवन का एक संवाद था—श्रद्धा, स्मृति और आत्मिक संतोष का।"

प्रश्न: अंत में, सामान्य पाठकों के लिए आपका संदेश?

उत्तर "साहित्य हमें जोड़ता है, समझना सिखाता है और भीतर शांति देता है। अगर हम पढ़कर, लिखकर, एक-दूसरे को जानने की कोशिश करें, तो जीवन और समाज—दोनों अधिक सहज और सुंदर हो सकते हैं।"

यह संवाद न केवल प्रमिला जी का परिचय है, बल्कि एक साधारण जीवन में छिपी असाधारण संवेदनाओं और भक्ति की प्रेरक यात्रा भी है।

सृजक

श्रीमती प्रमिला त्रिवेदी

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 




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