भूमिका
यह अनुभव मेरे लिए केवल एक साहित्यिक गतिविधि नहीं, बल्कि उस सोच का विस्तार था जिसमें बच्चे, विद्यालय और साहित्य—तीनों आपस में एक गहरे अंतर्संबंध से जुड़े दिखाई देते हैं। जब साहित्य मंच टोडारायसिंह के माध्यम से हम स्वामी विवेकानंद राजकीय मांडल स्कूल जैसे संस्थानों में पहुँचते हैं, तो महसूस होता है कि साहित्य केवल पुस्तकों में सिमटा विषय नहीं, बल्कि बच्चों की समझ, संवेदना और अभिव्यक्ति को दिशा देने वाला जीवंत माध्यम है। यही कारण है कि वरिष्ठ साहित्यकार लाड़ो कटारिया जी की संपादित पुस्तक “जीवन पथ पर” से ‘प्रायश्चित्त’ जैसी कहानी का प्राथमिक कक्षा की बालिका द्वारा वाचन, बच्चों के मन और साहित्य के बीच एक सुंदर सेतु के समान प्रतीत हुआ—जहाँ सुनना, समझना और सीखना सहज रूप से एक-दूसरे को पोषित करते हैं।
श्री शिवराज जी कुर्मी का आत्मकथ्य
जब से मैंने साहित्य मंच टोडारायसिंह के साथ काम करना प्रारंभ किया है, मेरी एक ही भावना रही है—
“बच्चों में साहित्य का संस्कार जितनी जल्दी पड़े, उतना ही उनका चिंतन परिपक्व होता है।"
इसी विश्वास के साथ हम विद्यालयों में साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं।
इसी क्रम में, आज स्वामी विवेकानंद राजकीय मांडल स्कूल, टोडारायसिंह में एक अत्यंत प्रेरक आयोजन हुआ। वरिष्ठ साहित्यकार लाड़ो कटारिया, गुरुग्राम (हरियाणा) द्वारा संपादित पुस्तक “जीवन पथ पर” से ‘प्रायश्चित्त’ कहानी का वाचन प्राथमिक कक्षा की एक बालिका द्वारा किया गया।
मुझे यह देखकर हृदय से प्रसन्नता हुई कि इतनी छोटी उम्र में भी बच्चों में कहानी कहने और समझने की अद्भुत क्षमता विकसित हो रही है। अक्सर यह देखा गया है कि कहानी सुनने से बच्चे उसे जल्दी आत्मसात कर लेते हैं, और साथ ही इससे उनकी पठन-अभिव्यक्ति, स्पष्ट उच्चारण और आत्मविश्वास का भी पता चलता है।
कहानी-वाचन के दौरान सभी बच्चे एकाग्र होकर बैठे थे, उनकी आँखों में उत्सुकता और मन में आनंद स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
ऐसे क्षण मुझे यह विश्वास दिलाते हैं कि साहित्यिक संस्कार ही बच्चों के भविष्य की मजबूत नींव रखते हैं।
इस आयोजन ने यह सिद्ध कर दिया कि यदि मंच और मार्गदर्शन सही हो, तो बच्चों की कल्पना और अभिव्यक्ति दोनों ही ऊँचाई छू सकती हैं।
सूचना स्रोत
शिवराज जी कुर्मी
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति



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