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अमर नायक दुल्ला भट्टी जिसकी याद में मनाई जाती है लाहिड़ी

इतिहास का वह अमर नायक दुल्ला भट्टी, जिसकी स्मृति में मनाई जाती है लाहिड़ी (लोहड़ी)

आज लाहिड़ी पर्व है। यह पर्व हमारे इतिहास के एक ऐसे अमर नायक से जुड़ा है, जिसने अपने सत्कर्मों के बल पर जनमानस में स्थायी स्थान बनाया। आइए, इतिहास के उस अभिनंदनीय व्यक्तित्व के जीवनवृत्त पर दृष्टि डालें, जिसने अपने काल में जनसेवा द्वारा यश अर्जित किया और जिसकी स्मृति आज भी लोकपर्व के रूप में जीवित है। यह महान व्यक्तित्व दुल्ला भट्टी के नाम से जाना जाता है, जिसकी याद में आज भी लोहड़ी पर्व मनाया जाता है।

गुर्जरों का एक अत्यंत प्राचीन गोत्र भाटी है, जिसकी शाखाएँ आज भी राजस्थान, भारत और पाकिस्तान में लगभग दो सौ उपशाखाओं के रूप में विद्यमान हैं। इनमें भाटी राजपूत, भाटी गुर्जर, पंजाब के भट्टी, भट्टी मुसलमान, मुगल, जाट, सिख आदि सम्मिलित हैं। ऐसी ही किसी एक शाखा से संबंधित व्यक्ति थे दुल्ला भट्टी, जो परिस्थितिवश मुस्लिम बने। यद्यपि उन्होंने इस्लाम स्वीकार किया, किंतु उनका हृदय सदैव मानवता और अपने देशवासियों के लिए धड़कता रहा।

दुल्ला भट्टी का स्वभाव मूलतः विद्रोही था। सत्ता और राजनीति के प्रति उनका दृष्टिकोण स्पष्ट था—वे मानते थे कि शासक वर्ग निर्धनों के कल्याण के लिए न तो कोई ठोस योजना बनाता है और न ही वास्तविक संवेदना रखता है। उन्होंने भारतीय समाज की निर्धनता, पीड़ा और शोषण को निकट से देखा था। इसी कारण वे स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के योद्धा बनकर खड़े हुए।

उन्होंने मुगल बादशाह अकबर से सीधा युद्ध करने के स्थान पर जनहित का एक वैकल्पिक मार्ग चुना। वे अमीरों, ज़मींदारों और जागीरदारों के यहाँ डकैती डालते और प्राप्त धन को निर्धनों, असहायों और कन्याओं के विवाह में व्यय करते थे। इसी कारण वे जनता के नायक बन गए। लोग अपनी पीड़ा लेकर उनके पास आते और दुल्ला भट्टी हर संभव प्रयास से उनकी सहायता करते।

मुगल सत्ता से संघर्ष

जब अकबर को दुल्ला भट्टी की गतिविधियों का ज्ञान हुआ, तो उसने उन्हें डाकू घोषित कर समाप्त करने का आदेश दिया। किंतु जनता का समर्थन दुल्ला भट्टी के साथ था। उनके समर्थक गुप्तचरों की भाँति कार्य करते और मुगल सेना की गतिविधियों की सूचना उन्हें देते रहते। इस प्रकार दुल्ला भट्टी लंबे समय तक मुगल सेना को छकाते रहे।

सुंदर मुंदरिये की कथा

एक निर्धन ब्राह्मण अपनी पुत्री सुंदर मुंदरिये के विवाह हेतु सहायता माँगने दुल्ला भट्टी के पास पहुँचा। दुल्ला भट्टी ने न केवल सहायता का आश्वासन दिया, बल्कि स्वयं उस कन्या को अपनी धर्मबहन स्वीकार किया। उन्होंने उसके विवाह की संपूर्ण व्यवस्था की और दहेज सहित सौ मन शक्कर भी भेंट की।

विवाह के समय शक्कर के भार से शॉल का फटना लोककथा में एक प्रतीक बन गया, जिसे आज भी लोहड़ी के गीतों में गाया जाता है। विवाह संपन्न होते ही अकबर के छद्म सैनिकों ने दुल्ला भट्टी को घेर लिया और एक भीषण संघर्ष के बाद उनकी हत्या कर दी।

शहादत और लोकस्मृति

दुल्ला भट्टी का बलिदान जनता के लिए वज्रपात के समान था। उनके निधन पर दूर-दूर तक शोक मनाया गया। यदि शहीद की परिभाषा को देखें, तो दुल्ला भट्टी निःसंदेह एक शहीद थे—उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दी, किंतु अपने आदर्शों से विचलित नहीं हुए।

यद्यपि तत्कालीन शासन ने उन्हें राजद्रोही कहा, किंतु जनता की दृष्टि में वे कभी डाकू नहीं थे। वे शोषकों से धन लेकर शोषितों में बाँटने वाले लोकनायक थे।

दुल्ला भट्टी की स्मृति में लोहड़ी

‘भटनेर का इतिहास’ के लेखक हरिसिंह भाटी के अनुसार, दुल्ला भट्टी की स्मृति में पंजाब, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और पाकिस्तान में प्रति वर्ष 13 जनवरी को लोहड़ी पर्व मनाया जाता है। यह पर्व सामूहिक अग्नि, लोकगीत और सामाजिक एकता का प्रतीक है।

इतिहास संकलन के लिए सुझाव


1. लोकनायकों को केवल शासक दृष्टिकोण से नहीं, जनदृष्टि से भी आँका जाए

2. लोकगीतों, पर्वों और जनश्रुतियों को इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोत माना जाए

3. पाठ्यपुस्तकों में क्षेत्रीय नायकों को उचित स्थान दिया जाए

4. लोहड़ी जैसे पर्वों के सांस्कृतिक-ऐतिहासिक कारणों को स्पष्ट किया जाए

क्या आप जानते हैं?

लोहड़ी पंजाबी हिंदुओं का प्रमुख लोकपर्व है, जो दुल्ला भट्टी जैसे लोकनायकों की स्मृति, सामाजिक न्याय और सामूहिक उल्लास का प्रतीक है।

सूचना स्रोत

श्री मोहन लाल वर्मा जी

जयपुर

पाठ्य उन्नयन और प्रस्तुति






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