भूमिका
ज्ञान, संवेदना और शिक्षा—इन तीनों के सुंदर संगम का नाम है श्रीमती शशिकला शर्मा। 21 फ़रवरी, 1970 को जन्मी शशिकला जी ने व्यवसाय अध्ययन में स्नातकोत्तर, बी.पी-एड और बी.एड की उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपने व्यक्तित्व को दृढ़, कर्मठ और रचनात्मक बनाया। श्री गुरु नानक सीनियर सेकेंडरी स्कूल में व्याख्याता के रूप में उन्होंने वर्षों तक न केवल विषय पढ़ाया बल्कि विद्यार्थियों में मूल्य, अनुशासन और आत्मविश्वास का संचार भी किया। पाती लेखन की विधा में उनकी अभूतपूर्व पकड़ ने उन्हें ‘मां की पाती बेटी के नाम’ प्रतियोगिता में जिला प्रशासन बूंदी से प्रशस्ति दिलाई। उनके लेखन का दायरा प्रेम, स्मृतियाँ, संस्कृति और मानवीय भावनाओं को छूता है, जिसके कारण अनेक सांझा संग्रहों और संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया। शिक्षा, साहित्य और संवेदनाओं को समान रूप से साधने वाली यह बहुमुखी रचनाकार समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
बातचीत
साक्षात्कारकर्ता डॉ. छाया शर्मा– आपका हार्दिक स्वागत है, शशिकला जी।
उत्तरदाता शशिकला – धन्यवाद, यह मेरे लिए सम्मान की बात है।
प्रश्न 1. आपकी प्रारंभिक शिक्षा कैसी रही और व्यवसाय अध्ययन को अपना विषय चुनने की प्रेरणा कहाँ से मिली?
उत्तर — "मेरी प्रारंभिक शिक्षा सदैव अनुशासित वातावरण में हुई। गणित, वाणिज्य और व्यवहारिक जीवन से जुड़े विषय मुझे विशेष आकर्षित करते थे। व्यवसाय अध्ययन मुझे इसलिए प्रिय रहा क्योंकि यह जीवन के वास्तविक स्वरूप—लेन-देन, प्रबंध, संगठन और व्यवहार—को बहुत सरल और उपयोगी तरीके से समझाता है। इसी रुचि ने मुझे स्नातकोत्तर तक इस विषय को पढ़ने के लिए प्रेरित किया।"
प्रश्न २. शिक्षक के रूप में आपका अनुभव कैसा रहा?
उत्तर — "शिक्षक होना मेरे लिए केवल पेशा नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी और आत्मिक संतोष का विषय रहा। श्री गुरु नानक सीनियर सेकेंडरी स्कूल में व्याख्याता के रूप में काम करते हुए मैं हमेशा यह मानती रही कि शिक्षा सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं होती। विद्यार्थी तभी विकसित होते हैं जब शिक्षक उन्हें ज्ञान के साथ मानवीय मूल्य भी दे। मुझे गर्व है कि वर्षों में मेरे अनेक विद्यार्थी आज विभिन्न क्षेत्रों में सफल हैं।"
प्रश्न ३. पाती लेखन की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली? यह रचना-शैली आपके कितने निकट है?
उत्तर — "पाती लिखना मेरे लिए भावनाओं को कागज़ पर उतारने की सबसे सहज विधा है। पाती में भाव, स्मृतियाँ, रिश्ते और जीवन की छोटी-बड़ी अनुभूतियाँ सबसे सुंदर रूप में व्यक्त होती हैं। ‘मां की पाती बेटी के नाम’ प्रतियोगिता ने इस शैली के प्रति मेरे विश्वास को और दृढ़ किया। जब जिला प्रशासन बूंदी और महिला अधिकारिता विभाग ने मुझे 11वाँ स्थान देते हुए सम्मानित किया, तो यह सचमुच एक अविस्मरणीय क्षण था।"
प्रश्न ४. आपने जिन साझा संग्रहों में योगदान दिया, उनमें आपके अनुभव कैसे रहे?
उत्तर — "नौ महत्वपूर्ण साझा संग्रह—पाती स्मृतियों के झरोखे से, एक पाती मीत को, बापू की चिट्ठी, माटी की पुकार, पाती डाकिए को, लिख दूं पाती यादों के गलियारे से, प्रेम सागर, अजमेर लेखिका मंच श्रेष्ठ लघु कथाएँ, अजमेर लेखिका मंच उपरोक्त संग्रह—मेरे लिए अत्यंत समृद्ध अनुभव रहे। इनमें भाग लेना मानो अनेक रचनाकारों की संवेदनाओं से संवाद करने जैसा था। प्रत्येक संग्रह ने मुझे सामाजिक भावनाओं, रिश्तों और मानवीय मूल्यों को नए दृष्टिकोण से देखने का अवसर दिया।"
प्रश्न ५. लेखन और अध्यापन—दोनों को संतुलित करने में क्या चुनौतियाँ आईं?
उत्तर — "चुनौतियाँ तो हर क्षेत्र में होती हैं, परंतु समय प्रबंधन और आत्म-अनुशासन ने मुझे हमेशा मदद की। स्कूल की जिम्मेदारियाँ और घर का प्रबंधन, दोनों के बीच लेखन के लिए समय निकालना कठिन था, पर मेरे परिवार ने हर कदम पर मेरा साथ दिया। यही सहयोग मेरे लिए ऊर्जा का स्रोत बना।"
प्रश्न ६. आपको मिले महत्वपूर्ण सम्मानों को आप कैसे देखती हैं?
उत्तर — "सम्मान हमेशा प्रेरणा देते हैं। लायंस क्लब अजमेर वेस्ट का शिक्षक सम्मान, नागरीदास कला संस्थान किशनगढ़ द्वारा नागरिक अभिनंदन पत्र और साझा संग्रहों में मिली सराहनाएँ—ये सभी मेरे मन में निरंतर सृजन और समर्पण की भावना को मजबूत करते हैं। मेरे लिए यह उपलब्धियों से अधिक सामाजिक विश्वास की अभिव्यक्ति हैं।"
प्रश्न ७. नई पीढ़ी की छात्राओं और महिलाओं के लिए आपका संदेश?
उत्तर — "मैं बच्चों को यही कहना चाहूँगी, कि समय बहुत कीमती है, ये जीवन में लौटकर कभी वापस नहीं आएगा। इसका सदुपयोग करें। मोबाइल का अनावश्यक उपयोग न करें। कोई भी ऐसा काम न करें जिससे 'अपयश या पश्चाताप हो' 'जीवन सफलता की कुंजी निःस्वार्थ व त्याग भावना करना'। हमेशा अपने बड़ों का, बुजुर्गों का सम्मान करें। प्यारे बच्चो! हमेशा सकारात्मक सोच रखें, आशावादी बनें। महिलाओं के लिए मेरा यही संदेश है, कि वे अपने बच्चों के लिए जीजाबाई और लक्ष्मीबाई जैसी मिसाल बनें। महिलाएं स्वयं शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहें, ताकि अपने बच्चों को सही दिशा प्रदान कर सकें। अपने सपनों को कभी कम न आँकें। शिक्षा आपको स्वतंत्रता देती है—सोच की, निर्णय की और जीवन निर्माण की। आत्मविश्वास और निरंतर सीखने की आदत किसी भी व्यक्ति को आगे बढ़ाती है। और सबसे महत्वपूर्ण—अपने भीतर की संवेदनाओं को हमेशा जागृत रखें।"
प्रश्न ८. आने वाले समय में आपकी कोई नई साहित्यिक योजना?
उत्तर — "हाँ, मैं पाती लेखन को एक व्यापक संग्रह के रूप में संकलित करना चाहती हूँ। साथ ही शिक्षा और जीवन मूल्यों पर आधारित कुछ प्रेरक लेखों पर भी कार्य कर रही हूँ। आशा है, यह पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे।"
समापन
श्रीमती शशिकला शर्मा का जीवन यह सिखाता है कि निष्ठा, शिक्षा और संवेदनाएँ मिलकर किसी भी व्यक्ति को समाज का प्रेरक स्तंभ बना सकती हैं। अध्यापन और लेखन, दोनों क्षेत्रों में उनका योगदान भावनात्मक समृद्धि और सामाजिक सेवा का संतुलित उदाहरण है।

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