आत्म-व्याख्यान
रोशनलाल छोकर
(एमिटी यूनिवर्सिटी)
नमस्कार,
मैं रोशनलाल छोकर, एक सहायक प्रोफेसर के रूप में आज शिक्षा व्यवस्था के उन पहलुओं पर अपना अनुभव और विचार साझा करना चाहता हूँ जो आज के समय में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। विशेषकर, मैं बात करना चाहता हूँ संवाद और समन्वय की आवश्यकता की।
आज हमारी शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ी समस्या यह है कि अभिभावक, छात्र और शिक्षक — इन तीनों के बीच सही संवाद और समन्वय नहीं है शिक्षा केवल परीक्षा और अंकों तक सीमित हो गई है, और नैतिकता, संस्कार और मानवीय मूल्यों की चर्चा लगभग न के बराबर रह गई है।
अभिभावकों की भूमिका पर मेरा दृष्टिकोण
आज के व्यस्त जीवन में माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद बहुत कम हो गया है। कितने अभिभावक अपने बच्चों के साथ रोज़ बैठकर उनकी समस्याएँ, मित्र मंडली या मानसिक दबाव पर चर्चा करते हैं? कितने माता-पिता बच्चों को केवल 'सफलता की दौड़' में नहीं, बल्कि उनका मार्गदर्शन और भावनात्मक सहारा बनने का प्रयास करते हैं?
यदि घर में संवाद कमजोर हो तो बच्चे अपने सवालों और जिज्ञासाओं के उत्तर कहीं और ढूँढने लगते हैं — और कई बार गलत दिशा में भटक जाते हैं। मैं हमेशा अभिभावकों से यही कहता हूँ कि बच्चों से खुलकर बात करें और उनकी दुनिया में शामिल हों।
शिक्षकों की जिम्मेदारी पर मेरा दृष्टिकोण
यदि अभिभावक पहले गुरु हैं, तो शिक्षक उनके दूसरे गुरु हैं। शिक्षक का काम केवल पाठ्यक्रम पूरा करना और परीक्षा लेना नहीं है। एक सच्चा शिक्षक अपने विद्यार्थियों को जीवन मूल्य, चरित्र और जिम्मेदारी सिखाता है।
आज कई जगह शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच संबंध केवल औपचारिक रह गए हैं। इसमें आत्मीयता और मार्गदर्शन की कमी है। मैं अपने विद्यार्थियों से हमेशा यह अपेक्षा रखता हूँ कि वे सिर्फ ज्ञान ही नहीं, जीवन मूल्यों की सीख भी सीखें।
विद्यार्थियों का दृष्टिकोण
विद्यार्थियों को भी समझना होगा कि शिक्षा केवल डिग्री या नौकरी का साधन नहीं है। यदि वे अनुशासन, परिश्रम और चरित्र के महत्व को समझें, तभी उनका शिक्षण जीवन सार्थक होगा।
अभिभावक, शिक्षक और विद्यार्थी — जब तक हम अपने-अपने कर्तव्य को ईमानदारी से नहीं निभाएँगे, शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य अधूरा रहेगा। समस्या केवल पढ़ाई की नहीं, बल्कि संवाद और समन्वय की कमी की है।
इसलिए मेरा संदेश यही है:
* अभिभावक बच्चों से रोज़ाना संवाद करें और उन्हें मार्गदर्शन दें।
* शिक्षक विद्यार्थियों के साथ आत्मीय संवाद बढ़ाएँ और उनके जीवन में सच्चे मार्गदर्शक बनें।
* विद्यार्थी शिक्षा को केवल डिग्री नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों के विकास का साधन मानें।
तभी हम एक स्वस्थ, शिक्षित और संस्कारित समाज की ओर बढ़ पाएँगे।
रचनाकार
सहायक प्रोफेसर रोशनलाल छोकर
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