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कलाकार विद्या देवी सोनी से संवाद

भूमिका 

मई 2020 में केरल के पलक्कड़ ज़िले में घटित वह घटना केवल एक हथिनी और उसके अजन्मे शिशु की मृत्यु भर नहीं थी, बल्कि वह मनुष्यता के भीतर छिपी संवेदनाओं की भी परीक्षा थी। गर्भवती हथिनी द्वारा पटाखों से भरे अनानास को खा लेने से हुई उसकी पीड़ादायक मृत्यु ने पूरे देश को झकझोर दिया। शब्द मौन हो गए और आँखें प्रश्न करने लगीं—क्या विकास की दौड़ में हम करुणा भूलते जा रहे हैं?

इसी मौन, इसी पीड़ा और इसी प्रश्न को रंगों में ढालने का कार्य किया संवेदनशील कलाकार **विद्या देवी सोनी** ने। उनका चित्र केवल एक दृश्य नहीं, बल्कि एक मौन चीख है—जो मनुष्य से मनुष्य होने का आग्रह करती है। प्रस्तुत साक्षात्कार में हम उनके उसी भावलोक में प्रवेश करने का प्रयास करते हैं, जहाँ कला केवल कला नहीं रहती, बल्कि चेतना का माध्यम बन जाती है।

कलाकार विद्या देवी सोनी से संवाद


प्रश्न १. विद्या जी, केरल की हथिनी की यह घटना जब आपने सुनी, उस क्षण आपके मन में पहला भाव क्या था?

उत्तर : "उस क्षण मन सुन्न हो गया था। एक गर्भवती हथिनी… और उसके भीतर पल रहा नन्हा जीवन—दोनों का इस तरह दर्दनाक अंत। यह सिर्फ एक खबर नहीं थी, यह भीतर तक चुभ जाने वाला सच था। मुझे लगा जैसे मनुष्य होने पर ही प्रश्नचिह्न लग गया हो।"


प्रश्न २. ऐसा क्या था जिसने आपको इस पीड़ा को चित्रांकन के माध्यम से व्यक्त करने के लिए विवश कर दिया?

उत्तर : "कुछ घटनाएँ शब्दों से परे होती हैं। मैं बोल नहीं पा रही थी, लिख नहीं पा रही थी, लेकिन भीतर कुछ टूट रहा था। तब लगा कि यदि इस वेदना को रंगों में न ढाला, तो शायद मैं खुद को माफ़ नहीं कर पाऊँगी। चित्र बनाना मेरे लिए उस असहाय पीड़ा से संवाद करने जैसा था।"

प्रश्न ३. आपके चित्र में हथिनी का दर्द और मातृत्व दोनों बहुत गहराई से झलकते हैं। क्या यह सोच-समझकर किया गया था?

उत्तर : "हाँ, बहुत सोच-समझकर। मैं उसे केवल एक जानवर के रूप में नहीं दिखाना चाहती थी, बल्कि एक माँ के रूप में। उसके चेहरे में पीड़ा थी, लेकिन उसकी आँखों में अपने बच्चे के लिए असहाय चिंता। वही भाव मैं दर्शकों तक पहुँचाना चाहती थी—कि मातृत्व किसी प्रजाति की सीमा में बंधा नहीं होता।"

प्रश्न ४. जब यह चित्र सोशल मीडिया पर लाखों लोगों तक पहुँचा, तब आपकी क्या अनुभूति रही?

उत्तर : "सच कहूँ तो खुशी नहीं हुई। मन में बस यही था कि काश यह चित्र बनाने की नौबत ही न आती। यदि लोग इसे देखकर कुछ पल रुकें, सोचें और अपने व्यवहार पर विचार करें—तो वही इसकी सार्थकता है।"

प्रश्न ५. आपके अनुसार ऐसी घटनाएँ बार-बार क्यों घट रही हैं?

उत्तर : "क्योंकि हमने सुविधा को संवेदना से ऊपर रख दिया है। खेत बचाने के नाम पर जानलेवा जाल बिछा दिए जाते हैं, बिना यह सोचे कि उसमें कौन फँसेगा। प्रकृति को हमने अपना शत्रु समझ लिया है, जबकि वह हमारी जननी है।"

प्रश्न ६. एक कलाकार होने के नाते आप क्या मानती हैं—कला समाज को बदल सकती है?

उत्तर : "कला कानून नहीं बनाती, लेकिन चेतना जगाती है। जब चेतना जागती है, तब परिवर्तन स्वतः आता है। यदि मेरा एक चित्र किसी एक इंसान को भी संवेदनशील बना दे, तो मैं उसे अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानूँगी।"

प्रश्न ७. आपके अनुसार ऐसी त्रासद घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या सावधानियाँ आवश्यक हैं?

उत्तर : "सबसे पहले—सख्त कानून और उनका ईमानदार पालन।

दूसरा—ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता, ताकि लोग जानें कि उनके छोटे से कृत्य का कितना बड़ा परिणाम हो सकता है।

और तीसरा—बचपन से ही बच्चों में करुणा, प्रकृति-प्रेम और सहअस्तित्व का संस्कार।"

प्रश्न ८. अंत में, आप समाज से क्या कहना चाहेंगी?

उत्तर : "बस इतना ही—हम मनुष्य हैं, यह केवल हमारी बुद्धि से नहीं, हमारी करुणा से सिद्ध होता है। यदि हम मूक प्राणियों के दर्द को महसूस नहीं कर सकते, तो हमारी प्रगति अर्थहीन है।"

सूचना स्रोत 

 

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 



लेखिका की प्रतिक्रिया 
उत्कृष्ट रचना है इसमें कहीं कोई कमी मुझे नहीं लग रही l बहुत-बहुत धन्यवाद इतनी सुंदर रचना के लिए 🙏🏻🪷🥰🤞🏻🌟😇🦋





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