भूमिका
जीवन की गुत्थियाँ जटिल नहीं होतीं, बल्कि हम स्वयं उनको जटिल बना लेते हैं। अक्सर उलझन समस्या में नहीं, बल्कि उसके परिप्रेक्ष्य को समझने में होती है—कि जो कहा जा रहा है, वह किस संदर्भ में कहा जा रहा है। यही स्थिति आज समाज की परिपक्वता को लेकर भी है। हम स्वयं को समझदार और विकसित मानते हैं, पर अपने निर्णयों, व्यवहारों और सामाजिक प्रतिक्रियाओं के संदर्भ पर ठहरकर विचार नहीं करते। परिणामस्वरूप, परिपक्वता और बालसुलभ हठ के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। यह आलेख उसी धुंध को हटाने का प्रयास है—ताकि पाठक यह सोचने को विवश हो कि जिन प्रवृत्तियों को हम सहजता या मजबूरी मानकर स्वीकार कर लेते हैं, वे वास्तव में समझ से उपजी हैं या केवल हठ और आवेग का परिणाम।
परिपक्वता का भ्रम और बालसुलभ हठ का यथार्थ
कहा जाता है कि हर इंसान के भीतर एक बच्चा होता है। यह बात तब तक सुंदर लगती है, जब तक वही बालसुलभता जीवन में सहजता और संवेदना बनाए रखे। समस्या तब शुरू होती है, जब वही बच्चा हठ करने लगे और बिना समझे फैसले लेने लगे। आज का समाज स्वयं को परिपक्व मानता है, पर उसके अनेक निर्णय ऐसे लगते हैं मानो वे अधूरी समझ और तात्कालिक आवेग से लिए गए हों।
समाज में फैली उदासीनता को हम अक्सर थकान या मजबूरी कहकर टाल देते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि यह न समझने और न समझने की कोशिश न करने की आदत से पैदा होती है। सवाल पूछने से बचना, संवाद और विमर्श से दूरी बनाना, और हर जटिल विषय को यह कहकर छोड़ देना कि “यह हमारे बस का नहीं”—ये सब उसी बालसुलभ हठ के रूप हैं, जिसमें सुविधा को विवेक से ऊपर रख दिया जाता है।
आज निर्णय न ले पाने की समस्या केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रही, बल्कि सामाजिक स्वभाव बन गई है। युवाओं की इच्छा, उनकी तैयारी और मानसिक स्थिति को नजरअंदाज कर केवल परंपरा या दबाव में लिए गए फैसले क्या सच में परिपक्वता कहलाएँगे? या यह उस जिद का उदाहरण हैं, जो परिणामों की जिम्मेदारी उठाने से पहले ही पीछे हट जाती है?
मिलावट का बढ़ता चलन भी इसी अपरिपक्व सोच का संकेत है। आज शुद्धता को ढूँढना पड़ता है—चाहे वह भोजन में हो या विचारों में। तुरंत लाभ के लिए भविष्य के नुकसान को न देख पाना, गुणवत्ता के बजाय त्वरित मुनाफे को चुनना—यह व्यवहार किसी समझदार समाज का नहीं, बल्कि “अभी चाहिए” वाली मानसिकता का है।
सबसे गंभीर स्थिति तब होती है, जब कानून की आड़ में गलत को सही ठहराने की कोशिश की जाती है। जब कानून न्याय का माध्यम न रहकर शक्ति का साधन बन जाए, तो वह व्यवस्था नहीं, हठधर्मिता बन जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कई बार ऐसे फैसले दिखते हैं—जैसे अचानक और अत्यधिक टैरिफ लगाना। सवाल यह नहीं कि कौन ताकतवर है, सवाल यह है कि क्या ये फैसले सोच-समझ से लिए गए हैं या फिर आवेग में।
इन सभी उदाहरणों में एक बात समान है—साक्षरता की नहीं, बल्कि *सचेत साक्षरता* की कमी। अगर समाज ज्ञान को बोझ और समझ को अनावश्यक मानने लगे, तो क्या वह परिपक्व कहलाएगा? या यह भी उसी बालसुलभ हठ का रूप होगा, जिसमें सीखने से पहले ही सब जान लेने का भ्रम होता है?
परिपक्व समाज वह नहीं होता जो कभी गलती न करे, बल्कि वह होता है जो अपनी गलतियों को स्वीकार करे और उनसे सीखने का साहस रखे। जब तक हम अपने निर्णयों और व्यवहारों को इस कसौटी पर नहीं परखेंगे, तब तक हमारी साक्षरता सिर्फ एक आँकड़ा रहेगी और परिपक्वता—सिर्फ एक दिखावा।




टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें