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"जिज्ञासा और संकल्प उम्र या सीमाओं के मोहताज नहीं होते।"-इन्दु वैद्य

भूमिका

जीवन की यात्रा केवल समय के साथ आगे बढ़ने का नाम नहीं, बल्कि निरंतर सीखते रहने, स्वयं को गढ़ते रहने और परिस्थितियों से संवाद बनाते रहने की प्रक्रिया है। इन्दु वैद्य का जीवन इसी अंतर्संबंध का सजीव उदाहरण है—जहाँ शिक्षा, अनुभव, उत्साह और आत्मनिर्भरता एक-दूसरे से गुँथे हुए हैं। लखनऊ से अजमेर तक का उनका सफ़र, विवाह के बाद पुनः अध्ययन का संकल्प, बच्चों के साथ आत्मीय संवाद, सेवानिवृत्ति के बाद भी सक्रियता और लेखन की ओर बढ़ते कदम—ये सभी इस बात को रेखांकित करते हैं कि जिज्ञासा और संकल्प उम्र या सीमाओं के मोहताज नहीं होते। यह भूमिका उसी प्रेरक यात्रा की प्रस्तावना है, जो समाज को यह विश्वास दिलाती है कि जीवन के हर पड़ाव पर विकास, सृजन और सकारात्मक संबंध संभव हैं।


साक्षात्कार 

यह जीवन-वृत्त केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि सीखते रहने की जिद, आगे बढ़ते रहने का साहस और उम्र को चुनौती देने वाले आत्मविश्वास की मिसाल है। उसी भावभूमि पर आधारित यह साक्षात्कार प्रस्तुत है, जो समाज के हर वर्ग के लिए प्रेरक नज़ीर बन सकता है—

प्रश्न १. मैडम, आपका जन्म लखनऊ में हुआ और बारहवीं के बाद ही विवाह हो गया। उस समय क्या आपने अपनी पढ़ाई को लेकर कोई संकल्प मन में बनाया था?

उत्तर: "हाँ, बिल्कुल। विवाह के बाद परिस्थितियाँ बदल गई थीं, पर सीखने की जिज्ञासा कभी कम नहीं हुई। मन में यह संकल्प साफ था कि पढ़ाई रुकेगी नहीं। अजमेर आकर मैंने दोबारा पढ़ाई शुरू की और BA, MA तथा B.Ed. पूरी की। यह मेरे लिए आत्मनिर्भर बनने की दिशा में पहला कदम था।"

प्रश्न २. शादी के बाद पढ़ाई जारी रखना कई महिलाओं के लिए कठिन होता है। आपको आगे बढ़ने की ऊर्जा कहाँ से मिली?

उत्तर: "ऊर्जा भीतर की चाह से आती है। पढ़ना मेरे लिए केवल डिग्री नहीं, बल्कि आत्मविकास का माध्यम रहा है। जब इंसान अपने भीतर सीखने का दीपक जलाए रखता है, तो राह अपने आप बनती चली जाती है।"

प्रश्न ३. आप शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त हो चुकी हैं। बच्चों के साथ आपका अनुभव क्या सिखाता है?

उत्तर: "छोटे बच्चों को पढ़ाना और उनसे बातें करना मुझे हमेशा प्रिय रहा है। गाँव के परिवेश में रहकर मैंने बच्चों से यह सीखा कि अभावों में भी मुस्कुराकर जीना एक कला है। वे जीवन के सबसे बड़े शिक्षक हैं—सरल, सच्चे और संतुष्ट।"

प्रश्न ४. पैंसठ वर्ष की आयु में भी आपका पढ़ने का शौक बरकरार है। यह समाज को क्या संदेश देता है?

उत्तर: "उम्र केवल एक संख्या है। सीखने की कोई उम्र नहीं होती। जब तक जिज्ञासा जीवित है, तब तक व्यक्ति जीवंत है। यही संदेश मैं समाज को देना चाहती हूँ—रुकना नहीं है।"

प्रश्न ५. सेवानिवृत्ति के बाद आपने सीनियर सिटीजन ग्रुप से जुड़कर खेल प्रतियोगिताओं में भाग लिया। यह निर्णय कैसे लिया?

उत्तर: "मैं मानती हूँ कि शारीरिक सक्रियता आत्मविश्वास को नई उड़ान देती है। 200 और 400 मीटर दौड़ में द्वितीय स्थान प्राप्त करना मेरे लिए जीत से अधिक यह प्रमाण था कि संकल्प हो तो उम्र बाधा नहीं बनती।"

प्रश्न ६. लेखन की ओर आपका रुझान कैसे बढ़ा?

उत्तर: "अजमेर लेखिका मंच से जुड़ना मेरे लिए एक नया अध्याय था। मधु खंडेलवाल जी से पहली भेंट ने मुझे बहुत प्रेरित किया। उनके स्नेहिल व्यवहार और व्यक्तित्व ने मुझे लिखने का साहस दिया। अब मैं नए और ज्वलंत सामाजिक मुद्दों पर लिखने का प्रयास कर रही हूँ।"

प्रश्न ७. एक नई लेखिका के रूप में आप लेखन को कैसे देखती हैं?

उत्तर: "मेरे लिए लेखन आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम है। यह आत्मविश्वास और कौशल वृद्धि की प्रक्रिया है। मैं मानती हूँ कि सीखते-सीखते लिखा गया शब्द भी समाज में सकारात्मक संवाद पैदा कर सकता है।"

प्रश्न ८. आज की महिलाओं, विशेषकर गृहिणियों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए आपका क्या संदेश है?

उत्तर: "खुद पर विश्वास रखें। आत्मनिर्भर बनने का अर्थ केवल आर्थिक नहीं, मानसिक और बौद्धिक स्वतंत्रता भी है। जो सीखना चाहता है, उसके लिए दुनिया हमेशा खुली रहती है।"

प्रश्न ९. आपकी जीवन-यात्रा से समाज क्या सीख सकता है?

उत्तर: "यह कि उत्साह, जिज्ञासा और संकल्प मिल जाएँ, तो साधारण जीवन भी असाधारण बन जाता है। आगे बढ़ना किसी उम्र, परिस्थिति या भूमिका का मोहताज नहीं।"

प्रश्न १०. भविष्य को लेकर आपकी क्या आकांक्षाएँ हैं?

उत्तर: "सीखते रहना, लिखते रहना और समाज के लिए उपयोगी बने रहना—यही मेरी आकांक्षा है। यदि मेरे अनुभव किसी को प्रेरित कर सकें, तो इससे बड़ा संतोष कुछ नहीं।"

सीख

यह साक्षात्कार जीवन भर सीखते रहने, आत्मविश्वास से आगे बढ़ने और समाज के लिए प्रेरणा बनने की सजीव मिसाल है—एक ऐसी नज़ीर, जो हर उम्र और हर वर्ग को रास्ता दिखाती है।

सहयोग

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