उलझन
जब तक निरक्षर पर जीवन को गुनने की क्षमता रखने वाला समाज था तब तक तो मान लिया जाता था और इस कथन को बहुतायत से कहा भी जाता था कि
"एक ने कही और दूजे ने मानी तो दोनों ज्ञानी."
लेकिन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आज जब इस कथन का यदि साक्षर समाज बिल्कुल ही अनुसरण ना करने को कृतसंकल्पित है और शिक्षा के लक्ष्यों को नकारात्मकता के शिखर तक ले जाने पर आमादा है और इसी के मध्य ऐसे भी लोग हैं जो सकारात्मक हैं या नकारात्मक होते हुए भी उसमें सकारात्मकता को तलाशकर उसका अनुसरण कर लेते हैं तो प्रश्न यह खड़ा होता है कि "हम आज पहुँच कहाँ गए हैं?" और यह सब जो हो रहा है क्या उसमें कहीं भी शिक्षा के लक्ष्यों की पूर्ति करते, जीवन को गुनते या फिर किसी भी दृष्टि से नज़ीर बनते हम दिखते हैं?
सुलझन
अगर हम पुराने समय से वर्तमान समय की तुलना कर रहे हैं तो हमें याद रखना होगा कि हमारा देश शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। हमारे यहाँ अनेक विश्वविद्यालय थे। हमने गणित, खगोलशास्त्र, आयुर्वेद, योग आदि में महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल कर ली थीं। ऐसे में पुराने समय को निरक्षरों का युग बताते हुए वर्तमान समय की समस्याओं के लिए शिक्षित वर्ग को ज़िम्मेदार ठहराना ठीक नहीं है।

कई बार हम दो या अधिक घटनाएँ साथ होते देखते हैं तो हम उनमें संबंध खोजने लगते हैं। लेकिन कई बार यह महज संयोग होता है, उनका आपस में कोई संबंध नहीं होता। कुछ समय पहले की निरक्षरता और उस दौर की अच्छाइयों में भी ऐसा ही संयोग है, आपस में कोई स्थायी संबंध नहीं है। अगर हम मध्यकालीन भक्तिधारा देखें तो पाएँगे कि अशिक्षित कबीर और प्रकाण्ड पंडित तुलसीदास, दोनों महान भक्त हुए हैं और दोनों का हमारे समाज पर अब तक व्यापक प्रभाव है।
पहले अधिकांश लोग आखर ज्ञान से वंचित थे और अब लगभग सभी साक्षर हैं। लेकिन जो लोग वर्तमान में शिक्षा से वंचित हैं, वे भी वैसा व्यवहार नहीं कर रहे जैसा कुछ समय पहले के अशिक्षित लोग करते थे। अतः वर्तमान समाज में फैली नकारात्मकता का कारण शिक्षा में खोजना मेरी दृष्टि में उचित नहीं है।
हमारे देखते-देखते समाज में जो बदलाव आया है, उसका एक बड़ा कारण है- बाज़ार का प्रसार। पहले हर चीज़ की कीमत नहीं थी। शादी-ब्याह में, छोटे-बड़े काम में आस-पास के लोग, रिश्तेदार आदि आकर मदद कर लेते थे और काम हो जाता था। हर किसी को एक-दूसरे की ज़रूरत थी, इसलिए व्यक्ति सभी से व्यवहार बनाकर चलता था। सामंजस्य बनाए रखना अनिवार्यता थी। किसान अर्थव्यवस्था का आधार थे, लेकिन उन्हें भी बढ़ई, लुहार, हज्जाम, दर्जी आदि की ज़रूरत पड़ती थी। सभी के अपने गाँव और कार्यक्षेत्र निर्धारित थे। यह वह दौर नहीं था कि जेब में पैसा है तो आप कुछ भी हासिल कर लो। इसलिए, "एक ने कही और दूजे ने मानी तो दोनों ज्ञानी" वाली बात सही थी।
आधुनिकीकरण, विशेषकर 1991 से आरंभ हुए बाज़ारवाद के बाद शहरीकरण बढ़ा है, उपभोक्तावाद बढ़ा है और अंततः पैसों का प्रभाव बढ़ा है। पैसों के बल पर आप न केवल शादी में काम करने वाले जुटा सकते हैं बल्कि नकली बाराती और रिश्तेदार भी जुटा सकते हैं। अब अगर जेब में पैसा है तो दूसरों की बात मानना आपके लिए बाध्यता नहीं है। पैसों से न केवल विभिन्न सेवाएँ बल्कि मान्यता और प्रतिष्ठा भी खरीदी जा सकती है। पैसा कमाने के अवसर बढ़े हैं। कुछ समय पहले तक शिक्षा-प्रणाली से ही पैसे कमाने के मौके मिलते थे। जैसे- व्यक्ति इंजीनियर, डॉक्टर, बैंक मैनेजर आदि बनकर पैसा कमाता था, लेकिन अब लोग बगैर इतनी पढ़ाई किए, चाट का ठेला लगाकर, यूट्यूब पर वीडियो अपलोड करके भी इतनी कमाई कर पा रहे हैं। अतः वर्तमान रुझानों को शिक्षा-प्रणाली से जोड़ना मैं उचित नहीं समझता।
पहले ऐसी व्यवस्था थी कि परिवार पूरा एक काम में लगा होता था। कौन पैसा कमा रहा है, कौन नहीं, इस पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया जाता था। परिवार में एकाध सदस्य अगर नहीं कमाए तो भी उसका जीवन निकल जाता था, उसका बोझ इतना ज़्यादा नहीं होता था। अब एक व्यक्ति अगर नहीं कमाए तो उसका खर्च उठाना हर परिवार के बस की बात नहीं है। उसके खाने-पीने, कपड़े आदि का खर्च, बीमारी में अस्पताल का खर्च इतना अधिक होगा कि उसके सगे भाई भी पीछे हट जाएँगे। मुंबई जैसे महानगर में रहन-सहन इतना महंगा है कि पुरुष अपनी पत्नी का खर्च तक नहीं उठाना चाहता। अधिकांश पुरुष विवाह के लिए कामकाजी महिलाएँ खोजते हैं। व्यक्ति की कमाई सीमित है और उसे अपनी कमाई से बच्चों की स्कूल फीस, बीमारी के खर्चे, भविष्य में होने वाली शादियों के खर्चे, अपनी यात्राओं के व्यय, बीमा आदि कई खर्च निकालने हैं। व्यक्ति हर तरफ इतने हाथ-पाँव मार रहा है कि उसके पास दूसरों के लिए न पैसा है, न समय है और न दिमाग में इतना अवकाश कि वह किसी और की असहमतियों को अपने भीतर समाहित कर सके।
जीवन में बढ़ी आपा-धापी के अलावा सोशल मीडिया भी लोगों को ऐसा बना रहा है कि वे दूसरों की सुनने के लिए तैयार नहीं हैं। लोग घोर प्रतिक्रियावादी हो गए हैं। सोशल मीडिया से पहले जनसंचार के माध्यमों पर कुछ लोगों का नियंत्रण था। कोई भी बात संपादित होकर ही प्रसारित होती थी। अब सभी के हाथ में सोशल मीडिया का हथियार है। कुछ ही सेकंड में आपकी बात दुनिया भर में प्रसारित हो जाती है। आपने जो बात सोची है, उस पर थोड़ा विचार करेंगे तो कुछ नए पक्ष भी निकलेंगे और हो सकता है आप सामने वाले की बात से कुछ हद तक सहमत भी हो जाएँ। जब बात तत्काल प्रसारित हो रही है तो पुनर्विचार का अवसर ही नहीं आता। सोशल मीडिया पर सब लोग अपने-अपने खेमे बना लेते हैं और अपनी बात को ही सही ठहराते हैं, किसी और की सुनने के लिए तैयार ही नहीं होते। आप वर्चुअल दुनिया में होते हैं, व्यक्ति सामने नहीं दिखता तो लोग उम्र और अनुभव का लिहाज भूल जाते हैं और किसी से भी कटु शब्दों में वाद-विवाद कर लेते हैं।
प्रश्नकर्ता का यह प्रश्न वाजिब है कि "हम आज पहुँच कहाँ गए हैं?" जब ज़ोर से बैंड-बाजा या म्यूज़िक सिस्टम बज रहा हो और लोग उस धुन पर नाच रहे हों तो उन्हें आप चाहे जितनी अच्छी बात कहें, उन्हें सुनाई नहीं देगी। समझना तो और मुश्किल होगा। बाज़ारवाद का शोर ऐसा ही है। बाज़ारवाद व्यक्ति को ज़्यादा पैसा कमाने के लिए प्रेरित कर रहा है। अधिकांश लोग अपना जीवन ऐसे जी रहे हैं मानो पैसा कमाना ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। ऐसे में इस उलझन की सुलझन लोगों को स्वयं खोजनी होगी। बाहर की आवाज़ सुनाई न दे तो भीतर की आवाज़ सुननी होगी। एक विद्वान ने कहा है कि जीवन में जब समाधान न मिले तब कविताओं में समाधान खोजने की कोशिश करनी चाहिए। कुंवर नारायण की एक कविता साझा कर रहा हूं। शायद इसमें कोई समाधान छुपा हो :
असहमति को अवसर दो
सहिष्णुता को आचरण दो
कि बुद्धि सिर ऊंचा रख सके....
उसे हताश मत करो काइयां तर्कों से हरा-हराकर।
अविनय को स्थापित मत करो,
उपेक्षा से खिन्न न हो जाए कहीं
मनुष्य की साहसिकता।
अमूल्य थाती है यह सबकी
इसे स्वर्ग के लालच में छीन लेने का
किसी को अधिकार नहीं...
रचनाकार
यशवन्त
अहमदाबाद
प्रस्तुति

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