सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

उत्तरायण : भीतर का सूर्योदय

 उत्तरायण

भीतर का सूर्योदय

अंधकार से प्रकाश की ओर, यह क़दम बढ़ाना है,

दक्षिणायन की निद्रा त्याग, अब जागृत हो जाना है।

मकर राशि में सूर्य का प्रवेश, एक नया संदेश लाता है।

जड़ता छोड़कर चेतन की ओर, जीव का मार्ग बनाता है।

अंबर में उड़ती पतंगें,

मन की ऊँची उड़ान हैं,

पर डोर अगर प्रभु हाथ हो, तो ही जीवन महान है।

जैसे पतंग काटती है हवा को, ऊँचाइयों को पाने को,

वैसे ही ज्ञान काटता है भ्रम को, सत्य को पहचानने को।

यह देह एक पतंग है कच्ची, श्वासों की पतली डोर है,

लक्ष्य रहे बस उर्ध्वगामी, जहाँ शांति का ओर-छोर है।

तिल-गुड़ की मिठास में, अहंकार को घोल दें,

प्रेम की भाषा अपनाकर, मन के कपाट खोल दें।

आज दान का महापर्व है, स्वयं को अर्पण करना सीखें,

बाहर के सूर्य के साथ-साथ, अंतर्मन में उतरना सीखें।

उत्तरायण: भीतर का सूर्योदय 

मकर संक्रांति का अर्थ

मकर संक्रांति केवल ऋतु परिवर्तन का पर्व नहीं है, यह मनुष्य के भीतर घटित होने वाले परिवर्तन का प्रतीक भी है। अहमदाबाद (गुजरात) की डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’ की कविता “उत्तरायण: भीतर का सूर्योदय” इस पर्व को बाह्य आडंबर से निकालकर आत्मिक चेतना के स्तर पर स्थापित करती है। कविता का आरंभ ही एक स्पष्ट संदेश देता है— अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का साहस। दक्षिणायन की निद्रा त्यागकर उत्तरायण की जागृति में प्रवेश करना, दरअसल जड़ता छोड़कर चेतन जीवन को अपनाने का आह्वान है।

सूर्य का मकर राशि में प्रवेश भारतीय सांस्कृतिक चेतना में शुभ परिवर्तन का संकेत माना गया है। कवयित्री इसे केवल खगोलीय घटना नहीं रहने देतीं, बल्कि इसे जीवन-दृष्टि से जोड़ देती हैं। जब सूर्य उत्तरायण होता है, तब मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह भी अपने भीतर के आलस्य, भ्रम और अहंकार से ऊपर उठे। कविता में पतंग का सुंदर प्रतीक इस बात को रेखांकित करता है कि ऊँचाइयाँ वही छू सकता है जिसकी डोर किसी उच्च सत्ता—ईश्वर, सत्य या मूल्यों—के हाथ में हो।

पतंग जहाँ स्वतंत्र उड़ान का प्रतीक है, वहीं उसकी डोर अनुशासन और समर्पण की याद दिलाती है। जैसे पतंग हवा को काटकर ऊपर जाती है, वैसे ही ज्ञान भ्रम को काटकर सत्य तक पहुँचाता है। यह पंक्तियाँ मकर संक्रांति को आत्मविकास के पर्व के रूप में देखती हैं—जहाँ बाहरी उल्लास के साथ भीतर का परिष्कार भी आवश्यक है।

तिल-गुड़ की मिठास यहाँ केवल स्वाद तक सीमित नहीं रहती; वह सामाजिक और मानसिक कटुता को घोलने का संदेश बन जाती है। अहंकार को गलाकर प्रेम की भाषा अपनाना ही इस पर्व की सच्ची साधना है। दान-पुण्य की परंपरा को कवयित्री आत्मदान के स्तर तक ले जाती हैं—जहाँ व्यक्ति केवल वस्तुएँ नहीं, बल्कि अपना अहं, अपनी कठोरता और अपने पूर्वाग्रह भी त्यागने का संकल्प लेता है।

इस प्रकार, “उत्तरायण: भीतर का सूर्योदय” मकर संक्रांति को एक आध्यात्मिक यात्रा का रूप देती है। यह कविता हमें स्मरण कराती है कि बाहर का सूर्य तभी सार्थक है, जब भीतर भी प्रकाश उतरे। यही मकर संक्रांति का वास्तविक आकार है—उत्सव जो जीवन को ऊँचाइयों की ओर ले जाए, और मनुष्य को अधिक मानवीय, अधिक चेतन बना दे।

रचनाकार

डॉ दक्षा जोशी जी

पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति




टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

"मां की गोद से ऊंचाइयों तक — गिरिराज की आत्मकथा"

  मां की गोद से ऊंचाइयों तक  गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..."   यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा।   जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है।   मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।"  यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया।   लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...

દીપક પંડ્યા (ગાંધીનગર) - Updated 04.06.2026

મારી ભાવયાત્રા 64 નમસ્કાર … સ્નેહવંદન ! માનવ જીવનની આખીય દોડ પાછળ જો કોઈ એક જ આકાંક્ષા છુપાયેલી હોય, તો તે છે 'ખુશી'. સવારથી સાંજ સુધી માણસ જે કંઈ પણ કરે છે—પૈસા કમાય છે, સત્તા મેળવે છે, સંબંધો બાંધે છે—એ બધાની પાછળનો અંતિમ ઉદ્દેશ્ય માત્રને માત્ર સુખ અને આનંદની પ્રાપ્તિ જ હોય છે. પરંતુ આજના ભૌતિકવાદી યુગમાં માણસ ખુશીની વ્યાખ્યા ભૂલી ગયો છે. તે વિચારે છે કે મેળવવામાં, સંગ્રહ કરવામાં કે અન્ય પાસે અપેક્ષા રાખવામાં ખુશી છે. પણ સત્ય એનાથી તદ્દન વિપરીત છે. સાચી ખુશી આપવામાં છે, લેવા કે માંગવામાં નથી. આ સૃષ્ટિનો અપરંપાર નિયમ છે કે ખુશીની આપણે જેટલી લહાણી કરીશું, તેટલી જ તે આપણી પાસે વ્યાજ સાથે પાછી આવશે. જરા ઊંડાણથી વિચારીએ તો સમજાશે કે 'લેવું' અને 'માંગવું' એ ભિખારીપણું છે, જ્યારે 'આપવું' એ ખુદ અમીરી છે. જ્યારે આપણે કોઈની પાસે કંઈક માંગીએ છીએ, પછી ભલે તે વસ્તુ હોય, પ્રેમ હોય કે આદર હોય, ત્યારે આપણે આપણી જાતને ખાલી અનુભવીએ છીએ. માંગવામાં હંમેશા અપેક્ષા અને પરવશતા હોય છે. અને જ્યાં અપેક્ષાઓનો પહાડ હોય, ત્યાં ક્યારેય સાચો આનંદ હોઈ શકે નહીં. કારણ કે અપેક્ષા હંમેશા...

मन की बातें भाव भरी

🙏🌹🌹❤️❤️🙏 शुभ प्रभात जी🙏🌹❤️🙏 आपका दिन मंगलमय हो। ईश्वर आपकी हर मंगलकामना पूर्ण करें— वह जो हारे का सहारा है, जो टिमटिमाता जुगनू भी है और अथाह ऊर्जा से भरा तारा भी। जो घोर तिमिर में प्रकाश बनकर उभरता है, और उजाले में भी दिन को बहार देता है। वह जो आकार–निराकार दोनों रूपों में दुष्टों का संहारक है, जो दिशाहीन के लिए दिशासूचक यंत्र का पारा बन जाता है। जो निर्धन के दुःख–दरिद्रता का अंत है, और धनी के लिए पौ-बराहा। जिसके हम भी हैं और जो हमारा भी है। जो भूखे के लिए अन्न है और पशुओं के लिए चारा, जो पत्थर, पहाड़ और समूची धरा का आधार है। 🌹 वह सबका भला करें🌹 🙏🌹🌹❤️❤️🙏 आज का विचार मेरी पुस्तक “हृदय उद्गार” से एक कविता — सर्व धर्म समभाव छिन्न-भिन्न सा हृदय मेरा, मन में तूफानी कोलाहल है। सभ्यता के शिखर पर पहुँचकर, धर्म बना क्यों क्रूर दावानल है? भूमि वही, आकाश वही, तुझमें वही, मुझमें वही। एक-सा ही सबका आंचल है, धरती माँ का पावन आँचल है। रक्त-कोष में बहता एक ही बल है, कहीं केसरिया, कहीं हरित दल है। आब पियो या पानी पियो, जल तो आखिर एक ही जल है। यह कैसा आया भेद-रूपी पल है? भिन्न-भिन्न नामों म...