भूमिका
हमारे दैनिक सामाजिक व्यवहार में अपनाई गई अनेक छोटी-छोटी बातों को हम सामान्य मानकर अक्सर अनदेखा कर देते हैं, किंतु यही बातें कई बार हमारे संदेश, उद्देश्य और भाव को अनजाने में उलझा देती हैं। उलझन सुलझन मासिक द्वारा संचालित अंतर्संबंध ब्लॉग पर प्रस्तुत ‘पहले जानो, फिर मानो’ शीर्षक आलेख ऐसे ही प्रचलनों पर ठहरकर सोचने का एक सहज आमंत्रण है—जहाँ न दोषारोपण है, न उपदेश, बल्कि केवल विवेकपूर्ण संवाद का प्रयास है। यह आलेख पाठक को यह महसूस कराने की क्षमता रखता है कि थोड़ी-सी समझ, सही संदर्भ और शब्दों के प्रति संवेदनशीलता हमारे सामाजिक संवाद को कैसे अधिक गरिमामय और प्रभावशाली बना सकती है। इसे पढ़ते हुए संभव है कि पाठक स्वयं से संवाद करने लगे—और यही इस लेख की सबसे सार्थक उपलब्धि है।
पहले जानो, फिर मानो
समाज में प्रगति की आकांक्षा अच्छी बात है, किंतु जब यह आकांक्षा “मैं सब जानता/जानती हूँ” जैसे अति-आत्मविश्वास में बदल जाती है, तो अनेक बार वही आत्मविश्वास हास्यास्पद स्थिति का कारण बन जाता है। समस्या ज्ञान की नहीं, अपूर्ण जानकारी के साथ निर्णय लेने की होती है। इसी संदर्भ में एक पुराना, किंतु अत्यंत उपयोगी सूत्र है — पहले जानो, फिर मानो।
उदाहरण के लिए वैवाहिक निमंत्रण पत्रों को ही लें। कई बार उत्साह या जल्दबाज़ी में ऐसे निमंत्रण तैयार हो जाते हैं जिनमें जाने-अनजाने किसी दिवंगत परिजन का नाम आमंत्रक के रूप में अंकित हो जाता है। जबकि सामाजिक परंपरा और व्यवहारिक शिष्टाचार दोनों यह स्पष्ट करते हैं कि निमंत्रण सदैव जीवित व्यक्ति की ओर से ही दिया जाता है। कार्ड निर्माता और मुद्रक इस तथ्य से भली-भांति परिचित होते हैं, किंतु जब उनसे परामर्श किए बिना सामग्री थमा दी जाती है, तो भूल की संभावना बढ़ जाती है। यह भूल किसी की भावना को ठेस पहुँचाने के लिए नहीं होती, फिर भी असहज स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
ऐसा ही एक दृश्य हमें सार्वजनिक स्थलों पर लगे फ्लेक्स और बैनरों में भी देखने को मिलता है। किसी कार्यक्रम या आह्वान के लिए बड़े अक्षरों में लिखा होता है — *निवेदक : समस्त नागरिक*। अब यदि समस्त नागरिक पहले से ही उस विषय को जानते और मानते हों, तो फिर उस फ्लेक्स की आवश्यकता ही क्या है? वस्तुतः निवेदन हमेशा किसी *विशिष्ट* समूह या व्यक्ति की ओर से किया जाता है और किसी *विशिष्ट* समूह के लिए होता है। यहाँ भी भाव गलत नहीं, केवल अभिव्यक्ति में स्पष्टता का अभाव है।
इसी श्रेणी में एक और प्रचलन देखने को मिलता है — नाम के साथ बिना संदर्भ के “वरिष्ठ” शब्द का प्रयोग। वरिष्ठ होना सम्मान की बात है, किंतु यह सम्मान स्वतः संदर्भ से जुड़ता है — आयु में, अनुभव में या पद में। हर नाम के आगे वरिष्ठ लिख देना उस शब्द के अर्थ को ही धुंधला कर देता है।
चुनावी परिदृश्य में भी कभी-कभी ऐसा होता है कि पराजय के बाद भी प्रचार सामग्री या परिचय में पुराने “कैंडिडेचर” का उल्लेख बना रहता है। लोकतंत्र में हार-जीत स्वाभाविक प्रक्रिया है, किंतु वर्तमान संदर्भ के अनुरूप स्वयं को प्रस्तुत करना ही परिपक्वता का संकेत है।
इन सभी उदाहरणों का उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था या वर्ग की आलोचना करना नहीं है। यह केवल यह स्मरण कराने का एक सहज प्रयास है कि **हर कार्य में थोड़ी-सी जानकारी, थोड़ी-सी सलाह और थोड़ा-सा ठहराव अनेक असुविधाओं से बचा सकता है**।
जब हम विशेषज्ञ से पूछ लेते हैं, परंपरा को समझ लेते हैं और शब्दों के अर्थ को जान लेते हैं, तब न अहं को ठेस पहुँचती है और न विवाद की संभावना बनती है।
अंततः समाज की सुंदरता इसी में है कि हम सीखते रहें, सुधार स्वीकार करें और यह मानने में संकोच न करें कि *सब कुछ जान लेना* संभव नहीं, किंतु *सीखते रहना* अवश्य संभव है।
इसी संतुलन में निहित है — पहले जानो, फिर मानो।
भावों का सजीव चित्रण
सूचना स्रोत











टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें