दस मिनट की डिलीवरी का विश्वास दिलाने में शून्य होती संवेदना
आज का समाज सुविधा के अभूतपूर्व दौर से गुजर रहा है। तकनीक ने जीवन को तेज़, सरल और सुगम बनाया है। मोबाइल पर एक बटन दबाते ही भोजन, दवा, किराना—सब कुछ दरवाज़े तक पहुँच जाता है। दस मिनट में डिलीवरी जैसे वाक्य अब विज्ञापन नहीं, हमारी अपेक्षाओं का मानक बन चुके हैं। किंतु प्रश्न यह है कि
"क्या इस तीव्रता की कीमत हम अपनी संवेदनशीलता खोकर चुका रहे हैं?"
हाल ही में सोशल मीडिया पर प्रसारित एक साधारण-सा अनुभव इस प्रश्न को गहरे स्तर पर उभारता है। एक डिलीवरी में कुछ मिनट की देरी, दरवाज़े पर खड़ा एक थका हुआ युवक और एक साधारण-सा सवाल—“सब ठीक है?”।
डिलीवरी बॉय शीघ्रता में (गूगल से साभार)
सफल डिलीवरी का उत्साह (गूगल से साभार)यह प्रसंग असाधारण नहीं, बल्कि हमारे समय की सामान्य सच्चाई है। समस्या देरी की नहीं, समस्या हमारी प्रतिक्रिया की है। आज हम देरी को परिस्थितियों से नहीं, व्यक्ति की नीयत से जोड़कर देखते हैं। परिणामस्वरूप गुस्सा, शिकायत, रेटिंग गिराना और ऑर्डर रद्द करना हमारी सहज प्रतिक्रिया बन चुकी है। हम यह भूल जाते हैं कि स्क्रीन के उस पार कोई मशीन नहीं, एक इंसान काम कर रहा है।
इसी संवेदनहीन मानसिकता का एक अधिक क्रूर और चिंताजनक रूप हालिया नोएडा के युवराज घटनाक्रम के रूप में सामने आया। वहाँ भी शक्ति, सुविधा और सामाजिक हैसियत के मद में मानवीय मर्यादाओं को ताक पर रख दिया गया। यह घटना किसी एक व्यक्ति का अपराध भर नहीं, बल्कि उस सोच का परिणाम है जिसमें सेवा करने वाला व्यक्ति सम्मान का अधिकारी नहीं माना जाता।
संवेदनहीनता का शिकार युवा (गूगल से साभार)आज समाज दो हिस्सों में बँटता दिखाई देता है—एक वह जो सुविधा प्राप्त करता है और दूसरा वह जो सुविधा उपलब्ध कराता है। दुर्भाग्यवश, इन दोनों के बीच केवल दूरी नहीं, बल्कि संवेदनाओं का एक जटिल द्वंद्व भी खड़ा हो गया है। जहाँ एक ओर सुविधा प्राप्त करने वाला वर्ग अपेक्षाओं की अति में मानवीय सहनशीलता खोता जा रहा है, वहीं सुविधा उपलब्ध कराने वाला वर्ग भी लगातार दबाव, भय और असुरक्षा के बीच कभी कृत्रिम विनम्रता तो कभी भीतर ही भीतर पनपते आक्रोश के साथ जीने को विवश है।
आज देरी को अपराध, मजबूरी को बहाना और विनम्रता को कमजोरी समझा जाने लगा है, पर यह सोच दोनों ओर समान रूप से विकृत हो रही है। सेवा लेने वाला अक्सर अधिकार के आवरण में संवेदनहीन हो जाता है, तो सेवा देने वाला अपनी नौकरी और आजीविका के डर में भावनाओं को छिपाकर मुस्कान ओढ़ लेता है। यही छद्म भाव धीरे-धीरे वास्तविक संवेदना को खोखला करता है और दोनों पक्षों के बीच अविश्वास, तनाव और टकराव को जन्म देता है।
इस द्वंद्व का परिणाम यह है कि संवाद समाप्त हो जाता है और अनुमान शुरू हो जाते हैं। कोई यह नहीं पूछता कि सामने वाला क्या महसूस कर रहा है, बल्कि यह मान लिया जाता है कि या तो वह लापरवाह है, या फिर अत्यधिक भावुकता का प्रदर्शन कर रहा है। जबकि सच्चाई यह है कि दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी भूमिकाओं में दबे हुए इंसान हैं—एक सुविधा के बोझ से, दूसरा ज़िम्मेदारियों के भार से।
यह चिंतन का विषय है कि क्या हम उपभोक्ता बनते-बनते नागरिक होना भूलते जा रहे हैं? क्या हमारी व्यस्तता हमें इतना असंवेदनशील बना चुकी है कि सामने खड़े व्यक्ति की आँखों में झाँकने का समय भी नहीं बचा?
समाज सभ्यता की ओर तभी बढ़ता है जब वह सुविधाओं के साथ-साथ संवेदनाओं को भी महत्व देता है। हर देर लापरवाही नहीं होती और हर खामोशी अकर्मण्यता नहीं। कई बार लोग अपनी पीड़ा, अपने डर और अपने सपनों को दबाकर दूसरों की अपेक्षाएँ पूरी कर रहे होते हैं।
इसलिए आवश्यकता है कि हम अपनी प्रतिक्रियाओं पर पुनर्विचार करें। अगली बार यदि कोई सेवा प्रदाता कुछ मिनट देर से पहुँचे, तो गुस्सा करने से पहले कारण जानने का प्रयास करें। एक प्रश्न—“सब ठीक है?”—कभी-कभी किसी को टूटने से बचा सकता है।
क्योंकि हम ग्राहक ज़रूर हैं,
पर उससे पहले इंसान हैं।
और सामने खड़ा व्यक्ति भी—इंसान ही है।
कल्पनाकार
प्रस्तुति





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