धरती के स्वर्ग की व्यथा
कश्मीर को धरती का स्वर्ग कहा जाता है—एक ऐसा स्वर्ग जो सन् 1947 से पहले एक अखंड पहचान रखता था।
बंटवारे के समय जब पाकिस्तान की कश्मीर पर दावेदारी सामने आई, तभी से यहाँ सामुदायिक वैमनस्य की एक पीड़ादायक प्रक्रिया आरंभ हुई। इस संघर्ष में सबसे अधिक पिसे वे निर्दोष, सरल और शांतिप्रिय कश्मीरी नागरिक, जिनका किसी भी राजनीतिक षड्यंत्र से कोई सरोकार नहीं था।
अनेक परिवार उजड़ गए, अनगिनत लोग अपने घर-बार से बेदखल हो गए और कितनी ही मासूम महिलाओं को अमानवीय यातनाओं का सामना करना पड़ा। पीड़ा असहनीय थी, परंतु पीड़ितों के साथ खड़े होने वाले बहुत कम थे—मात्र सहानुभूति के कुछ शब्द, ठोस साथ का अभाव। न शासन स्तर पर पर्याप्त संवेदना दिखी, न ही समाज व्यापक रूप से जाग पाया। ऐसा प्रतीत हुआ मानो संयम, सहनशीलता और मानवीय करुणा के मूल्य कहीं पीछे छूट गए हों।
हजारों लोगों को अपनी ज़मीन, खेती, व्यवसाय और स्मृतियों से भरे घर छोड़कर शरणार्थी जीवन जीने को विवश होना पड़ा। यदि हम स्वयं को एक क्षण के लिए उनकी जगह रखकर देखें, तो पीड़ा की गहराई का अनुमान होगा। अपने ही घर में स्थान बदलने में हमें समय लगता है, जबकि विस्थापित कश्मीरी परिवारों को अपने घर छोड़े हुए तीन दशक से अधिक समय बीत चुका है। उनकी मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक वेदना को महसूस करना हम सबका नैतिक दायित्व है।
यह समय केवल स्मरण का नहीं, उत्तरदायित्व निभाने का है। जिस तरह वर्षों तक एकजुट होकर आस्था और अधिकार के प्रश्नों पर संघर्ष किया गया, उसी प्रकार इन निर्दोष, सीधे-साधे विस्थापित नागरिकों के न्याय और पुनर्वास के लिए भी संगठित प्रयास आवश्यक हैं। उन्हें उनका हक दिलाना केवल किसी एक वर्ग का नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है।
विस्थापित कश्मीरी भाइयों और बहनों से यही कहना है—आप अकेले नहीं हैं। देश की संवेदनशील चेतना आपके साथ है। धैर्य और विश्वास बनाए रखें, क्योंकि न्याय की राह लंबी अवश्य होती है, परंतु अंततः विजय सत्य की ही होती है।
अंकिता सिंह की कविता की कुछ पंक्तियां।
पीड़ा आओ अभिनंदन है।
हृदय द्वार पर कलश सजाकर
मुस्कानों की सजा रंगोली।
कब से तेरी राह निहारूं।
पीड़ा आओ अभिनंदन है।
आस पास के सब लोगों की
मुझको सच्ची शक्ल दिखाना।
अब के निर्णय हो ही जाए,
कोन है अपना कौन पराया।
इस दुनियां में अपना बन कर,
छलने का तो खूब चलन है।
हृदय द्वार पर कलश सजाकर।।
ऐसे चोट करो मन पर जो
समझ मेरी जरा जग जाए।
मन के भीतर दुबके साहस
से मेरा भी परिचय हो जाए।
पीड़ा मुझको और जलाओ
मेरे अंतर में कुंदन है
पीड़ा आओ अभिनंदन है।
नहीं भोग पाई पीड़ा जो
पर पीड़ा कैसे समझूंगी?
बिना आंसुओं को ढूलकाए
मुस्कानों का मोल करूंगी।
मुझ पर अपना प्रेम लूटाओ
तो मैं सक्षम बन जाऊंगी।
मेरे आंसु से मत डरना।
गीतों का उद्गम कुंदन है।
पीड़ा आओ अभिनंदन है।
सृजक
प्रमिला त्रिवेदी
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति





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