जीवन जब खुद से बातें करने लगता है
‘जीवन संध्या’ का अर्थ है जीवन का वह समय जब उम्र ढलने लगती है। जैसे शाम दिन का अंत होती है, वैसे ही जीवन संध्या जीवन का आख़िरी पड़ाव होती है। यह केवल अंत का संकेत नहीं है, बल्कि ठहरने और सोचने का समय भी है।
इस उम्र तक आते-आते इंसान बहुत कुछ देख और समझ चुका होता है। अब उसे साबित करने की जल्दी नहीं रहती। वह बाहर की दुनिया से ज़्यादा अपने मन की सुनने लगता है। जो कुछ जीवन में हुआ—अच्छा या बुरा—वह सब अनुभव बनकर उसके साथ रहता है। इन्हीं अनुभवों से वह जीवन को सही मायने में समझने लगता है।
लेकिन जीवन संध्या अकेलेपन का एहसास भी करा सकती है। अपने लोग, दोस्त, रिश्तेदार धीरे-धीरे साथ छोड़ने लगते हैं। कई बार घर भरा होने पर भी मन खाली लगता है। उदासी आती है, मन भारी हो जाता है। पर यही समय इंसान को खुद से मिलने का मौका भी देता है। वह सोचता है—मैं कौन हूँ, मेरा जीवन क्या रहा, और आगे मुझे कैसे शांत रहना है।
कुछ लोग इस समय को बोझ मानते हैं। शरीर साथ नहीं देता, दूसरों पर निर्भर होना पड़ता है। पर कई लोग इसे अवसर मानते हैं। वे कहते हैं—अब भाग-दौड़ खत्म, अब प्रेम से जीना है। अब दूसरों के लिए थोड़ा और सहानुभूति, थोड़ा और धैर्य दिखाने का समय है। सेवा, अपनापन और स्नेह ही इस उम्र की असली पूँजी बन जाते हैं।
इस समय इंसान भगवान, प्रकृति और जीवन के अर्थ के बारे में भी ज़्यादा सोचने लगता है। उसे समझ आता है कि सब कुछ स्थायी नहीं है। मौत का डर धीरे-धीरे कम होता है और जीवन को जैसा है, वैसा स्वीकार करने की भावना बढ़ती है। यही स्वीकार मन को सुकून देता है।
प्रमिला त्रिवेदी ने जब अपनी दीदी को जीवन की अंतिम यात्रा पर जाते देखा, तो उन्होंने जीवन संध्या को शब्दों में ढाल दिया। उनका लिखना बताता है कि यह समय केवल विदाई का नहीं होता, बल्कि भावनाओं को समझने और उन्हें व्यक्त करने का भी होता है। ऐसी अनुभूतियाँ दूसरों को भी अपने जीवन को देखने की नई दृष्टि देती हैं।
असल में जीवन संध्या जीवन से दूरी बनाने का समय नहीं है। यह जीवन को धीरे-धीरे, प्यार से समझने का समय है। जहाँ शोर कम होता है, मन शांत होता है और दिल सच्ची बातें करने लगता है। यहाँ अंत नहीं, बल्कि जीवन को समझने की सबसे गहरी शुरुआत होती है।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें