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पेरेंटिंग का सजीव उदाहरण हैं श्री राजपाल सिंह दंपति

आदर्श पेरेंटिंग का सजीव उदाहरण हैं श्री राजपाल सिंह दंपति

वर्णिका चौधरी की सफलता जितनी क्रिकेट के मैदान की कहानी है, उतनी ही एक पिता की दूरदर्शिता, त्याग और जिम्मेदार पेरेंटिंग की भी मिसाल है। किसान परिवार से आने वाले श्री राजपाल सिंह ने सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी बेटी के सपनों को कभी सीमित नहीं होने दिया। उन्होंने समाज की रूढ़ियों से ऊपर उठकर वर्णिका को वह भरोसा दिया, जिसकी बुनियाद पर उसका आत्मविश्वास खड़ा है। सुबह खेतों की मेहनत हो या देर शाम प्रैक्टिस का साथ—उन्होंने हर कदम पर यह सिद्ध किया कि पेरेंटिंग केवल पालन-पोषण नहीं, बल्कि बच्चे के सपनों का संरक्षण भी है। उन्होंने न कभी परिणाम का दबाव डाला, न हार का डर; बस प्रयास, अनुशासन और हौसला सिखाया। यही कारण है कि आज वर्णिका न सिर्फ यूपी अंडर-23 टीम की कप्तान है, बल्कि यह भी प्रमाण है कि जब पिता का विश्वास बेटी की ताकत बन जाता है, तो मंज़िलें खुद रास्ता छोड़ देती हैं।



पिता राजपाल सिंह जी का साक्षात्कार

“बेटियों को सपने नहीं, पंख दीजिए”

प्रश्न १. राजपाल सर, आपकी बेटी वर्णिका यूपी अंडर–23 टीम की कप्तान बनी है। एक पिता के रूप में ये पल आपके लिए क्या मायने रखते हैं?

उत्तर: "ये क्षण मेरे लिए शब्दों में बाँधना मुश्किल है। हम किसान लोग मेहनत का मूल्य जानते हैं, लेकिन बेटी की लगन और हिम्मत ने मुझे हमेशा चकित किया। जब उसकी कप्तानी की खबर आई तब मेरा ध्यान 2018 में विश्वामित्र क्रिकेट एकेडमी के मैदान पर गया जब मेरे सामने सहारनपुर क्रिकेट एसोसिएशन के चेयरमैन अकरम सैफी जी ने कोच विनय कुमार जी से कहा था कि तुम्हें वर्णिका के रूप में एक हीरा मिला है। इसे तैयार करना तेरा काम है और यदि कोई कमी लगती है मैं साथ दूंगा।"

प्रश्न २. सर, वर्णिका की क्रिकेट यात्रा कैसे शुरू हुई? क्या आपने शुरू से उसकी रुचि पहचानी?

उत्तर: "हाँ, बिल्कुल। छोटी थी तब घर के आँगन में क्रिकेट खेलती रहती थी। कई बार उसकी गेंद घरों की छतों से गुजरती हुई कहीं पर जाकर गिर जाती और कई बार वो गुम हो जाती थी और अपने भाई अभिनव के साथ 1, 1 रन के लिए लड़ती थी। वहीं से मैंने समझ लिया कि यह बच्ची खेल को दिल से चाहती है। बस मैंने तय कर लिया कि इसकी राह मैं रोकूंगा नहीं, इसे सँवारूंगा।"

प्रश्न ३. सर, एक किसान परिवार से आने के कारण संसाधन सीमित होंगे। आपने इन परिस्थितियों में उसे कैसे सपोर्ट किया?

उत्तर: "किसान हमेशा मजबूर नहीं होता, संकल्प वाला होता है। खर्चा चाहे जैसा हो, मैंने कभी वर्णिका के प्रशिक्षण को ‘बोझ’ नहीं समझा। ट्रेवल हो, किट हो, कोचिंग हो—मैंने हर जरूरत को पूरा किया। कई बार खेत से उठकर सीधे प्रैक्टिस नेट्स तक जाता था, ताकि उसे लगे कि मेरा, वर्णिका के चाचा, मम्मी, चाची भाई और बाबा का साथ हमेशा रहा। समय, साधन और मेहनत—जो दे सकते थे, वो दिया।"

प्रश्न 4: क्या समाज या आसपास के लोगों ने कभी निरुत्साहित किया कि “लड़की है, इतना क्या करेगी?”

उत्तर: "मैं इस प्रश्न के उत्तर में कहना चाहता हूँ कि मेरे और मेरे परिवार के सामने इस प्रकार की कोई भी बात नहीं आई। इस हेतु मैं  सभी ग्रामवासियों, रिश्तेदारों और सभी साथियों का दिल से धन्यवाद करता हूँ। यद्यपि गाँव के कई लोग कहते थे कि 'बेटियाँ पढ़-लिख कर घर संभालती हैं, क्रिकेट क्या दे देगा?' लेकिन मैंने उनको यही जवाब दिया कि 'सपने बेटे-बेटी में फर्क नहीं करते।' 

लोगों की बातें केवल हवा की तरह आईं, हम दोनों ने उन्हें चलने दिया। मेरी बेटी का आत्मविश्वास मेरी ताकत था।"

प्रश्न ५. आपने एक पिता के तौर पर उसकी मानसिक और भावनात्मक मजबूती कैसे बढ़ाई?

उत्तर: खेल केवल शरीर का नहीं, मन का भी है। वर्णिका कई बार मैच में पराजित होकर घर आती थी तो उदास हो जाती थी। तब मैं उसे यही कहता—

'हारते वही हैं जो मैदान में उतरते हैं। कोशिश जारी रखो, जीत खुद चलकर आएगी।' 

मैंने कभी उसे अंकों, रैंकिंग या परिणाम का दबाव नहीं दिया। मैंने उसको केवल प्रयास का मूल्य सिखाया।"

प्रश्न ६. सर, वर्णिका को अनुशासन, समय प्रबंधन और कठिन प्रशिक्षण के लिए आप कैसे तैयार करते थे?

उत्तर: "घर में हमारे नियम सरल थे—ईमानदारी, मेहनत और समय की कद्र। मैं सुबह चार बजे उठता था तो उसे भी धीरे से जगाता था। कहता—“सपनों के लिए नींद कम, हिम्मत ज्यादा चाहिए।”

मैंने कभी उसे आदेश नहीं दिया, बस उदाहरण बनकर दिखाया। जब वह मुझे मेहनत करते देखती थी, तो खुद अनुशासन उसका स्वभाव बन गया।"

प्रश्न ७. सर, वर्णिका की उपलब्धियों में माता सुषमा जी की क्या भूमिका रही?

उत्तर: "वर्णिका की सफलता की सबसे बड़ी भागीदार उसकी माँ ही है। उसने खाना, पढ़ाई, प्रैक्टिस—सब कुछ बिना शिकायत के संभाला। कई बार जब मैच के लिए दूर जाना होता था, सुषमा उसे ऐसे विदा करती जैसे कोई पौधा मजबूत हवा में छोड़ रही हो—विश्वास के साथ।

माँ का साहस और पिता की मेहनत—यही उसकी नींव है।"

प्रश्न ८. आज जब लोग वर्णिका को रोल मॉडल के रूप में देखते हैं, तो आपको क्या लगता है कि अभिभावकों को अपनी बेटियों के लिए क्या करना चाहिए?

उत्तर: "मैं बस इतना कहना चाहूंगा कि 

“बेटियों का हाथ पकड़ें, पर कदम मत रोकें।”

उन्हें सुरक्षा चाहिए, सीमाएँ नहीं।

अभिभावक अगर डर को हटा दें और भरोसा दे दें, तो बेटियाँ आसमान से भी आगे उड़ सकती हैं।"

प्रश्न ९. सर, पेरेंटिंग की आपकी सबसे बड़ी सीख क्या है, जो आप नए माता-पिता को देना चाहेंगे?

उत्तर: "बच्चे का सपना उसकी उम्र से बड़ा हो, तो भी उसे छोटा मत समझिए।

* तुलना न कीजिए, प्रोत्साहन कीजिए।

* डांट से ज्यादा दुलार में ताकत होती है।

* माता-पिता का विश्वास वह ऑक्सीजन है, जिससे बच्चे का आत्मविश्वास जीवित रहता है।

अगर बच्चा यह महसूस कर ले कि 'मेरे माता-पिता मेरे साथ हैं', तो दुनिया की कोई बाधा उसकी प्रगति को रोक नहीं सकती।"

प्रश्न 10: आगे वर्णिका के भविष्य को लेकर आपकी क्या उम्मीदें हैं?

उत्तर: "मेरी इच्छा है कि वह देश के लिए खेले और एक अच्छी इंसान बने। क्रिकेट तो उसकी पहचान है, लेकिन मूल्य—सम्मान, विनम्रता और कठिन मेहनत—ये उसकी सच्ची पूंजी हैं। यही पूंजी उसे जीवन भर आगे लेकर जाएगी।"

पुत्री वर्णिका का साक्षात्कार

कप्तान, यूपी अंडर-23 महिला टी-20 क्रिकेट टीम

प्रश्न १. वर्णिका बेटी, यूपी अंडर-23 महिला टी-20 टीम की कप्तान नियुक्त होने पर आपको कैसा महसूस हो रहा है?

उत्तर: "यह मेरे लिए गर्व और जिम्मेदारी दोनों का क्षण है। कप्तान बनना सिर्फ सम्मान नहीं बल्कि टीम को नई ऊँचाइयों तक ले जाने की चुनौती भी है। सहारनपुर का नाम रोशन करने का जो सपना था, वह अब और भी बड़ा हो गया है।"

प्रश्न २. आपके चयन पर सहारनपुर के खिलाड़ियों, खेल प्रेमियों और एसडीसीए ने बेहद गर्व व्यक्त किया है। इसे आप कैसे देखती हैं?

उत्तर: "सहारनपुर ने मुझे हमेशा अपनापन और समर्थन दिया है। एसडीसीए ने जिस तरह अवसर, मार्गदर्शन और मंच दिया, वह मेरे लिए अमूल्य है। यह उपलब्धि सिर्फ मेरी नहीं बल्कि पूरे जिले की है।"

प्रश्न 3: आपकी क्रिकेट यात्रा कैसे शुरू हुई?

उत्तर: "मैं एक किसान परिवार से आती हूँ। बचपन में स्कूल के मैदान में लड़कों के साथ खेलना शुरू किया। मेरे पिता राजपाल सिंह और माता सुषमा चौधरी ने हमेशा मेरे सपनों का सम्मान किया और कभी मुझे “लड़की होकर…” जैसी सीमाओं में नहीं बांधा। यही मेरे सफर की असली ताकत है।"

प्रश्न ४. आपने कई महत्वपूर्ण टूर्नामेंट्स में शानदार प्रदर्शन किया है। किन उपलब्धियों को आप सबसे विशेष मानती हैं?

उत्तर:  

"* अंडर-19 इंडिया टी-20 चैलेंजर ट्रॉफी

* एनसीए जोनल ट्रॉफी

* अंडर-23 यूपी वन डे ट्रॉफी

* यूपी सीनियर्स वन डे ट्रॉफी। अंडर 19 यू पी वन डे ट्रॉफी 

* अंडर-19 यूपी टी-20 ट्रॉफी *कप्तान के रूप में*

* सीनियर्स यूपी टी-20 ट्रॉफी ओर अब अंडर 23 टी 20 में कप्तान के रुप में

इन सभी प्रतियोगिताओं ने मुझे आत्मविश्वास दिया और अपने खेल को बेहतर समझने में मदद की। खासकर कप्तानी के अनुभव ने मुझे नेतृत्व का महत्व सिखाया।"

प्रश्न ५. कप्तान के रूप में आप टीम को किस तरह आगे बढ़ाना चाहेंगी?

उत्तर: "मेरी कोशिश होगी कि हर खिलाड़ी अपनी ताकत के साथ स्वतंत्र होकर खेले। टीम में भरोसा, संवाद और सकारात्मक माहौल बने। मैं चाहती हूँ कि यूपी महिला टीम 'फाइटिंग स्पिरिट' के लिए पहचानी जाए।"

प्रश्न ६. सहारनपुर से निकलकर इस स्तर तक पहुंचना कितना चुनौतीपूर्ण था?

उत्तर: "चुनौतियाँ जरूर थीं—संसाधनों की कमी, बेहतर सुविधाओं का अभाव, और कई बार दूरी तक सफर करना। लेकिन एसडीसीए और कोचों ने मुझे हमेशा आगे बढ़ने में मदद की। परिवार का मजबूत समर्थन सबसे बड़ा संबल रहा।"

प्रश्न 7: महिला क्रिकेट की बदलती तस्वीर को आप कैसे महसूस करती हैं?

उत्तर: "आज महिला क्रिकेट के लिए माहौल पहले से कहीं बेहतर हुआ है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमारी खिलाड़ी प्रेरणा बनी हैं। अब लोगों की सोच बदली है—लड़कियाँ भी क्रिकेट को करियर के रूप में चुन सकती हैं और शानदार प्रदर्शन कर सकती हैं।"

प्रश्न ८. आपके जिले की बेटियाँ आपको रोल मॉडल की तरह देखती हैं। उन्हें क्या संदेश देना चाहेंगी?

उत्तर: "सपनों को कभी छोटा मत समझो। आप किसी भी पृष्ठभूमि से आती हों, मेहनत और निरंतर प्रयास आपको मंज़िल तक ले जाते हैं। अगर रास्ता कठिन लगे, तो बस इतना याद रखें—हर गेंद पर चौका नहीं लगता, पर खेल कभी छोड़ा नहीं जाता।"

प्रश्न ९. आने वाले समय के लिए आपकी क्या योजनाएँ हैं?

उत्तर: "फिलहाल मेरा पूरा ध्यान यूपी टीम को मजबूत करने पर है। साथ ही, मेरी तैयारी राष्ट्रीय टीम के लिए भी जारी है। मैं देश की जर्सी पहनने का सपना पूरी शक्ति से जी रही हूँ।"

प्रश्न १०. अंत में, इस मुकाम तक पहुंचने में किन लोगों का सबसे बड़ा योगदान रहा?

उत्तर: "मेरे माता-पिता, भाई, चाचा, कोच विनय कुमार जी एसडीसीए के अध्यक्ष अकरम सैफी जी और सभी पदाधिकारी सहारनपुर के सभी खेल प्रेमी—इन सबकी बदौलत ही मैं इस स्तर तक पहुंची हूँ। मेरी सफलता उनकी सभी मेहनत का भी फल है।"

सूचना स्रोत और आइडिया 💡 

दैनिक अमर उजाला 

स्वरूप और संरचना

शब्दशिल्प

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 







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