भूमिका
प्रस्तुत है डॉ. सुनीता मीरवाल का साक्षात्कार। शिक्षा, शोध और भाषा—तीनों के बीच संतुलन साधना सरल नहीं होता। जब कोई व्यक्तित्व अध्यापन के साथ-साथ अध्ययन, लेखन और सतत चिंतन को समान रूप से आगे बढ़ाता है, तो उसका अनुभव दूसरों के लिए भी उपयोगी बन जाता है। डॉ. सुनीता मीरवाल ऐसा ही एक नाम हैं, जिनका कार्यक्षेत्र विद्यालयी शिक्षा से लेकर शोध और साहित्यिक सहभागिता तक फैला हुआ है।
संस्कृत विषय में पी.एच.डी. और हिन्दी-संस्कृत के अध्यापन से जुड़ी उनकी यात्रा भाषा को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे विचार और संवेदना से जोड़ती है। उनके शोध, लेखन और संगोष्ठियों में सहभागिता का उद्देश्य ज्ञान का प्रदर्शन नहीं, बल्कि विषय की समझ को साझा करना रहा है।
यह साक्षात्कार डॉ. सुनीता मीरवाल के शैक्षणिक दृष्टिकोण, भाषा के प्रति उनके भाव और अध्ययन-लेखन से जुड़े उनके अनुभवों को सहज रूप में प्रस्तुत करता है। ब्लॉग पाठकों के लिए यह संवाद न केवल एक शिक्षिका की कार्यशैली को समझने का अवसर है, बल्कि यह भी दिखाता है कि निरंतर अध्ययन और सादगीपूर्ण अभिव्यक्ति किस तरह शिक्षा को अधिक अर्थपूर्ण बनाती है।
साक्षात्कार
डॉ. सुनीता मीरवाल
प्रश्न १. सबसे पहले आप अपने शैक्षणिक सफ़र के बारे में बताइए।
उत्तर : "मैंने एम.ए. संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेज़ी विषयों में किया है। इसके बाद संस्कृत विषय में पी.एच.डी. की, जिसमें मेरा शोध विषय 'महर्षि दयानंद पर आधारित संस्कृत महाकाव्यों का तुलनात्मक अध्ययन' रहा। यह अध्ययन मेरे लिए ज्ञानवर्धक भी रहा और विषय की गहराई को समझने का अवसर भी।"
प्रश्न २. वर्तमान में आप किस शैक्षणिक भूमिका में कार्यरत हैं?
उत्तर : "वर्तमान में मैं सोफिया सीनियर सेकेंडरी स्कूल, जयपुर रोड, अजमेर में वरिष्ठ अध्यापिका के रूप में हिन्दी और संस्कृत विषय पढ़ा रही हूँ। अध्यापन मेरे लिए केवल पेशा नहीं, बल्कि सतत सीखने और सिखाने की प्रक्रिया है।"
प्रश्न ३. आपके लेखन और शोध कार्यों के बारे में कुछ बताइए।
उत्तर : "मेरे कुछ लेख और रचनाएँ राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। इसके अतिरिक्त विभिन्न राष्ट्रीय एवं राजकीय संगोष्ठियों में मेरे शोध आलेखों और रचनाओं का वाचन भी हुआ है। यह सब प्रयास ज्ञान के आदान-प्रदान की भावना से जुड़े रहे हैं।"
प्रश्न ४. आप किन भाषाओं में सहज रूप से कार्य करती हैं?
उत्तर : "मैं हिन्दी, अंग्रेज़ी और संस्कृत—तीनों भाषाओं में कार्य करती हूँ। अध्यापन, अध्ययन और लेखन में इन भाषाओं का संतुलित उपयोग करती हूँ।"
प्रश्न ५. आपके अध्ययन की रुचियाँ किन विषयों में अधिक रहती हैं?
उत्तर : "मुझे विभिन्न पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ना पसंद है, विशेष रूप से विषयगत संदर्भ पुस्तिकाएँ। इससे समकालीन विचारों और शोध प्रवृत्तियों से जुड़े रहने में सहायता मिलती है।"
प्रश्न ६. लेखन आपके जीवन में किस रूप में उपस्थित है?
उत्तर : "लेखन मेरे लिए अपने मनोद्गारों को व्यक्त करने का माध्यम है। जो विचार मन में आते हैं, उन्हें लिपिबद्ध करने से आत्मसंतोष भी मिलता है और विचार स्पष्ट भी होते हैं।"
प्रश्न ७. आप साहित्यिक प्रस्तुतियों से कैसे जुड़ी रहती हैं?
उत्तर : "मैं हिन्दी और संस्कृत की राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय प्रस्तुतियों को सुनना पसंद करती हूँ। इससे भाषा, भाव और अभिव्यक्ति के नए पक्षों को समझने का अवसर मिलता है।"
प्रश्न ८. विद्यार्थियों के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगी?
उत्तर : "विद्यार्थी यदि अध्ययन को बोझ न मानकर जिज्ञासा के साथ अपनाएँ, तो सीखने की प्रक्रिया सरल और प्रभावी हो जाती है। नियमित अध्ययन, भाषा के प्रति सम्मान और निरंतर अभ्यास ही आगे बढ़ने का आधार है।"
अंततः
वाचन मैंने दिल्ली दो बार में जेएनयू यूनिवर्सिटी में और जयपुर में राजस्थान यूनिवर्सिटी में भी किया है, जिसमें छात्रों के लिए हिन्दी और संस्कृत भाषा के महत्व और साहित्य के बारे में अपने विचार प्रस्तुत किये हैं। अजमेर में भी महर्षि दयानन्द विश्विद्यालय में कॉन्फ्रेंस में भी प्रतिभाग कर अपने विचार व्यक्त किए हैं।
वैसे आपने बहुत सुन्दर लिखा हैl। आपके इस योगदान के लिए मैं आपकी आभारी हूँ।
सूचना स्रोत




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