भूमिका
विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर आयोजित यह वर्चुअल वेबिनार केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि हिंदी की वैश्विक यात्रा और प्रवासी भारतीयों की भावनात्मक सहभागिता का सजीव प्रमाण है। भारत से हजारों मील दूर बसे हिंदी प्रेमियों ने यह सिद्ध किया कि भाषा भूगोल की मोहताज नहीं होती, वह संस्कारों और स्मृतियों के सहारे पीढ़ियों तक जीवित रहती है। “हिंदी प्रेमी प्रवासी भारतीयों के साथ एक परिचर्चा” विषय पर केंद्रित यह संवाद हिंदी के प्रति उस आत्मीय लगाव को सामने लाता है, जो विदेशों में रहते हुए भी भारतीय चेतना को अक्षुण्ण बनाए रखता है। विभिन्न देशों से जुड़े विद्वानों, शिक्षाविदों और सामाजिक संस्थाओं की सहभागिता ने इस आयोजन को हिंदी के विस्तार, संरक्षण और भावी संभावनाओं पर गंभीर विमर्श का एक सशक्त मंच प्रदान किया, जो न केवल वर्तमान को समृद्ध करता है, बल्कि भविष्य के ऐसे प्रयासों के लिए भी प्रेरणा बनता है।
आत्मकथ्य : डॉ. सतीश कुमार शास्त्री
हिंदी मेरे लिए केवल एक भाषा नहीं, बल्कि वह सांस्कृतिक सेतु है जो देश, काल और सीमाओं से परे जाकर मनुष्यों को जोड़ता है। जब हम विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर प्रवासी भारतीयों के साथ संवाद स्थापित करते हैं, तो यह अनुभव और भी गहरा हो जाता है कि हिंदी केवल भारत में ही नहीं, बल्कि विश्व के कोने-कोने में धड़क रही है।
10 जनवरी 2026 को आयोजित “हिंदी प्रेमी प्रवासी भारतीयों के साथ एक परिचर्चा” मेरे लिए एक आयोजन मात्र नहीं था, बल्कि एक संकल्प का साकार रूप था—यह सिद्ध करने का कि जहाँ भी भारतीय मन है, वहाँ हिंदी का संस्कार जीवित है। नार्वे, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, मॉरीशस, सूरीनाम और श्रीलंका से जुड़े विद्वानों, विदुषियों और हिंदी अनुरागियों की उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि मातृभाषा का प्रेम दूरी से कम नहीं होता, बल्कि कई बार प्रवास में और अधिक प्रखर हो उठता है।
कार्यक्रम की शुरुआत कुलपति प्रो. मनीष पांडेय के कहानी-पाठ से हुई—जो यह बताता है कि हिंदी की कथात्मक परंपरा आज भी वैश्विक श्रोताओं को समान भाव से बाँध सकती है।
अध्यक्षता कर रहे प्रो. यशवीर सिंह विभागाध्यक्ष, लाल बहादुर शास्त्री विद्यापीठ नई दिल्ली जो कि संस्कृत भाषा के उद्भट विद्वान हैं, उनके मार्गदर्शन ने आयोजन को वैचारिक गरिमा प्रदान की। वहीं डॉ. राकेश राणा द्वारा प्रस्तुत विचारों ने यह रेखांकित किया कि हिंदी के विस्तार और विकास में प्रवासी भारतीय केवल सहभागी नहीं, बल्कि सक्रिय वाहक हैं।
इस वैश्विक संवाद को संभव बनाने में सामुदायिक रेडियो F.R.C.S. के अध्यक्ष बी.के. यशवंत पाटिल जी और F.R.C.S. के महासचिव डॉ. डी.पी. सिंह का सहयोग और मार्गदर्शन मेरे लिए प्रेरणास्रोत रहा। यह आयोजन सामूहिक प्रयास का उदाहरण था—जहाँ संस्थान, विद्वान और संवेदनशील नागरिक एक साझा उद्देश्य के लिए एकत्र हुए।
मेरा यह विश्वास और भी दृढ़ हुआ है कि यदि हम हिंदी को प्रेम, संवाद और सम्मान के साथ प्रस्तुत करें, तो वह स्वयं रास्ते बना लेती है। भविष्य में ऐसे प्रयासों की निरंतरता ही हिंदी को वैश्विक चेतना की भाषा बना सकती है। मैं चाहता हूँ कि यह पहल केवल एक आयोजन बनकर न रहे, बल्कि अन्य लोगों को भी प्रेरित करे कि वे अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार हिंदी को वैश्विक पटल पर प्रतिष्ठित करने के लिए आगे आएँ।
हिंदी जब वाणी से उतरकर हृदय में बसती है, तब वह सीमाएँ नहीं देखती—वह केवल संबंध बनाती है। यही *विश्व हिंदी दिवस* की सच्ची महत्ता है, और यही मेरे प्रयासों की प्रेरणा।
निमंत्रण
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