🙏🌹🌹❤️❤️🙏 शुभ प्रभात 🙏🌹❤️🙏
🌼 भूमिका
वह शक्ति, जिसका हर श्वास पर बसेरा है,
जो प्रत्येक कर्म के फल पर पहरा देती है,
जो आकाश से भी ऊँची और पाताल से भी गहरी है—
वही तो हर जड़-चेतन में एक ही रूप होकर विद्यमान है।
उसे समझो तो दुःख का भंडार भी वही प्रतीत होता है,
और यदि समझ में प्रेम उतर आए, तो वही अपार प्रेम बन जाता है।
जब मनुष्य स्वयं को नियंता समझने की भूल करता है,
तब विनाश का मार्ग खुलता है।
और जब विश्वास की अलख जगा कर चलता है,
तो वही शक्ति करतार बनकर संबल देती है।
यही भाव जीवन को दिशा देता है,
यही दृष्टि हर क्षण को पदचिन्ह बना देती है।
सबका भला हो—इसी कामना के साथ।
🌹🙏 आज का विचार
जीवन का हर पल पदचिन्ह बन सकता है (लघुकथा)
एक बार बारह वर्ष की एक बच्ची,
छः वर्ष के छोटे से बालक को अपनी पीठ पर लादे
हिमालय की चढ़ाई बड़े आनंद से चढ़ रही थी।
रास्ते में एक युवा राहगीर ने उसे टोका—
“ए लड़की! बोझ नहीं लगता?”
बच्ची मुस्कराकर बोली—
“बाबूजी! बोझ कहाँ है? यह तो मेरा भाई है।”
यह उत्तर सुनकर वह राहगीर अचंभित रह गया।
उस क्षण उसे समझ आ गया कि
जिससे हृदय का संबंध हो, वह भार नहीं बनता—
वह शक्ति बन जाता है।
🌿 जीवन-दर्शन की सटीक व्याख्या
दोस्तो,
यही जीवन का सत्य है—
जब-जब हम किसी कर्म से दिल से जुड़ते हैं,
तब आनंद स्वतः प्रकट होता है
और वही कर्म हमें सही गति से सही मुकाम तक पहुँचा देता है।
समस्या बाहर नहीं होती,
समस्या भीतर होती है।
इंट्रेस्ट की कमी ही बोझ पैदा करती है।
भीतर सोई हुई चेतना को जगाने भर की देर है।
इतना ही करना है,
जितना जॉर्ज वाशिंगटन ने किया—
शिक्षा ग्रहण करते समय अपनी मेज़ पर
‘President’ का P अक्षर लिखकर
खुद को उस पद के लिए मानसिक रूप से तैयार किया।
उन्होंने स्वयं पर विश्वास किया,
और वही विश्वास उन्हें राष्ट्रपति बना गया।
इसलिए याद रखें—
परिस्थितियाँ नहीं, अपितु
अविश्वास रोकता है।
🌸 काव्य रचना
पदचिन्ह तब बन पाएँगे,
जब निश्चय से सींचे जाएँगे।
विश्वास को संग-संग आगे बढ़ाएँगे,
धैर्य और साहस खुद चले आएँगे।
ना हो विचलित,
ना हो अधीर,
ना घबरा एक पल भी—
अगले कदम को बस आगे बढ़ा।
पदचिन्ह खुद-ब-खुद राह बनाएँगे,
हर पल पदचिन्ह बन जाएँगे।
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सृजक
धर्मेन्द्र खटाना ‘धम्मू’
दमदमा
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति


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