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श्री दयाशंकर शर्मा का आत्मकथ्य

 श्री दयाशंकर शर्मा का आत्मकथ्य

(अखिल भारतीय कवि सम्मेलन की अविस्मरणीय अनुभूति)

मेरे लिए साहित्य केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन का एक संवेदनशील स्पंदन है। इसी विश्वास को और भी दृढ़ करने वाली एक विलक्षण अनुभूति मुझे तब प्राप्त हुई जब ललिता जी भोला के कुशल संयोजन में *भोला साहित्य एवं समाज सेवा संस्थान* के तत्वाधान में आयोजित भव्य *अखिल भारतीय कवि सम्मेलन* का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला।

देश के विभिन्न प्रांतों से पधारे वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित कवियों के बीच अपनी रचनाओं के साथ उपस्थित होना स्वयं में गर्व और विनम्रता का संगम था। कार्यक्रम का साहित्यिक वातावरण इतना ऊर्जावान और गरिमामय था कि हर पंक्ति, हर स्वर, हर भाव मानो नई ऊँचाइयों की ओर संकेत कर रहा था। मंच पर प्रस्तुत की गई उत्कृष्ट रचनाएँ केवल सुनाई ही नहीं दीं, बल्कि मन के भीतर उतरकर उसे और अधिक संवेदनशील बनाती चली गईं।

पूरे आयोजन की व्यवस्था इतनी सुव्यवस्थित और सुसंस्कृत थी कि एक सहभागी के रूप में मुझे न केवल आत्मीयता का अनुभव हुआ, बल्कि लगा कि साहित्य का यह उत्सव अपने वास्तविक रूप में साकार हो उठा है। विशेष रूप से ललिता जी द्वारा की गई भोजन व्यवस्था ने हम सभी आगंतुकों और कवियों के मन में एक अलग ही आत्मीयता और सम्मान का भाव उत्पन्न किया। उनकी सहजता और सत्कार–भाव ने मुझे गहराई से प्रभावित किया।

कार्यक्रम में सम्मान परंपरा का जो सुंदर निर्वाह हुआ, वह सचमुच अभिभूत कर देने वाला था। मणियों की माला, शॉल और स्मृति-चिह्नस्वरूप शील्ड—ये केवल सम्मान के प्रतीक नहीं थे, बल्कि उस स्नेह और आदर के प्रतिफल थे जो आयोजकों ने हम सभी के प्रति दर्शाया। इन्हें प्राप्त करते समय मेरे भीतर साहित्य–सेवा के प्रति एक नया उत्साह जागृत हुआ।

इस पूरे आयोजन ने मेरे मन में एक अद्वितीय और अमिट छाप छोड़ दी है। साहित्य, संस्कृति और सद्भाव का ऐसा संगम दुर्लभ होता है—और उसका साक्षी बनना मेरे लिए सौभाग्य से कम नहीं। मैं इस सृजन–उत्सव का हिस्सा बनकर स्वयं को समृद्ध महसूस करता हूँ और आयोजकों, विशेषकर ललिता जी भोला, के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ कि उन्होंने मुझे इस उत्कृष्ट मंच से जोड़ने का अवसर दिया।

यह अनुभव मेरे साहित्यिक जीवन की यादगार धरोहर बनकर सदैव मेरे साथ रहेगा।

सूचना स्रोत

श्री दयाशंकर शर्मा जी

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