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वृत्तांत जो घटा नहीं, और! जो स्मृति बने और नज़ीर भी

भूमिका

यह सार है गतिविधि विशेष का जनजागरूकता के ध्येय से आरंभ किया गया था उन विशिष्ट कोटि के प्रयासों को पाठकों के सम्मुख रख ऐसे प्रयासों को प्रचुरता से और भी आगे बढ़ाने का।

वृत्तांत जो घटा नहीं, पर विशेष स्मृति और नज़ीर बन गया

यह प्रसंग एक ऐसी स्मृति के रूप में उभरता है, जहाँ संवाद केवल शब्दों का आदान–प्रदान नहीं था, बल्कि दृष्टिकोणों के बीच सेतु बनाने का एक ईमानदार प्रयास था। एक शिक्षाविद् से विमर्श चल रहा था—संवेदनशील, सजग और स्वाभाविक जिज्ञासाओं से भरा हुआ। विषय था एक प्रस्तावित पवित्र प्रयास, जिसमें स्नातक स्तर के शिक्षालय के विद्यार्थियों को पद्मश्री विजेताओं से जोड़ने का विचार निहित था। उद्देश्य स्पष्ट था—विद्यार्थियों को केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन, साधना, संघर्ष और समाज-सेवा से उपजे अनुभवों से रूबरू कराना।

विमर्श के दौरान शिक्षाविद् की कुछ शंकाएँ उभरना स्वाभाविक था। विशेष रूप से ‘उलझन सुलझन’ टीम की भूमिका को लेकर उनके मन में यह प्रश्न था कि यह टीम केवल संयोजक की भूमिका में होगी या विचारधारा और प्रस्तुति पर भी उसका प्रभाव रहेगा। यह आशंका किसी अविश्वास से नहीं, बल्कि अकादमिक स्वायत्तता और विद्यार्थियों के हित को लेकर थी। यही वह क्षण था जहाँ संवाद की सार्थकता परख में आई।

टीम प्रतिनिधि द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण किसी औपचारिक उत्तर जैसा नहीं था, बल्कि उद्देश्य की आत्मा से निकला हुआ था। यह स्पष्ट किया गया कि टीम की भूमिका केवल सेतु की है—न तो मंच को नियंत्रित करना, न विचारों को ढालना, बल्कि उन व्यक्तित्वों और विद्यार्थियों के बीच सहज संवाद का मार्ग प्रशस्त करना, जिनकी जीवन-यात्रा स्वयं एक चलती हुई पाठशाला है। यह भी रेखांकित किया गया कि पद्मश्री विजेता किसी विचारधारा के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि कर्म, साधना और समाज के प्रति उत्तरदायित्व के सजीव उदाहरण हैं।

इस स्पष्टीकरण के बाद शिक्षाविद् की आशंकाएँ लगभग क्षण भर में शांत हो गईं। विमर्श में वह सहजता लौट आई, जो विश्वास से जन्म लेती है। उद्देश्य स्पष्ट था, नीयत पारदर्शी थी और प्रक्रिया सम्मानजनक। सब कुछ जैसे अपने स्थान पर आ गया। परंतु जीवन केवल समझ से नहीं चलता, उसकी अपनी व्यावहारिक सीमाएँ भी होती हैं। प्रस्तावक के समक्ष स्वीकार करने वाले शिक्षण संस्थानों और मंचों की लंबी श्रृंखला पहले से मौजूद थी, जिसके कारण यह विशेष कार्यक्रम साकार न हो सका।

फिर भी यह स्मृति किसी असफल प्रयास की नहीं, बल्कि एक सफल संवाद की है। यह याद दिलाती है कि हर सार्थक पहल का मूल्य केवल उसके आयोजन में नहीं, बल्कि उस विमर्श में भी होता है, जो सोच को स्पष्ट करता है और आशंकाओं को सम्मानपूर्वक सुलझाता है। कभी-कभी किसी कार्यक्रम का न हो पाना भी उस उद्देश्य की पवित्रता को कम नहीं करता, बल्कि यह दिखा देता है कि विचार सही दिशा में हैं और समय के अपने निर्णय होते हैं। यही स्मृति इस प्रयास को एक अधूरे आयोजन से ऊपर उठाकर एक पूर्ण अनुभव बना देती है।

वो स्मृतियाँ जो निरन्तर उत्साहित करती हैं

इस स्मृति-संग्रह का यह भाग उन प्रयासों को सहेजने का है, जो न केवल सफल रहे, बल्कि जिनसे जुड़ी अनुभूतियाँ आज भी मन को आश्वस्त करती हैं कि यदि भाव पवित्र हों और उद्देश्य व्यापक, तो रास्ते स्वयं बनते चले जाते हैं। ये वे क्षण हैं जहाँ विचार केवल काग़ज़ पर नहीं रहे, बल्कि विद्यार्थियों, शिक्षकों, ग्रामीणों और समाज के बीच जीवंत संवाद बनकर उतरे।

इस क्रम में सबसे पहले स्मरण आता है राष्ट्रीय इंटर कॉलेज, नूरनगर, लिसाड़ी रोड, मेरठ का, जहाँ प्रधानाचार्य श्री संजीव नागर जी ने प्रस्ताव की आत्मा को समझते हुए उसे औपचारिक स्वीकृति से कहीं आगे ले जाने का साहस दिखाया। उन्होंने टीम ‘उलझन सुलझन’ के प्रयास पर विद्यालय की उपलब्धियों को समेटते हुए चार पृष्ठीय पत्रक हम होंगे कामयाब सृजित करने का निर्णय लिया और साथ ही भविष्य में एक व्यापक कार्यक्रम आयोजित करने की सहमति दी।


उसी कार्यक्रम में वर्ष 2022 के पद्मश्री सम्मानित श्री सेठपाल सिंह, पूसा विश्वविद्यालय के शिक्षाविद् श्री विपिन परमार तथा वायुसेना से सेवानिवृत्त, अनुभवों से समृद्ध श्री बिजेंद्र सिंह का विद्यार्थियों से सजीव संवाद हुआ। करतल ध्वनि के मध्य जीवन स्वयं गढ़ने की सीख दी गई और यह अनुभव दृढ़ हुआ कि नई कोंपलों के समान विद्यार्थी सदैव सीखने को तत्पर रहते हैं।

इसी यात्रा में नारायण विद्यापीठ, मंडौरा के सृजक और सैन्य अधिकारी श्री नारायण सिंह से मिला उत्साह एक मजबूत संबल बनकर उभरा। उनके विद्यालय में टीम ‘उलझन सुलझन’ के प्रस्ताव पर तीन-चार बार अंतर्संबंध स्थापित हुआ। एक अवसर पर निवर्तमान प्रधानाचार्य श्री देशराज सिंह और मोटिवेटर श्री सत्यवीर सिंह के साथ मिलकर विद्यार्थियों को जीवन-निर्माण की दिशा में प्रेरित किया गया।


इसके पश्चात केंद्रीय सेवा से सेवानिवृत्त अधिकारी, नेशनल बुक ट्रस्ट के नियमित लेखक और प्रशिक्षक श्री महिपाल को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया। विद्यार्थियों की ग्रामीण परिवेश में की गई प्रस्तुति देखकर श्री महिपाल भावुक हो उठे और मंच से विद्यालय की तैयारियों को और बेहतर बनाने हेतु दस हज़ार रुपये देने की घोषणा की, जिसे श्री नारायण सिंह ने यह कहते हुए विनम्रता से अस्वीकार कर दिया कि यह व्यवस्था विद्यालय स्वयं करेगा। संचार से उत्पन्न भ्रांतियों को दस बालकों के माध्यम से जब श्री महिपाल ने जीवंत रूप में प्रस्तुत किया, तो ग्रामीण समुदाय हतप्रभ रह गया और बार-बार उन्हें आमंत्रित करने की गुहार करने लगा।

इसी कड़ी में पद्मश्री श्री सेठपाल सिंह का ग्रामीणों से अंतर्संबंध स्थापित होना भी एक स्मरणीय उपलब्धि रहा, जहाँ विद्यालय परिसर में ग्राम के गणमान्य नागरिकों से उनका संवाद हुआ। इन सभी प्रयासों ने टीम ‘उलझन सुलझन’ को मानव मन को समझने और समाज से जुड़ने के नए आयाम दिए।

सरधना ब्लॉक के ग्राम कपसाड़ स्थित इंटर कॉलेज में प्रधानाचार्य श्री घनश्याम जी के सहयोग से निवर्तमान प्रधानाचार्य श्री देशराज सिंह और मोटिवेटर श्री सत्यपाल सिंह का विद्यार्थियों से संवाद भी इसी श्रृंखला का एक सशक्त उदाहरण रहा। 

हाल ही में मेरठ से यूपीएससी परीक्षा में राष्ट्रीय स्तर पर शीर्ष स्थान प्राप्त करने वाली कशिश को जड़ौदा स्थित होली चाइल्ड इंटर कॉलेज में आमंत्रित किया गया, जहाँ प्रधानाचार्य श्री प्रवेंद्र दहिया ने उन्हें सम्मानित कर विद्यार्थियों को प्रेरणा देने का अवसर सृजित किया।

इन सभी स्मृतियों को सहेजने का उद्देश्य केवल घटनाओं का लेखा-जोखा रखना नहीं, अपितु यह रेखांकित करना है कि जब भाव पवित्र हों और प्रस्ताव से समाज का व्यापक हित जुड़ा हो, तो आयोजक, प्रतिभागी और प्रस्तावक—तीनों में आशा का संचार होता है। भले ही कोई प्रयास साकार न हो पाया हो, पर समझा पाने में टीम 'उलझन सुलझन' हर बार सफल हुई। और! समस्त प्रयास यह भरोसा देकर गए कि ऐसी पहलें कभी व्यर्थ नहीं जातीं। इन्हीं स्मृतियों में वह शक्ति निहित है, जो भविष्य में किसी भी मन में निराशा को पनपने नहीं देती, बल्कि आगे बढ़ने का साहस देती है।

विशिष्ट कोटि के अवसर


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