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'आज़ाद हिन्द सरकार' का स्थापना-दिवस (21 अक्तूबर)

भूमिका

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का एक कथन है कि

"कवियों को इतना आदर-मान इसलिए दिया जाता है क्योंकि वे हमारे अंतरंग से अंतरंग विचारों को हमारी अपेक्षा ज्यादा अच्छे और सुस्पष्ट ढंग से कह सकते हैं ।" 

मेजर (डॉ०) देशराज सिंह द्वारा प्रस्तुत रचना का स्पष्टीकरण

यह रचना 'आज़ाद हिन्द सरकार' के स्थापना दिवस, 21 अक्तूबर 1943 को दिए गए नेता जी के भाषण पर आधारित है। 

नेताजी द्वारा स्थापित 'आज़ाद हिन्द सरकार' का स्थापना दिवस

मेजर  (डॉ०) देशराज सिंह

                  (पी-एच.डी.) 

सब  पर्वों  से  महान  पर्व, इक्कीस  अक्तूबर  को  मानो। 

महान  पर्व  है  यही  राष्ट्र  का, इसकी महिमा को जानो। 

यह वह दिन है, जिस दिन नेताजी ने बिगुल बजाया था। 

उसी  बिगुल  को  सुनकर, अंग्रेज़ी  शासन  थर्राया  था॥


इक्कीस अक्तूबर, उन्नीस सौ तैंतालीस की पावन। 

जगा दिया सम्पूर्ण एशिया, लगा दिया पावन मेला। 

इस दिन नेताजी ने खुद अंग्रेजों को ललकारा था ।

 दिल्ली चलो ! चलो दिल्ली। ये नेताजी का नारा था ।


नेताजी की 'आज़ाद हिन्द सरकार' बनाने वाला दिन। 

नेताजी के सपनों को, साकार कराने वाला दिन । 

भारत की आज़ादी का, आधार बनाने वाला दिन । 

सही रूप में भारत का, उद्धार कराने वाला दिन ।।


सदियों से सोए भारत को, पुनः जगाने वाला दिन । 

सही रूप में भारत की, शक्ति दर्शाने वाला दिन । 

बारूदी ब्रिटिश शासन में, आग लगाने वाला दिन । 

बलिदानी वीरों की गाथा, याद दिलाने वाला दिन ॥


यह वह दिन है, जिस दिन नेता जी खुलकर ललकारे थे ।

आजाद हिन्द, जयहिन्द, हिन्द के, गूंज रहे जयकारे थे । 

सिंगापुर के सम्मेलन में, नेताजी खुद आए थे । 

रास बिहारी बोस, चटर्जी, स्वागत को हर्षाए थे ॥


चढ़े मंच पर नेताजी, अपने सपने सच करने को । 

उदित हुआ पूरब में सूरज, तिमिर विश्व का हरने को । 

देख रहे थे मन्त्र मुग्ध हो, नेताजी को लाखों श्रोता ।

साफ नजर आता था सबको, अपना ही सपना सच होता ॥


भारत की हिन्दी भाषा को, 'हिन्दुस्तानी' नाम दिया । 

नेताजी ने हिन्दी में ही, अपना भाषण शुरु किया ।

आज़ाद हिन्द सरकार बनाकर, शपथ ग्रहण का दौर चला ।

भावुक हुए, हुए विह्वल, आवाज हंधी, रुंध गया गला ॥


अन्तर्मन की गहराई से, इतना भावावेश बढ़ा।

ये शपथ पत्र नेताजी ने, हिन्दी भाषा में स्वयं पढ़ा।

"स्वयं साक्षी कर ईश्वर को, मैं ये शपथ उठाता हूं।

अपनी अड़तीस कोटि जनता को, मैं विश्वास दिलाता हूं ॥


जिस स्वतन्त्रता की पुनीत लड़ाई की है मेरी तैयारी ।

जीवन के अन्तिम क्षण तक, मैं रखूंगा उसको जारी"। 

भावावेग बढ़ा इतना, मानो वे रोने वाले थे।

छलछला उठीं सबकी आँखें, सब धीरज खोने वाले थे॥


वाणी गंभीर हुई उनकी, मानो अब सिंह गरजता हो । 

ऐसे बोले, मानो बाजा, कहीं चर्च में बजता हो ।

"हिन्दुस्तानी बहिन-भाइयों का ही, सेवक सदा रहूंगा मैं । 

अड़तीस कोटि के कल्याण-क्षेम की, रक्षा सदा करूंगा मैं । 


अपना प्रण पालन करना ही मेरा महान कर्म होगा । 

स्वतन्त्रता की रक्षा ही अब मेरा महान धर्म होगा" ।।


व्यक्तिगत स्वर से हर श्रोता, ये ही शपथ उठाता था । 

बना साक्षी ईशवर को बस यही वाक्य दोहराता था । 

"पूरी तरह वफादारी से, यही शपथ मैं लेता हूं ।

सर्वस्व समर्पित करने का मैं वचन आपको देता हूं" ।


शपथ समारोह पूर्ण हुआ, नेताजी के उद्बोधन से । 

मूर्त रूप इतिहास बना, उद्बोधन के अनुमोदन से । 

दस्तावेज कहो इसको या कहो धरोहर भारत की । 

तस्वीर पेश है नेताजी की, पावन अमर इबारत की ।।


"सत्रह सौ सत्तावन में, बंगाल राज्य में, अंग्रेज़ों से पहली हार हुई ।

 हारा कभी नहीं था भारत, वही पराजय केवल पहली बार हुई । 

फिर युद्धों का दौर चला, वह दौर अभी तक जारी है । 

बलिदानी अमर शहीदों की, भारत माता बलिहारी है ॥


अनगिन बलिदानी वीरों ने यहां अपने प्राण गवाएं हैं । 

अदम्य वीरता, बलिदानों के, अनन्य उदाहरण आए हैं । 

नाम स्मरण मात्र से ही, इतिहास सामने आता है ।

उनके बल पर ही भारत, अब तक भारत कहलाता है ।।


कुछ बलिदानी वीरों के, मैं पहले नाम गिनाऊंगा । 

उनके द्वारा प्रेरित पथ, सबको अपनाना चाहूंगा । 

सिराजुद्दौला बंगाल प्रान्त में मोहनलाल जैसे इन्सान ।

दक्षिण भारत में हैदरअली और साथ टीपू सुल्तानः ।॥


वेलू थम्पी महाराष्ट्र में अप्पा साहब भौंसले वीर । 

बाजीराव पेशवा साथी और अवध में बेगम पीर । 

अमर अटारी वाला है सरदार श्यामसिंह से बलिदानी । 

और अन्त में लक्ष्मीबाई महान हुई झांसी की रानी ॥


महाराज डुमराव-कुंवरसिंह, वीर तांतिया टोपे को । 

कभी नहीं भूलेगा भारत नाना साहिब के तोहफे को । 

पूर्वजों ने अंग्रेज़ों को दुश्मन नहीं विचारा था । 

वे समझ न पाए दुश्मन को ये ही दुर्भाग्य हमारा था ॥


अंग्रेज़ों के छल-झूठ-कपट से नहीं पूर्वज परिचित थे । 

कूटनीति की साजिश से वे पूरी तरह अपरिचित थे । 

संयुक्त मोर्चा बना न पाए, इसी लिए हिन्दुस्तानी । 

खतरनाक अंग्रेज़ कौम ने लूट मचाई मनमानी ॥


बुरी तरह लूटा सबको, छल झूठ कपट बेइमानी से । 

लुटते रहे पूर्वज अपने, अपनी ही नादानी से । 

देश दुःखी हो गया निरन्तर बढ़ते अत्याचारों से ।

शाह जफ़र जागे निद्रा से, बालों की सरदारों में॥


उनके झंडे के नीचे भारत ने अन्तिम युद्ध लड़ा ।

मगर पाश्विकता के आगे उसको झुकना पुनः पड़ा । 

शस्त्रहीन कर दिया देश, जालिम अंग्रेजी शासन ने । 

आतंक-दमन-अत्याचारी अंग्रेज़ों के प्रशासन ने ॥


बिना शस्त्र लड़ते कैसे, भारतवासी लाचार रहे । 

हम अठ्ठारह सौ पिच्चासी तक सहते अत्याचार रहे । 

विद्रोही स्वर के कारण तब कांग्रेस का जन्म हुआ । 

बलिदानी वीरों के बल पर पुनः देश का जन्म हुआ ॥


कांग्रेस बन गई माध्यम, भारत को स्वर देने का । 

मिला सभी को अवसर, अग्रेज़ों से बदला लेने का । 

सोया राष्ट्र जगे कैसे, ये कांग्रेस ने फिक्र किया ।

अपनी खोई आज़ादी, वापस लेने का जिक्र किया ॥


सब संभव तौर-तरीके हमने, अपनाए आज़ादी के । 

बहिष्कार प्रचार और आन्दोलन, अपनाए आज़ादी के ।

तोड़-फोड़-आंतक, अन्त में, सशस्त्र क्रान्ति भी अजमाई । 

लेकिन प्रथम विश्व युद्ध तक नहीं सफलता कुछ पाई ॥


विश्व युद्ध के बाद गुलामी से छा गई निराशा थी ।

हो गई व्यर्थ सारी मेहनत, नहीं शेष कुछ आशा थी । 

'दिशाहीन था देश, देश में घोर अंधेरा छाया था ।

उसी समय गांधी जी ने, भारत को पुनः जगाया था ॥


सविनय अवज्ञा आन्दोलन, असहयोग नए हथियार दिए ।

मांझी बनकर उतरे गांधी बिना पोत-पतवार लिए । 

नई चेतना जगी राष्ट्र में, आज़ादी के पाने को । 

संगठित राष्ट्र हो गया पुनः भारत को मुक्त कराने को ॥


लक्ष्य-प्राप्ति हेतु मुकाबला किया विदेशी शासन का । 

अवसर पाया कांग्रेस ने खुद अपने ही शासन का । 

सन् सैंतीस से उन्तालिस तक कांग्रेस परकार बनी । 

आठ राज्यों में भारत ने, दिखलाई क्षमता अपनी ॥


द्वितीय विश्व युद्ध से पहले, इस तरह देश तैयार हुआ । 

सही रूप में स्वतन्त्रता का, यही युद्ध आधार हुआ । 

लूटपाट-भूखमरी, मौत, सब अंग्रेज़ों के कारण थी ।

अंग्रेज़ों ने कभी नहीं सोची दुर्दशा निवारण की ॥


अब अंग्रेज़ी राज्य देश में कभी नहीं रह पायेगा । 

अन्तिम तस्मा अंग्रेज़ों का जल्दी तोड़ा जायेगा । 

मैं बारूदी ब्रिटिश शासन में, चिगारी सुलगाऊंगा ।

अब हिन्दुसतानी सेना से मैं स्वयं आग लगवाऊंगा ॥ 


साफ नजर आता है मुझको आजादी का पावन प्रभात ।

हम स्थायी सरकार बनाकर चलें एक झंडे के साथ ।

अब अपने झंडे के नीचे संघर्ष छेड़ना होगा । 

तत्काल देश से अंग्रेज़ों को बाहर खदेड़ना होगा ।


अन्तिम निर्णायक युद्ध हमें अब लड़ना है आज़ादी का ।

दुश्मन दृश्य स्वयं देखेगा अपनी ही बर्वादी का । 

अंग्रेज़ और उनके हमदर्दों को हमने ललकारा है।

उनके सर्वनाश का ही ये अन्तिम युद्ध हमारा है ।।


बेशक बाधा है पथ में, नेता भारत में बाहर नहीं है । 

बन्द पड़े हैं जेलों में सब, लोगों पर हथियार नहीं हैं। 

आज़ाद हिन्द संघ ही अब, अपना कर्त्तव्य निभायेगी । 

दक्षिण-पूर्व एशिया में, अन्तरिम सरकार चलायेगी ।।


'आज़ाद हिन्द सरकार' बनाकार, करते हैं हम ये आह्वान । 

साथ निभाए वफादार बन, इसका पूरा हिन्दुस्तान । 

धर्म-कर्म की स्वतन्त्रता से, सबको समता का अधिकार । 

सबको अवसर-अधिकारों की, गारंटी देगी सरकार ।।


सुख-समृद्धि हेतु राष्ट्र की, होंगे सारे ही प्रयास । 

समस्त राष्ट्र की सन्तानों को देगी ये पूरा विश्वास । 

धूर्त शत्रु की चालाकी को कभी न चलने देंगे । 

मतभेदों की परम्परा को कभी न पलने देंगे ॥


ईश्वर और बुजुर्गों में उन बलिदानी वीरों के नाम । 

भारत की वर्तमान पीढ़ी का सबसे महान यही है काम । 

पूरा भारत आज इसी झंडे के नीचे आ जाए । 

स्वतन्त्रता के लिए राष्ट्र में पूर्ण एकता आ जाए ॥


अन्तिम युद्ध लड़ेंगे अब हम, निश्चित होगी विजय हमारी । 

जब तक अंग्रेज नहीं भागेगा, तब तक जंग रहेगी जारी । 

अपनी बलिदानी परम्परा का, हम आदर्श निभायेंगे । 

विश्वास! एकता! कुर्बानी को हम आदर्श बनायेंगे"॥

रचनाकार

देशराज सिंह

ग्राम व डा० - फफून्डा (मेरठ) - 245 206

प्रतिष्ठा में

श्री मधुसूदन शर्मा (संयोजक, स्वर्ण जयन्ती समारोह) 25/9 सेन्ट्रल टाउन, जालंधर सिटी -144 001.





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