सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कविता वाचन एवं सुलेख प्रतियोगिता

भूमिका 

उलझन–सुलझन मासिक, मेरठ और साहित्य मंच टोडारायसिंह की संयुक्त पहल के अंतर्गत आयोजित कविता वाचन एवं सुलेख प्रतियोगिता मात्र एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में भाषा, अभिव्यक्ति और पुस्तक-पठन की परंपरा को पुनर्जीवित करने का एक सशक्त प्रयास है। आज के समय में जब बच्चों की वाचन-शुद्धता और सुलेखन-कला धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही है, तब ऐसे कार्यक्रम न केवल उनकी प्रतिभा को उजागर करते हैं, बल्कि उनमें आत्मविश्वास, सौंदर्य-बोध और रचनात्मकता के नए द्वार भी खोलते हैं। इस पहल के संयोजक श्री शिवराज कुर्मी ने विद्यालयी परिवेश में साहित्यिक संवेदना जगाने की जो योजना बनाई, वह शिक्षा और संस्कृति को एक साथ जोड़कर बच्चों में नई चेतना का संचार करती है।

कविता वाचन एवं सुलेख प्रतियोगिता

साहित्य मंच टोडारायसिंह के संयोजक श्री शिवराज कुर्मी द्वारा उलझन–सुलझन मासिक, मेरठ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कविता वाचन एवं सुलेख प्रतियोगिता का उद्देश्य विद्यालयी विद्यार्थियों में घटती वाचन-शुद्धता, सुलेखन-कौशल और पुस्तक-पठन की आदत को पुनर्जीवित करना था। इसके लिए उन्होंने विद्यालय चयन से लेकर प्रतियोगिता की श्रेणियाँ तय करने, नियम बनाने और बच्चों में उत्साह जगाने तक सारी तैयारी बड़े मनोयोग से की। माध्यमिक सरस्वती विद्या मंदिर को इसलिए चुना गया कि यहाँ साहित्यिक गतिविधियों में बच्चों की स्वाभाविक रुचि है और विद्यालय का वातावरण ऐसे आयोजनों के अनुकूल है। उन्होंने कविता वाचन और सुलेख—दोनों प्रतियोगिताओं को कक्षानुसार विभाजित किया ताकि हर आयु वर्ग के विद्यार्थी सहजता से भाग ले सकें।

प्रतियोगिता से पूर्व शिवराज जी स्वयं कक्षाओं में जाकर बच्चों से संवाद करते रहे, उन्हें इस आयोजन का उद्देश्य समझाया और दैनिक अभ्यास की प्रेरणा दी। शिक्षकों के सहयोग से विद्यार्थियों में नई ऊर्जा उत्पन्न हुई। बच्चों को अभ्यास हेतु साहित्यिक पोस्टर, पेन व कॉपियाँ भी उपलब्ध कराई गईं, जिससे उनमें प्रतिस्पर्धा ही नहीं, बल्कि सीखने की लालसा भी बढ़ी। उन्होंने कविता वाचन के लिए शुद्ध उच्चारण, भावाभिनय और वाचन गति जैसे मापदंड निर्धारित किए, जबकि सुलेख के लिए अक्षर-सौंदर्य, संतुलन और प्रस्तुति जैसे पहलुओं पर विशेष ध्यान देने की योजना बनाई।

कार्यक्रम के दिन संयोजक द्वारा बच्चों को पुस्तक और भाषा के प्रति प्रेम पर प्रेरक संदेश देते हुए प्रतियोगिता का शुभारंभ हुआ। पहले सुलेख प्रतियोगिता आयोजित की गई, जिसमें सभी प्रतिभागियों को समान समय और शांत वातावरण प्रदान किया गया। इसके बाद कविता वाचन का सत्र प्रारंभ हुआ, जहाँ बच्चों ने मंच पर आत्मविश्वास से अपनी प्रस्तुति दी। विद्यालय के शिक्षकों—निर्मला सैनी, सुरेन्द्र पारीक, निर्मला बैरवा तथा कार्यवाहक प्रधानाचार्य सत्येन्द्र शर्मा—ने निष्पक्ष मूल्यांकन करते हुए दोनों प्रतियोगिताओं के परिणाम तैयार किए। विजेताओं को साहित्य मंच टोडारायसिंह द्वारा सम्मानित किया गया और बच्चों के उत्साह को खुलकर सराहा गया।

आयोजन के बाद शिवराज कुर्मी ने यह सुनिश्चित करने के लिए एक फॉलो-अप योजना तैयार की कि यह कार्यक्रम केवल एक दिन की गतिविधि न रह जाए बल्कि बच्चों की भाषा और लिखावट पर स्थायी प्रभाव छोड़े। इसके लिए मासिक अभ्यास समूह बनाने, विद्यालय पुस्तकालय में कविता-पुस्तकें बढ़ाने, त्रैमासिक छोटी प्रतियोगिताएँ करवाने, और उत्कृष्ट प्रतिभाओं को जिला स्तर तक पहुँचाने की दीर्घकालिक योजना बनाई गई। साथ ही, उलझन–सुलझन मासिक में विद्यार्थियों की रचनाएँ प्रकाशित करने का निर्णय लिया गया, जिससे बच्चों को अपनी प्रतिभा को व्यापक मंच पर दिखाने का अवसर मिले।

झलकियाँ 







सूचना स्रोत 

श्री शिवराज जी कुर्मी

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 




शिवराज कुर्मी की यह कार्ययोजना केवल एक प्रतियोगिता तक सीमित नहीं है, बल्कि टोडारायसिंह क्षेत्र में साहित्यिक संस्कृति को मजबूत करने की एक व्यापक सोच है, जिसमें बच्चों के व्यक्तित्व-विकास, अध्ययन-संस्कार और भाषाई सौंदर्य को केंद्र में रखा गया है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

"मां की गोद से ऊंचाइयों तक — गिरिराज की आत्मकथा"

  मां की गोद से ऊंचाइयों तक  गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..."   यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा।   जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है।   मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।"  यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया।   लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...

દીપક પંડ્યા (ગાંધીનગર) - Updated 04.06.2026

મારી ભાવયાત્રા 64 નમસ્કાર … સ્નેહવંદન ! માનવ જીવનની આખીય દોડ પાછળ જો કોઈ એક જ આકાંક્ષા છુપાયેલી હોય, તો તે છે 'ખુશી'. સવારથી સાંજ સુધી માણસ જે કંઈ પણ કરે છે—પૈસા કમાય છે, સત્તા મેળવે છે, સંબંધો બાંધે છે—એ બધાની પાછળનો અંતિમ ઉદ્દેશ્ય માત્રને માત્ર સુખ અને આનંદની પ્રાપ્તિ જ હોય છે. પરંતુ આજના ભૌતિકવાદી યુગમાં માણસ ખુશીની વ્યાખ્યા ભૂલી ગયો છે. તે વિચારે છે કે મેળવવામાં, સંગ્રહ કરવામાં કે અન્ય પાસે અપેક્ષા રાખવામાં ખુશી છે. પણ સત્ય એનાથી તદ્દન વિપરીત છે. સાચી ખુશી આપવામાં છે, લેવા કે માંગવામાં નથી. આ સૃષ્ટિનો અપરંપાર નિયમ છે કે ખુશીની આપણે જેટલી લહાણી કરીશું, તેટલી જ તે આપણી પાસે વ્યાજ સાથે પાછી આવશે. જરા ઊંડાણથી વિચારીએ તો સમજાશે કે 'લેવું' અને 'માંગવું' એ ભિખારીપણું છે, જ્યારે 'આપવું' એ ખુદ અમીરી છે. જ્યારે આપણે કોઈની પાસે કંઈક માંગીએ છીએ, પછી ભલે તે વસ્તુ હોય, પ્રેમ હોય કે આદર હોય, ત્યારે આપણે આપણી જાતને ખાલી અનુભવીએ છીએ. માંગવામાં હંમેશા અપેક્ષા અને પરવશતા હોય છે. અને જ્યાં અપેક્ષાઓનો પહાડ હોય, ત્યાં ક્યારેય સાચો આનંદ હોઈ શકે નહીં. કારણ કે અપેક્ષા હંમેશા...

मन की बातें भाव भरी

🙏🌹🌹❤️❤️🙏 शुभ प्रभात जी🙏🌹❤️🙏 आपका दिन मंगलमय हो। ईश्वर आपकी हर मंगलकामना पूर्ण करें— वह जो हारे का सहारा है, जो टिमटिमाता जुगनू भी है और अथाह ऊर्जा से भरा तारा भी। जो घोर तिमिर में प्रकाश बनकर उभरता है, और उजाले में भी दिन को बहार देता है। वह जो आकार–निराकार दोनों रूपों में दुष्टों का संहारक है, जो दिशाहीन के लिए दिशासूचक यंत्र का पारा बन जाता है। जो निर्धन के दुःख–दरिद्रता का अंत है, और धनी के लिए पौ-बराहा। जिसके हम भी हैं और जो हमारा भी है। जो भूखे के लिए अन्न है और पशुओं के लिए चारा, जो पत्थर, पहाड़ और समूची धरा का आधार है। 🌹 वह सबका भला करें🌹 🙏🌹🌹❤️❤️🙏 आज का विचार मेरी पुस्तक “हृदय उद्गार” से एक कविता — सर्व धर्म समभाव छिन्न-भिन्न सा हृदय मेरा, मन में तूफानी कोलाहल है। सभ्यता के शिखर पर पहुँचकर, धर्म बना क्यों क्रूर दावानल है? भूमि वही, आकाश वही, तुझमें वही, मुझमें वही। एक-सा ही सबका आंचल है, धरती माँ का पावन आँचल है। रक्त-कोष में बहता एक ही बल है, कहीं केसरिया, कहीं हरित दल है। आब पियो या पानी पियो, जल तो आखिर एक ही जल है। यह कैसा आया भेद-रूपी पल है? भिन्न-भिन्न नामों म...