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निर्णय से निर्माण तक श्री भूलेराम का जीवन दर्शन

 साक्षात्कार 

निर्णय से निर्माण तक  श्री भूलेराम का जीवन दर्शन

प्रश्न १. आपका जन्म एक कृषक परिवार में हुआ। बचपन और पारिवारिक संस्कारों ने आपके जीवन को किस प्रकार दिशा दी?

उत्तर : "कृषक परिवार में जन्म लेने का अर्थ है—परिश्रम को पूजा मानना। बचपन से ही खेत, मिट्टी, मौसम और श्रम से संवाद होता रहा। परिवार ने सिखाया कि जीवन सीधा हो, मेहनत ईमानदार हो और आत्मसम्मान कभी गिरवी न रखा जाए। यही संस्कार मेरे जीवन की नींव बने।"

प्रश्न २. आपने कहा कि 21 वर्ष की आयु से आपने स्वविवेक से निर्णय लेना प्रारंभ किया। यह मोड़ कैसे आया?

उत्तर : "उस उम्र में मैंने समझ लिया था कि जीवन भी खेती जैसा है—बीज सही न हो तो फसल अच्छी नहीं होती। तब से मैंने दूसरों की सोच पर नहीं, अपने विवेक पर निर्णय लेने का अभ्यास किया। यही निर्णय-क्षमता आगे चलकर मेरे जीवन का सबसे बड़ा सहारा बनी।"

प्रश्न ३. आप आजीवन सीखने की प्रक्रिया में रहे। यह निरंतर सीखने की प्रवृत्ति कैसे बनी रही?

उत्तर : "मैं मानता हूँ कि सीखना रुक गया तो जीवन भी रुक जाता है। खेतों से, नौकरी से, समाज से और परिस्थितियों से—हर जगह कुछ न कुछ सिखने को मिला। मैंने कभी यह नहीं माना कि अब सब जान गया हूँ।"

प्रश्न ४. आपने ‘सीधापन’ को अपने जीवन का मूल गुण बताया है। इसे निभाना कितना कठिन रहा?

उत्तर : "सीधापन आसान नहीं होता। समाज कई बार टेढ़े रास्तों को आसान बताता है, लेकिन मैंने तय किया कि अगर सीधापन बचाना है तो बिना हिचक उसके लिए खड़ा होना होगा। जहाँ समाज की कोई हानिप्रद परंपरा दिखी, वहाँ प्रतिकार भी किया—समझौता कभी नहीं किया।"

प्रश्न ५. “समझौता—कभी नहीं, कहीं नहीं” यह आपके जीवन का सशक्त वाक्य लगता है। इसका अर्थ क्या है?

उत्तर : "जब बात मूल्यों की हो, आत्मसम्मान की हो या समाज के भविष्य की हो—तो वहाँ समझौते की कोई जगह नहीं होती। अगर गलत को स्वीकार कर लिया, तो सही के लिए लड़ने का नैतिक अधिकार खो देते हैं।"

प्रश्न ६. आपने कृषि के साथ-साथ शासकीय सेवा भी की। दोनों को साथ निभाना कितना चुनौतीपूर्ण था?

उत्तर : "चुनौती थी, लेकिन संतुलन संभव था। सेवा क्षेत्र गृह ग्राम के निकट था, इसलिए परिवार और बच्चों पर भी ध्यान दे पाया। मेहनत और पुरुषार्थ से किया गया काम कभी बोझ नहीं लगता।"

प्रश्न ७. बच्चों के भविष्य को “सैट” करने में आपको क्या सहजता मिली?

उत्तर : "मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण था—उन्हें सही संस्कार देना। जब पिता का जीवन स्वयं अनुशासन और परिश्रम का उदाहरण हो, तो बच्चों को रास्ता दिखाने के लिए शब्द कम पड़ते हैं।"

प्रश्न ८. आपके जीवन की घटनाएँ आपकी कर्मठता का प्रतीक कही जाती हैं। आप इसे कैसे देखते हैं?

उत्तर : "मैंने कभी खुद को असाधारण नहीं माना। जो भी किया, पूरे मन और ईमानदारी से किया। शायद यही कर्मठता लोगों को उदाहरण लगती है।"

प्रश्न ९. आज के युवाओं को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?

उत्तर : "जीवन को संयोग से नहीं, निर्णय से बनाओ। मूल्य तय करो और उन पर अडिग रहो। सीधापन कमजोरी नहीं, सबसे बड़ी ताकत है—बस उसे दृढ़ता से निभाना पड़ता है।"

प्रश्न १०. यदि आपके जीवन का सार एक वाक्य में कहा जाए तो वह क्या होगा?

उत्तर : “जो सही है, वही करूंगा—चाहे अकेला ही क्यों न खड़ा होना पड़े।”

सूचना स्रोत 

श्री भूलेराम जी

मुरादनगर (गाजियाबाद)

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 





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