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सोनिया सिंह जागृति की नई जिज्ञासा

सोनिया सिंह जागृति की नई जिज्ञासा 

"सारी समस्याओं की मूल तो अपेक्षाएं ही हैं खासकर वे अपेक्षाएं जो हम दूसरों से करते हैं पर सच मानिए अपेक्षाएं तो खुद से की हुई भी दु:खदायक ही होती है।"

जिज्ञासा क्षुधा-शान्ति 

अपेक्षाओं की जड़ और मन का संतुलन

(सोनिया सिंह ‘जागृति’ की नवीन जिज्ञासा की विस्तृत व्याख्या)

मनुष्य की अधिकांश समस्याओं की जड़ अपेक्षाएँ हैं, क्योंकि अपेक्षा भविष्य की वह कल्पना है जिसे हम यथार्थ पर थोप देना चाहते हैं। जब हम दूसरों से अपेक्षा करते हैं, तो अनजाने में उन्हें अपने मन के साँचे में ढालना चाहते हैं। यदि वे उस साँचे में फिट नहीं होते, तो असंतोष, क्रोध और पीड़ा जन्म लेते हैं। इस स्थिति में दुःख इसलिए नहीं होता कि सामने वाला गलत है, बल्कि इसलिए कि हमारी अपेक्षा पूरी नहीं हुई।

पर इससे भी अधिक सूक्ष्म और पीड़ादायक होती हैं स्वयं से की गई अपेक्षाएँ। हम अपने लिए मानक तय करते हैं—हम ऐसे हों, इतना कर लें, यहाँ तक पहुँच जाएँ—और जब परिस्थितियाँ, समय या हमारी क्षमता उस अपेक्षा के अनुरूप नहीं चल पाती, तब मन स्वयं को दोषी ठहराने लगता है। यह आत्म-आलोचना धीरे-धीरे अपराधबोध, हीनता और थकान में बदल जाती है। बाहर की अपेक्षाएँ टकराव पैदा करती हैं, जबकि स्वयं से की गई अपेक्षाएँ भीतर ही भीतर मन को तोड़ती हैं।

जिज्ञासा-क्षुधा-शान्ति के स्तर पर यह समझ अत्यंत महत्वपूर्ण है कि अपेक्षा और प्रयास में अंतर है। प्रयास कर्म से जुड़ा होता है, जबकि अपेक्षा परिणाम से बँधी होती है। जब मन प्रयास पर केंद्रित रहता है, तो वह सक्रिय और संतुलित रहता है; पर जब वह अपेक्षा में उलझता है, तो परिणाम के भय और लालच में फँस जाता है।

जिज्ञासा तब शांत होती है, जब मन यह स्वीकार कर लेता है कि दूसरों की सीमाएँ भी हैं और मेरी भी। स्वयं से अपेक्षा रखने के स्थान पर स्वयं को समझना, स्वीकार करना और विकसित करना अधिक करुणामय मार्ग है। इसी स्वीकार में मन की क्षुधा तृप्त होती है, क्योंकि तब जीवन बोझ नहीं, एक सीखने की प्रक्रिया बन जाता है।

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