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मकर संक्रांति : नवचेतना, मिठास और निर्माण का पर्व

मकर संक्रांति 

नवचेतना, मिठास और निर्माण का पर्व

मकर संक्रांति का आगमन होते ही प्रकृति और मन—दोनों में एक नई ऊर्जा का संचार हो जाता है। यह पर्व केवल एक तिथि या परंपरा नहीं, बल्कि जीवन में नवउमंग भरने, दिशा बदलने और आत्मिक परिष्कार का संदेश लेकर आता है। सूर्य का उत्तरायण होना जैसे यह संकेत देता है कि अब अंधकार से प्रकाश की ओर, शिथिलता से सक्रियता की ओर बढ़ने का समय है।

इस अवसर पर बसंत की आहट महसूस होने लगती है। खेतों में लहलहाती फसलें, खुले आकाश में रंग-बिरंगी पतंगें और घर-घर में तिल व गुड़ की मिठास—सब मिलकर जीवन को उल्लास से भर देते हैं। तिल और गुड़ केवल व्यंजन नहीं, बल्कि प्रतीक हैं। तिल हमें सिखाता है कि मध्यम आँच पर स्वयं को तपाकर भी अपनी पहचान बनाए रखें, जबकि गुड़ यह संदेश देता है कि जीवन की कठोरताओं के बीच भी वाणी और व्यवहार में मिठास बनाए रखना कितना आवश्यक है।

मकर संक्रांति नव प्रभात और नव निर्माण की चेतना का पर्व है। यह हमें प्रेरित करती है कि हम पुराने द्वेष, दुर्भावनाओं और नकारात्मकता को पावक में प्रवाहित कर दें, ताकि मन हल्का हो और दृष्टि निर्मल। यह समय है अपने सपनों को ऊँची उड़ान देने का, ठीक वैसे ही जैसे पतंग आकाश में निर्भय होकर उड़ती है। किंतु यह भी स्मरण रहे कि पतंग उसी के हाथ में हो, जिस पर भरोसा हो—यानी हमारे लक्ष्य विवेक और संयम के नियंत्रण में रहें।

यह पर्व रिश्तों में गर्माहट भरने का भी अवसर है। तिल की तरह संबंधों में ऊष्मा और गुड़ की तरह मिठास घोलकर हम एक-दूसरे के और करीब आ सकते हैं। रूबरू बैठकर संवाद करना, मन की गांठें खोलना और अपने आँचल से दूसरों के दुख हरने का संकल्प लेना—यही मकर संक्रांति का सच्चा भाव है।

अंततः मकर संक्रांति हमें सिखाती है कि ऊँचाई केवल आकाश में उड़ने से नहीं, बल्कि विचारों, आचरण और संवेदनाओं की शुद्धता से प्राप्त होती है। जब हम संयमित वाणी, उदार हृदय और सकारात्मक दृष्टि के साथ आगे बढ़ते हैं, तभी यह पर्व हमारे जीवन में सचमुच खुशियों की पतंग बनकर उड़ता है।

सूचना स्रोत 

श्रीमति प्रमिला त्रिवेदी जी की कविता पर आधारित

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 




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