सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

धार्मिक कट्टरता.... एक ज्वालामुखी

धार्मिक कट्टरता.... एक ज्वालामुखी

1947 से लेकर 1996 तक भारतीय विदेश नीति एवं विशुद्ध भारतीय राजनीति में एकरूपता बनी रही। नरसिम्हा राव के बाद कांग्रेस में एक मजबूत नेतृत्व का अभाव हो गया। जिस कारण कांग्रेस का बड़ा वोट बैंक क्षेत्रीय दलों में बंट गया। और! यहीं से भारतीय राजनीति का परिदृश्य बदलना शुरू हो गया।

इतिहास गवाह है किसी भी देश के बहुसंख्यकों में राष्ट्रवाद की अति भावनाएं भरकर उसे देश की डोर अपने हाथ में आसानी से ली जा सकती है। इसी सिद्धांत के आधार पर जर्मनी में हिटलर का उदय और इटली में मुसोलिनी का उदय हुआ। 

यदि आप सोचते हैं कि हिटलर और मुसोलिनी जैसे राष्ट्रवादियों का जन्म किसी नियोजित योजना के अंतर्गत होता है, तो आप गलत हैं। किसी भी राष्ट्र की समकालीन परिस्थितियाँ हिटलर और मुसोलिनी को पैदा करती हैं। 

भारत में आडवाणी, कल्याण सिंह, विनय कटियार, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विशेषकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे नेताओं का जन्म और उनकी विचारधाराओं का फलना-फूलना पूर्व नियोजित नहीं था बल्कि यह समय एवं परिस्थितियों की मांग थी, जिसने बीजेपी को विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बना दिया।

जर्मनी में बहुसंख्यक यहूदी अल्पसंख्यकों के द्वारा हो रहे आर्थिक शोषण को सहन करते-करते टूट गए थे। जिसने हिटलर को पैदा किया। इसी तरह भारत में भी बहुसंख्यकों एवं अल्पसंख्यकों की एक केमिस्ट्री है। 1947 के बाद भारतीय बहुसंख्यक हिंदुओं ने उदारीकरण एवं आधुनिकता को खुले हृदय से अपनाया। धार्मिक कट्टरता के स्थान पर आधुनिक शिक्षा एवं सामाजिक सुधारों को प्रमुखता दी।

वहीं दूसरी ओर अल्पसंख्यकों में आधुनिक शिक्षा का अभाव बना रहा। वे धर्म को सर्वोपरि मानते हुए दीनी तालीम को प्रमुखता देते रहे। गांव मोहल्ले से लेकर बड़े शहरों तक लोगों में धार्मिक विश्वास को अटूट बनाया गया। 

1947 के दंगों के बाद अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदायों की अधिकांश जनसंख्या ने कस्बों और शहरों का रुख किया। कुछ खेती-बड़ी करने वाले परिवर्तित मुस्लिम गांव में बने रहे। अपने धार्मिक कट्टर विश्वास एवं आक्रामक शैली के कारण जहाँ मुस्लिम आबादी बढ़ती गई, वहाँ हिंदू आबादी असहज महसूस करती गयी और धीरे-धीरे अपनी इच्छा या विवशता से पलायन करती गयी। 

कश्मीर से हिंदू पंडितों का पलायन, मुंबई जैसे बड़े शहरों में मुस्लिम अपराधियों का बेखौफ बढ़ता प्रभाव, बाहुबली नेताओं के द्वारा मुस्लिम नवयुवकों का डराने-धमकाने... यहाँ तक हत्या करवाने के प्रयोग से बहुसंख्यकों में मुसलमानों के प्रति एक भय पनपना शुरू हुआ।

मुंबई दंगे और गोधरा कांड ने मानो देश के गांव-गांव शहर-शहर में एक अजीब डर एवं घृणा वाला माहौल बना दिया। मुंबई दंगों के परिणामस्वरूप बाल ठाकरे जैसे फायर ब्रांड नेताओं का जन्म हुआ। गोधरा कांड के पश्चात नरेंद्र मोदी को बहुसंख्यकों के द्वारा एक मजबूत रक्षक के रूप में पहचाना गया।

अल्पसंख्यकों की आक्रामक शैली से भयावह और उनके प्रति असंतोष से नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्तित्व को वैश्विक नेता बनने का अवसर प्राप्त हुआ। कहा जाता है आवश्यकता आविष्कार की जननी है और इसी सिद्धांत के आधार पर नरेंद्र मोदी भारत के बहुसंख्यकों के प्रिय नेता बन गए। परंतु अल्पसंख्यकों की बौखलाहट और हिंदुत्व को धार देते देते यह साइड इफेक्ट हुआ कि भारत आज धार्मिक कट्टरता के ज्वालामुखी पर आ खड़ा हुआ है।

ग्राम सभा से लेकर लोकसभा तक नेतागण इस पैटर्न पर कार्य कर मजबूत नेता बनने की कोशिश कर रहे हैं जो सांप्रदायिक सौहार्द को नुकसान पहुंचा रहा है। आज अधिकतर नौजवान राष्ट्रवाद एवं बहुसंख्यकों के हितैषी बनने की लंबी कतार में खड़े हैं। आज देश आधुनिक विकास, उन्नति की दौड़ को छोड़कर धार्मिक कट्टरता के जाल में फंसता जा रहा है।

इसका दोष न तो कांग्रेस को दिया जा सकता है, ना बीजेपी को। भारत में मुसलमानों के दीनी तालीम के प्रति अटूट विश्वास एवं आक्रामक शैली ने धार्मिक कट्टरता द्वारा पोषित राजनीति को जन्म दिया। जिससे देश में कम दूरदर्शी एवं अपारंपरिक नेताओं की जमात इकट्ठा हो गई। जो प्रजातांत्रिक व्यवस्था के बावजूद भी बहुसंख्यक एंव अल्पसंख्यक की गाढी कमाई से विलासी राजाओं वाला जीवन जी रहे हैं।

यदि भारतवासी वास्तव में सुधार चाहते हैं। इस देश को आगे बढ़ाना चाहते हैं तो.... 

अल्पसंख्यकों को दीनी तालीम एवं धार्मिक कट्टरता को त्याग कर आधुनिक शिक्षा को प्रमुखता देनी होगी। अपने प्रभुत्व वाली आक्रामक शैली छोड़नी होगी। 

धार्मिक गुरुओं, कथावाचकों, मुल्ला-मौलवियों के प्रभाव को ना के बराबर करना होगा। 

धार्मिक भेदभाव के दिखावे एवं सत्ता पाने के लिए झूठे धार्मिक एजेंडो को प्रसारित करने वाले राजनीतिक दलों पर प्रतिबंध लगाना होगा। तकनीकी के प्रचार प्रसार से युवाओं को जोड़ना होगा। 

और सर्वोपरि........ निष्पक्षता से संविधान का पालन करना होगा।

रचनाकार

श्री मौसम सिंह

प्रवक्ता

रामपुर मनिहारान 

सहारनपुर (उत्तर प्रदेश)

लेखक प्रवक्ता श्री मौसम सिंह जी समाज पर पैनी निगाह रखते हैं और समय समय पर भावाभिव्यक्ति देते रहते हैं। प्रस्तुत है उनका नवीनतम आलेख।

प्रस्तुति



टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

"मां की गोद से ऊंचाइयों तक — गिरिराज की आत्मकथा"

  मां की गोद से ऊंचाइयों तक  गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..."   यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा।   जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है।   मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।"  यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया।   लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...

દીપક પંડ્યા (ગાંધીનગર) - Updated 04.06.2026

મારી ભાવયાત્રા 64 નમસ્કાર … સ્નેહવંદન ! માનવ જીવનની આખીય દોડ પાછળ જો કોઈ એક જ આકાંક્ષા છુપાયેલી હોય, તો તે છે 'ખુશી'. સવારથી સાંજ સુધી માણસ જે કંઈ પણ કરે છે—પૈસા કમાય છે, સત્તા મેળવે છે, સંબંધો બાંધે છે—એ બધાની પાછળનો અંતિમ ઉદ્દેશ્ય માત્રને માત્ર સુખ અને આનંદની પ્રાપ્તિ જ હોય છે. પરંતુ આજના ભૌતિકવાદી યુગમાં માણસ ખુશીની વ્યાખ્યા ભૂલી ગયો છે. તે વિચારે છે કે મેળવવામાં, સંગ્રહ કરવામાં કે અન્ય પાસે અપેક્ષા રાખવામાં ખુશી છે. પણ સત્ય એનાથી તદ્દન વિપરીત છે. સાચી ખુશી આપવામાં છે, લેવા કે માંગવામાં નથી. આ સૃષ્ટિનો અપરંપાર નિયમ છે કે ખુશીની આપણે જેટલી લહાણી કરીશું, તેટલી જ તે આપણી પાસે વ્યાજ સાથે પાછી આવશે. જરા ઊંડાણથી વિચારીએ તો સમજાશે કે 'લેવું' અને 'માંગવું' એ ભિખારીપણું છે, જ્યારે 'આપવું' એ ખુદ અમીરી છે. જ્યારે આપણે કોઈની પાસે કંઈક માંગીએ છીએ, પછી ભલે તે વસ્તુ હોય, પ્રેમ હોય કે આદર હોય, ત્યારે આપણે આપણી જાતને ખાલી અનુભવીએ છીએ. માંગવામાં હંમેશા અપેક્ષા અને પરવશતા હોય છે. અને જ્યાં અપેક્ષાઓનો પહાડ હોય, ત્યાં ક્યારેય સાચો આનંદ હોઈ શકે નહીં. કારણ કે અપેક્ષા હંમેશા...

मन की बातें भाव भरी

🙏🌹🌹❤️❤️🙏 शुभ प्रभात जी🙏🌹❤️🙏 आपका दिन मंगलमय हो। ईश्वर आपकी हर मंगलकामना पूर्ण करें— वह जो हारे का सहारा है, जो टिमटिमाता जुगनू भी है और अथाह ऊर्जा से भरा तारा भी। जो घोर तिमिर में प्रकाश बनकर उभरता है, और उजाले में भी दिन को बहार देता है। वह जो आकार–निराकार दोनों रूपों में दुष्टों का संहारक है, जो दिशाहीन के लिए दिशासूचक यंत्र का पारा बन जाता है। जो निर्धन के दुःख–दरिद्रता का अंत है, और धनी के लिए पौ-बराहा। जिसके हम भी हैं और जो हमारा भी है। जो भूखे के लिए अन्न है और पशुओं के लिए चारा, जो पत्थर, पहाड़ और समूची धरा का आधार है। 🌹 वह सबका भला करें🌹 🙏🌹🌹❤️❤️🙏 आज का विचार मेरी पुस्तक “हृदय उद्गार” से एक कविता — सर्व धर्म समभाव छिन्न-भिन्न सा हृदय मेरा, मन में तूफानी कोलाहल है। सभ्यता के शिखर पर पहुँचकर, धर्म बना क्यों क्रूर दावानल है? भूमि वही, आकाश वही, तुझमें वही, मुझमें वही। एक-सा ही सबका आंचल है, धरती माँ का पावन आँचल है। रक्त-कोष में बहता एक ही बल है, कहीं केसरिया, कहीं हरित दल है। आब पियो या पानी पियो, जल तो आखिर एक ही जल है। यह कैसा आया भेद-रूपी पल है? भिन्न-भिन्न नामों म...