भूमिका
स्वच्छता को लेकर देशभर में जागरूकता के दावे जितने मुखर होते जा रहे हैं, पर्यावरण के प्रति व्यवहारिक संवेदनशीलता उतनी ही क्षीण होती प्रतीत हो रही है। कूड़ा प्रबंधन और स्वच्छता के नाम पर अपनाई जा रही अवैज्ञानिक प्रक्रियाएं आज केवल असुविधा नहीं, बल्कि पारिस्थितिक विनाश का कारण बनती जा रही हैं। कूड़े के पहाड़, अपशिष्टों से किया जा रहा भूमि भराव और हरियाली का लगातार लुप्त होना इस बात का संकेत है कि हम समस्या के समाधान की जगह उसे और गहराते जा रहे हैं। यह आलेख इसी विडंबनापूर्ण यथार्थ को सामने लाते हुए न केवल कूड़ा प्रबंधन की अनिवार्यता को रेखांकित करता है, बल्कि उन संस्थानों और व्यवस्थाओं को भी आत्ममंथन के लिए आमंत्रित करता है, जिनका दायित्व पर्यावरण की रक्षा करना है।
स्वच्छता के नाम पर पर्यावरण से समझौता?
पर्यावरण के नाम पर स्वच्छता के नारे आज जितनी तेजी से जनमानस में स्वीकार किए जा रहे हैं, उतनी ही तेजी से हम अस्वच्छता को भी एक सामूहिक नियति की तरह स्वीकार करते चले जा रहे हैं। यही कारण है कि दिल्ली के गाजीपुर जैसे कूड़े के पहाड़ अब अपवाद नहीं रहे, बल्कि जिलावार एक भयावह परंपरा का रूप लेते जा रहे हैं। यह स्थिति केवल किसी एक महानगर तक सीमित नहीं है; यदि मेरठ जनपद का ही उदाहरण लें तो यहां अनेक ऐसे स्थान सहज ही मिल जाएंगे, जहां कूड़े और अपशिष्टों के अंबार भविष्य के संकट का मौन संकेत दे रहे हैं। ऐसे में यह आशंका स्वाभाविक है कि यदि यह प्रवृत्ति यूं ही चलती रही तो नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल जैसे संवैधानिक रूप से सशक्त पर्यावरणीय संरक्षण निकाय भी धीरे-धीरे गौण होते चले जाएंगे।
विडंबना यह है कि समस्या केवल कूड़े के ढेर तक सीमित नहीं रही। अब ‘भराव’ के नाम पर जिस प्रकार अपशिष्टों का प्रयोग देशव्यापी स्तर पर होने लगा है, वह पर्यावरण के लिए कहीं अधिक गंभीर खतरा बनता जा रहा है। मेरठ–परीक्षितगढ़ मार्ग पर सैन्य भूमि में अपशिष्टों से किए जा रहे तीव्र भराव कार्य का उदाहरण इस चिंता को और गहरा करता है। जिस गति से यहां कूड़ा डाला जा रहा है, उससे कहीं अधिक तेजी से वहां की प्राकृतिक हरियाली लुप्त होती जा रही है। स्थानीय निवासियों की आशंका निराधार नहीं है कि अपशिष्टों से भरी भूमि भविष्य में वृक्षारोपण के लिए अनुपयुक्त हो जाएगी, क्योंकि ऐसा भराव पौधों के लिए आवश्यक जैविक और प्राकृतिक वातावरण बनने ही नहीं देगा।
यह स्थिति केवल पर्यावरणीय असंतुलन नहीं, बल्कि भावी पीढ़ियों के अधिकारों पर भी आघात है। मिट्टी, जल, वायु और हरियाली—ये सभी किसी भी सभ्य समाज की आधारशिला होते हैं। यदि आज अपशिष्टों को बिना वैज्ञानिक प्रबंधन के भूमि में दबा दिया गया, तो कल वही भूमि विषाक्त होकर जीवन के हर रूप को प्रभावित करेगी। यह प्रश्न केवल सौंदर्य या सुविधा का नहीं, बल्कि अस्तित्व और उत्तरदायित्व का है।
इसके विपरीत, यदि कूड़ा प्रबंधन को गंभीरता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अपनाया जाए, तो यही अपशिष्ट ‘समस्या’ से ‘समाधान’ में परिवर्तित हो सकता है। पृथक्करण, पुनर्चक्रण, कम्पोस्टिंग और वेस्ट-टू-एनर्जी जैसी प्रणालियों के माध्यम से कूड़े को संसाधन में बदला जा सकता है। सही प्रबंधन के साथ वही कूड़ा खाद बनकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ा सकता है, ऊर्जा उत्पन्न कर सकता है और रोजगार के नए अवसर भी सृजित कर सकता है। वस्तुतः कूड़ा, यदि सही हाथों और सही नीति के साथ हो, तो बोझ नहीं बल्कि संभावनाओं का भंडार है।
ऐसे में यह अपेक्षा और भी प्रबल हो जाती है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल जैसे संस्थान केवल शिकायतों की प्रतीक्षा तक सीमित न रहें, बल्कि पर्यावरण को हो रही स्पष्ट और निरंतर क्षति पर स्वतः संज्ञान लें। अपशिष्टों से अव्यवस्थित भराव, हरियाली के विनाश और भूमि के दीर्घकालिक नुकसान जैसे मामलों में कठोर दिशा-निर्देश और त्वरित हस्तक्षेप आवश्यक है। केवल दंडात्मक कार्रवाई ही नहीं, बल्कि वैकल्पिक, पर्यावरण-अनुकूल समाधान लागू कराना भी समय की मांग है।
पर्यावरण संरक्षण कोई एक विभाग या संस्था की जिम्मेदारी भर नहीं है, लेकिन जब अव्यवस्था संगठित रूप लेने लगे, तब नियामक संस्थाओं की सक्रियता अनिवार्य हो जाती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि कूड़ा प्रबंधन को प्राथमिकता देते हुए अपशिष्टों से पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले प्रयासों को सीमित किया जाए और हरियाली, स्वच्छ भूमि तथा संतुलित पारिस्थितिकी को विकास का अनिवार्य मानदंड बनाया जाए। तभी स्वच्छता का नारा वास्तव में पर्यावरण संरक्षण का आधार बन सकेगा, अन्यथा वह केवल खोखला उद्घोष बनकर रह जाएगा।
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