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प्रधानाचार्य गिरिराज प्रसाद गुर्जर का आत्मकथ्य

भूमिका 

प्रधानाचार्य गिरिराज प्रसाद गुर्जर की यह आत्मकथ्यात्मक अभिव्यक्ति न केवल एक शिक्षाधिकारी के व्यक्तिगत अनुभवों का दस्तावेज़ है, बल्कि प्रदेश में शिक्षा के बदलते स्वरूप, नवाचारों और मूल्यों पर आधारित शिक्षण की दिशा में हुए व्यापक परिवर्तन का जीवंत प्रमाण भी है। हाल ही में आयोजित पीएम श्री विद्यालयों के प्रधानाचार्यों के आमुखीकरण कार्यशाला, शिक्षा मंत्री श्री मदन दिलावर जी के वक्तव्यों, संभागीय निरीक्षणों और राज्य की उपलब्धियों को समेटते हुए यह लेख शिक्षा-जगत में हो रहे सकारात्मक बदलावों की एक संवेदनशील झलक प्रस्तुत करता है। विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास, मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना और विद्यालयों में तकनीकी उन्नयन को एक शिक्षक की दृष्टि से देखने का यह प्रयास पाठकों को शिक्षा के नए परिवेश को समझने और उससे प्रेरणा लेने के लिए प्रेरित करता है।

प्रधानाचार्य गिरिराज प्रसाद गुर्जर का आत्मकथ्य

मैं गिरिराज प्रसाद गुर्जर, अपने विद्यालय का प्रधानाचार्य, आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे मानो शिक्षा के उस सफर की हर एक आहट महसूस होती है जो सिर्फ पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रहा — बल्कि चरित्र, मूल्यों और समाज के प्रति ज़िम्मेदारी तक फैला है। हाल के दिनों में जिस तरह हमारे राज्य ने शिक्षा के स्तर में लंबी छलांग लगाई है — पहले बारहवें स्थान से ऊपर उठकर तीसरे स्थान पर पहुँचना — उसने हमें गर्व और जिम्मेदारी दोनों से भर दिया है। यह सिर्फ अंक या रैंकिंग का मामला नहीं है; यह हमारी सरकार, हमारे शिक्षकों और उन बच्चों की कड़ी मेहनत और जज़्बे का प्रतिफल है जिनके अंदर हम बेहतर भविष्य संवारने का संकल्प देखते हैं।

मुझे याद है वह शनिवार जब मैं जिला मुख्यालय (टोंक) पर आयोजित पीएम श्री विद्यालयों के प्रधानाचार्यों के आमुखीकरण कार्यशाला में मुख्य अतिथि के समक्ष खड़ा था। शिक्षा एवं पंचायती राज मंत्री श्री मदन दिलावर जी की बातें दिल को छू लेने वाली थीं — उन्होंने स्पष्ट कहा कि शिक्षा केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों और चरित्र निर्माण की खिड़की भी है। एक शिक्षक के रूप में मैंने सदैव यही माना है कि हमें बच्चों को व्यवहारिक ज्ञान देना होगा — ताकि वे मात्र परीक्षा-उत्तीर्ण छात्र न बनकर जिम्मेदार नागरिक बनें। मंत्री जी के शब्दों ने मुझे और मेरे समकक्ष साथियों को यह याद दिलाया कि हमारा दायित्व है — प्रत्येक बच्चे में सर्वांगीण शिक्षा का विकास करना, ताकि वह जहाँ भी जाए, परिवार, समाज और देश का नाम रोशन करे।

कार्यशाला का आरम्भ मां शारदे की तस्वीर पर माल्यार्पण और 'वन्दे मातरम' के साथ हुआ — उस पवित्रता और उत्साह ने उस तीन दिवसीय कार्यक्रम के उद्देश्यों को स्पष्ट कर दिया था। कार्यशाला में उपस्थित माननीय मुख्य कार्यकारी अधिकारी परशुराम धानका, जिलाध्यक्ष चंद्रवीर सिंह चौहान, विशेषाधिकारी ओएसडी श्री सतीश गुप्ता, दक्ष प्रशिक्षक डॉ. एस.डी. चारण, बृजकिशोर शर्मा, कुमार संभव, सीडीईओ सुबे सिंह यादव, जिला शिक्षा अधिकारी श्री राजेश कुमार शर्मा तथा अजमेर और जयपुर से आए समस्त अधिकारीगण और मेरे साथी प्रधानाचार्य—इन सबके साथ चर्चा और विचार-विनिमय से मैंने अपने अनुभव और चुनौतियाँ साझा कीं। एडीपीसी राम गोपाल बलाई, एपीसी शिवप्रसाद मीणा, अनीश अख्तर, जैसे सहकर्मी प्रधानाचार्य भी उपस्थित थे — उनकी प्रतिबद्धता ने कार्यक्रम की ऊर्जा को और बढ़ा दिया।

मंत्री जी ने बताया कि पिछले दो वर्षों में प्रदेश में शिक्षण के अनेक नवाचार किये गए हैं—सैनिक स्कूल, वैदिक स्कूल खोलने की पहल, संस्कृत स्कूलों का संवर्धन और करीब 50 हजार स्कूलों का क्रमोन्नयन। मैं उस बदलाव को नजदीक से देख रहा हूँ; हमारे विद्यालयों में आईसीटी लैब, रोबोटिक लैब और 'पढ़ाई विद ए-आई' जैसी कक्षाओं के आगमन ने छात्रों के दृष्टिकोण को बदल दिया है। शिक्षा विभाग में 22 हजार से अधिक नई भर्तियाँ हुईं—यह केवल संख्या नहीं, बल्कि नयी जान फूंकने जैसा है: नए शिक्षक, नए विचार और नई उम्मीदेँ। एक प्रधानाचार्य के रूप में मैंने देखा है कि संसाधन और योग्य मानव संसाधन जब साथ आते हैं, तो परिणाम भी सर्वांगीन और टिकाऊ होते है l

एक प्रधानाचार्य के नाते मेरी रोज़मर्रा की चुनौतियाँ और खुशियाँ दोनों है। कभी-कभी संसाधनों की अभाव, कभी शिक्षा में नवाचार को अपनाने की जद्दोजहद — पर जब मैं बच्चे की आँखों में जिज्ञासा देखता हूँ, किसी छात्र का आत्मविश्वास बढ़ता देखता हूँ, या हमारे स्कूल के एक कार्यक्रम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन आता देखता हूँ, तो सारी थकान मिट जाती है। उस कार्यशाला में मंत्री जी ने जो मानवीय मूल्यों — प्रेम, करुणा, सत्य, अहिंसा, सम्मान और ज़िम्मेदारी — पर जोर दिया, वह मेरे शिक्षण के मूल मन्त्र रहे हैं। मैं हर दिन यही प्रयास करता हूँ कि बच्चों को केवल जानकारी न दें, बल्कि उन्हें संवेदनशील बनाएं — ताकि वे नैतिक निर्णय ले सकें और भावनात्मक रूप से बुद्धिमान बनकर समाज व पर्यावरण के प्रति सकारात्मक योगदान दे सकें।

मेरे जीवन में शिक्षा का अर्थ सिर्फ पढ़ाना नहीं रहा; यह संवेदनाओं को जगाना, समाज की समस्याओं को समझने और उनका समाधान खोजने में बच्चों को सक्षम बनाना भी रहा है। कार्यशाला में हुई चर्चाओं और अधिकारियों के निरीक्षणों ने मुझे यह भरोसा दिया कि हम सही राह पर हैं—लेकिन साथ ही यह भी समझाया कि और बहुत कुछ करना बाकी है। 50 हज़ार स्कूलों के क्रमोन्नयन और 22 हज़ार नई भर्तियों का असर तभी सार्थक होगा जब हर कक्षा में शिक्षक और छात्र मिलकर सीखने का वैसा ही उत्साह दिखाएँ जैसा आज हमारे कई विद्यालयों में दिख रहा है।

अंततः मैं यह मानता हूँ कि शिक्षा परिवर्तन का सबसे सशक्त माध्यम है—वह बदलाव जो व्यक्ति को बेहतर बनाये और समाज को समृद्ध करे। मैं, गिरिराज प्रसाद गुर्जर, अपने विद्यालय के सभी शिक्षकों, विद्यार्थियों और अभिभावकों के साथ मिलकर यह प्रण लेता हूँ कि हम न केवल उच्चतम शैक्षणिक मानदण्ड स्थापित करेंगे, बल्कि मानवीय मूल्यों पर भी उतना ही बल देंगे — ताकि हमारा हर छात्र न केवल ज्ञानी हो, बल्कि संवेदनशील, जिम्मेदार और राष्ट्र के लिए समर्पित नागरिक हो। यह आत्मकथा मेरे उन छोटे-छोटे अनुभवों, पहलों और उन चेहरों का रिकॉर्ड है जिन्होंने मुझे शिक्षक बनने का अर्थ सिखाया—और मैं हर रोज़ इसी सीख को आगे बढ़ाने के लिए तत्पर हूँ।

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