"स्वास्थ्य केवल उपचार नहीं, एक स्वास्थ्य की रक्षा और रोगों से बचाव की जागरूक जीवन-दृष्टि है।"— डॉ. ओंकार मित्तल
भूमिका
स्वास्थ्य जीवन की मूल ऐष्णा है—वह साधन भी है और साध्य भी; इसलिए स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना ही किसी भी सभ्य समाज का मंतव्य और गंतव्य होना चाहिए। दुर्भाग्यवश, आज सरकार, चिकित्सक और समाज की संयुक्त निष्ठा रोग-निवारण तक सीमित होकर रह गई है, जबकि वास्तविक आवश्यकता रोग से बचाव यानी प्रिवेंशन को केंद्र में लाने की है। इसी सोच को व्यवहार में उतारने का सतत प्रयास डॉ. ओंकार मित्तल के जीवन-पथ की पहचान है। भारत सरकार के राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम एनीमिया मुक्त भारत के पूरक के रूप में परिकल्पित प्रोजेक्ट लालिमा के माध्यम से एनीमिया की पहचान, उसका वैज्ञानिक वर्गीकरण, सही खान-पान, आयरन-फॉलिक एसिड सप्लीमेंटेशन और लोक शिक्षण द्वारा सामाजिक जागरूकता—इन सबको जोड़कर उन्होंने स्वास्थ्य को जन-आंदोलन का स्वरूप देने का संकल्प लिया है। वृद्धावस्था की चुनौतियों पर प्रकाशित उनकी पुस्तकें और आगामी कृति “दीर्घायु की ऐष्णा – Quest for Longevity” दीर्घायु को केवल आयु नहीं, बल्कि जीवन-गुणवत्ता के रूप में देखने का स्वतंत्र चिंतन प्रस्तुत करती हैं। मानवतावादी और आध्यात्मिक दृष्टियों के बीच संवाद तथा आधुनिक चिकित्सा और आयुष के बीच सेतु स्थापित करने के उनके प्रयास यह स्पष्ट करते हैं कि भविष्य की चिकित्सा प्रतिस्पर्धा नहीं, सहयोग से आगे बढ़ेगी। यह साक्षात्कार डॉ. मित्तल के उसी जीवन-दृष्टि को रेखांकित करता है, जहाँ चिकित्सा एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व और जागरूक जीवन की साधना बन जाती है।
साक्षात्कार
"स्वास्थ्य केवल उपचार नहीं, एक स्वास्थ्य की रक्षा और रोगों से बचाव की जागरूक जीवन-दृष्टि है।"— डॉ. ओंकार मित्तल
प्रश्न १. डॉ. मित्तल, आपके कार्यों में 'लालिमा प्रोजेक्ट' की परिकल्पना एक अत्यंत महत्वपूर्ण नवीन पहल के रूप में सामने आई है। कृपया इसके उद्देश्य और प्रेरणा के बारे में बताइए।
उत्तर : "लालिमा प्रोजेक्ट मूलतः स्वास्थ्य को लेकर सामाजिक संवेदनशीलता के उदाहरण के प्रतीक बनाने की एक परिकल्पना है। हमारे समाज में आज भी बड़ी संख्या में महिलाएं, किशोरियाँ और बच्चे आयरन व फॉलिक एसिड की कमी से जूझ रहे हैं, जिसके दुष्परिणाम केवल शरीर में अनेक बीमारियों के रूप में लक्षित होते हैं जिनकी उपेक्षा कर दी जाती है। शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक और सामाजिक स्तर ये अनुभव में आता है। सरकार के प्रयासों के पूरक बनने की इस परियोजना की परिकल्पना का लक्ष्य केवल सप्लीमेंट देना नहीं, बल्कि सही खान-पान, लोक शिक्षण और जागरूकता के माध्यम से स्वास्थ्य को जीवन-शैली का हिस्सा बनाना है।
जब व्यक्ति समझता है कि वह क्या खा रहा है और क्यों, तब स्थायी परिवर्तन संभव होता है।"
प्रश्न २. आप अक्सर “Quest for Longevity – a phenomenological approach” की बात करते हैं। इसे आप किस रूप में देखते हैं?
उत्तर : "दीर्घायु होना केवल अधिक वर्ष जीना नहीं है, बल्कि गुणवत्तापूर्ण, सजग और अर्थपूर्ण जीवन जीना है। Phenomenological approach का अर्थ है—मनुष्य के अनुभवों को केंद्र में रखकर स्वास्थ्य को समझना।
मैं यह मानता हूँ कि शरीर, मन और चेतना—तीनों की सामंजस्यपूर्ण उपस्थिति ही वास्तविक दीर्घायु का आधार है। यदि हम केवल रोग का इलाज करें और जीवन-अनुभव को न समझें, तो रोग की मूल समझ और उस पर आधारित चिकित्सा अधूरी रह जाती है।"
प्रश्न ३. आपके कार्यों की सूची में मानवतावादी और आध्यात्मिक दृष्टि के बीच खंडन के संबद्ध से बचकर विनम्र और सौहार्दपूर्ण संवाद का लक्ष्य भी स्पष्ट उभर कर आता है- यह सेतु कैसे बनता है?
उत्तर : "मानवता और आध्यात्मिकता परस्पर विरोधी जीवन दृष्टि और आइडियोलॉजी हैं । इनकी मूल स्थापनाएँ अलग-अलग हैं। मानवतावाद - मानव को सृष्टि का सर्वेसर्वा मानता है - उससे अतिरिक्त किसी सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता । इसी अहंकार को वो मानव की गरिमा और आत्मसम्मान मानता है। इसी आधार पर हमें करुणा, संवेदना और उत्तरदायित्व सिखाता है, पारलौकिक - आध्यात्मिक दृष्टि ईश्वरीय सत्ता को जीवन और प्रकृति का मूल आधार मानती है। ईश्वर से साक्षात्कार ही इसके अनुसार जीवन का आधार और लक्ष्य है। इसके आधार पर ही हमें स्वयं से संवाद करना सिखाती है।
आधुनिक शिक्षा प्राप्त चिकित्सक को अन्य चिकित्सा पद्धतियों की पारलौकिक दृष्टि से सीखने और उनको उचित स्थान देने की आवश्यकता है। मृत्यु से संघर्ष नहीं करना- उसको एक परम सखा के रूप में स्वीकार करना भी है। केवल रोग के प्रति मात्र बायोलॉजिकल कारक नहीं, जीवन शैली में ईश्वरीय नियमों की उपेक्षा भी कारक है। रोगी को एक सम्पूर्ण ईश्वरीय सृष्टि से रचित मनुष्य के रूप में देखना है, वहीं से यह सेतु बनता है। यही दृष्टि को समाज और राजनीति में आगे लाना मेरे कार्यों का मंतव्य और गंतव्य है।"
प्रश्न ४. आप आधुनिक चिकित्सा और आयुष के बीच संवाद स्थापित करने की बात करते हैं। इसकी आवश्यकता क्यों महसूस हुई?
उत्तर : "आधुनिक चिकित्सा ने हमें अनेक विसंगतियों और भंवर में फँसा दिया है। इससे बाहर आने के राष्ट्रीय लक्ष्य हेतु आयुष पद्धतियां सहयोगी भूमिका अदा करने की संभावना रखती हैं। इन्होंने हमें जीवन-शैली, संतुलन और प्रकृति से जुड़ाव सिखाया है।
वर्तमान में दोनों एक-दूसरे के विरोधी बनकर कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़े हैं । इस युद्ध को रोकने की भूमिका बनानी है। पूरक होने की संभावना क्या है ये भविष्य की शोध का विषय है । लेकिन पहले खंडन की संस्कृति से मुक्ति पानी होगी। खंडन को मर्यादित करना होगा। अपनी स्थापनाओं के प्रति विनम्र होना होगा । सत्यनिष्ठ होना होगा। आइडियोलॉजी की निष्ठा को त्यागकर अनुभव और सत्य की निष्ठा बनानी होगी। संवाद का उद्देश्य अपनी पद्धति किसी को श्रेष्ठ ठहराना नहीं, बल्कि रोगी के हित में दोनों की श्रेष्ठताओं को एक मंच पर लाना है।"
प्रश्न ५. लोक शिक्षण को आप अपने प्रयासों का अनिवार्य हिस्सा मानते हैं। इसके पीछे आपकी सोच क्या है?
उत्तर : "जब तक स्वास्थ्य ज्ञान लोक भाषा और लोक जीवन में नहीं उतरता, तब तक कोई भी योजना सफल नहीं हो सकती।
लोक शिक्षण लोगों को यह अधिकार देता है कि वे अपने स्वास्थ्य के बारे में स्वयं निर्णय ले सकें। यही सशक्तिकरण लालिमा प्रोजेक्ट और मेरी अन्य पहलों की मूल शक्ति है।"
प्रश्न 6. इन सभी प्रयासों के बीच आपका वर्तमान जीवन-पथ किस दिशा में अग्रसर है?
उत्तर : "आज मेरा जीवन-पथ अन्य सहयोगियों और सेतु-निर्माताओं की तलाश है।
सेतु विज्ञान और संवेदना के बीच,
सेतु आधुनिकता और परंपरा के बीच,
और सेतु चिकित्सक व समाज के बीच।
ऐसे साधक चाहिए ।
मैं चाहता हूँ कि स्वास्थ्य को लेकर भय नहीं, बल्कि समझ और विश्वास का वातावरण बने।"
प्रश्न ७. अंत में, युवा चिकित्सकों और समाज के लिए आपका संदेश क्या होगा?
उत्तर : "चिकित्सा के पेशे में सेवा की निष्ठा और शोध- साधना का समावेश करें ।
और समाज से यही कहना चाहूँगा—स्वास्थ्य बाहर से नहीं, जागरूक अंतस्थल से आता है। सही ज्ञान, सही खान-पान और सही सोच—यही दीर्घायु का वास्तविक सूत्र है।"
सूचना स्रोत
डॉ ओंकार मित्तल



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