भूमिका
एक शिक्षक की सफलता केवल उसका व्यक्तिगत गौरव नहीं होती, बल्कि लेखक, प्रकाशक, संस्थान, विद्यार्थी और परिवार—सभी की संयुक्त साधना का परिणाम बनकर उभरती है। अनुदेशक देवेन्द्र कुमार का यह आत्मकथ्य भी उसी सामूहिक यात्रा की मार्मिक झलक प्रस्तुत करता है। अरिहन्त प्रकाशन, रिप्लीट एजुटैक, तकनीकी शिक्षा जगत और मेरठ की साहित्यिक-शैक्षिक विरासत—इन सबके बीच यह अनुभव एक सेतु की तरह जुड़ता है। राष्ट्रीय स्तर पर मिली उनकी उपलब्धि न केवल तकनीकी पुस्तकों की गुणवत्ता को प्रमाणित करती है, बल्कि उन सभी व्यक्तियों, संस्थानों और मूल्यों को भी रेखांकित करती है जिन्होंने इस उपलब्धि को संभव बनाया। यह आत्मकथ्य उस संवेदना को पाठकों तक पहुँचाता है जिसमें एक शिक्षक की मेहनत, एक लेखक की निष्ठा, और एक पिता की भावनाएँ एक साथ स्पंदित होती हैं।
देवेन्द्र कुमार का आत्मकथ्य
(उनकी अनुभूति, उन ही के शब्दों में)
“देवेंद्र कुमार ने छुआ परचम”
यह केवल एक समाचार शीर्षक नहीं था, यह मेरे जीवन का वह क्षण था जिसने मुझे भीतर तक उल्लास से भर दिया था। उस एक पंक्ति में मेरी बरसों की मेहनत, मेरे पिता के संस्कार, और मेरे विद्यार्थियों के लिए किया गया हर प्रयास जैसे आकार लेकर खड़ा हो गया।
25 जून 2014—आज भी मेरी स्मृतियों में साफ़ दर्ज है। उस दिन मुझे अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) द्वारा वर्ष 2013 के सर्वोत्तम मूल पाठ्य पुरस्कार (हिंदी भाषा) के पुरस्कार के लिए आमंत्रण मिला था। मेरी पुस्तक ‘तकनीकी आरेखन’, जो अरिहंत प्रकाशन और रिप्लीट एजुटैक के श्री राजीव वर्मा और श्री संजय वर्मा के सहयोग से तैयार हुई थी, राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी श्रेणी की सर्वोत्तम पुस्तक चुनी गई थी। यह केवल एक पुस्तक का चयन नहीं था—यह मेरे जीवन के पहले बड़े पड़ाव का उजाला था।
अरिहंत प्रकाशन की तकनीकी पुस्तकों के उस पहले लॉट में ही मेरी पुस्तक को सर्वोत्तम घोषित किया जाना मेरे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। मैं जानता हूँ कि यह केवल मेरा नहीं, बल्कि तीन इकाइयों—लेखक, प्रकाशक और निर्माणक—सभी की साझा उपलब्धि थी। परंतु सच कहूँ, इस उपलब्धि की जड़ में मेरे भीतर का वह शिक्षक था, जो हमेशा सावधानी, ईमानदारी और हर मापदण्ड़ को आत्मा की तरह मानकर चलता है।
पर इस पूरे उत्सव की वास्तविक स्मृति वह नहीं है जो मंच पर मिली, वह है जो घर पहुँचकर मिली—मेरे पिता की आँखों से झरती हुई खुशी।
जब मैं पुरस्कार लेकर घर लौटा, तो मेरे वयोवृद्ध पिता कुछ क्षणों तक मेरी ओर देखते ही रह गए। फिर उन्होंने काँपते हाथों से प्रमाणपत्र को छुआ, जैसे वह मेरे बजाय मेरी मेहनत को आशीष दे रहे हों। उनकी आँखें भर आईं… और मैं पहली बार समझ पाया कि किसी बेटे की उपलब्धि से पहले, वह पिता की जीवन भर की तपस्या बनकर चमकती है।
पिताश्री
उस क्षण मुझे लगा कि मेरी कलम के हर अक्षर में उनका त्याग था, मेरी हर सफलता की बुनियाद उनकी सादगी थी, और! मेरे हर सपने की नींव उनकी झुकी हुई पीठ।
आज भी जब उस पुरस्कार में मिले प्रशस्ति पत्र को देखता हूँ, तो मुझे मंच नहीं याद आता—
मुझे अपने पिता की वही भीगी आँखें याद आती हैं,
जो मेरे लिए आशीर्वाद बनकर सदैव साथ रहती हैं।
मेरे लिए यह पुरस्कार किसी सम्मान का अंत नहीं, बल्कि एक दायित्व की शुरुआत था। एक शिक्षक होने का दायित्व, एक लेखक होने की जिम्मेदारी, और पिता के विश्वास को और ऊँचा रखने की निरंतर प्रेरणा।
मैं देवेंद्र कुमार,
इस अनुभव को अपने जीवन की सबसे सरल, सबसे सच्ची और सबसे गौरवपूर्ण उपलब्धि मानता हूँ।
सूचना स्रोत
देवेंद्र कुमार
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति




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