वर्तमान दौर में यद्यपि समाज/राष्ट्र विकास के नित नए कीर्तिमान गढ़ रहा है, जीवन स्तर में सुधार, जीवन प्रत्याशा में वृद्धि, आर्थिक स्थिति में सुदृढ़ता, तकनीकी विकास, संचार क्रांति में बढ़ते कदम, आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते क़दम, विशाल मानव शक्ति। ये कुछ ऐसे मानक हैं जो विकसित समाज और राष्ट्र के लिए आरंभिक शर्तें हैं; लेकिन दूसरी ओर समाज में संवेदनाओं में कमी, जीवन मूल्यों में छीजत, संवादहीनता, अंतहीन दिशा की तरफ दौड़, गलाकाट प्रतिस्पर्धा। ये कुछ ऐसे तथ्य हैं जो मानव द्वारा किए गए विकास पर प्रश्न चिह्न लगाने को पर्याप्त हैं।
अब, प्रश्न उठता है कि
आखिर! इन सबका जिम्मेदार आख़िर कौन है?
जवाब भी सीधा-सा है कि इन सबके लिए जिम्मेदार हम सब, समाज और व्यवस्था है।
दरअसल हमारी पीढ़ी और कुछ हद तक हमसे पहली पीढ़ी ने भी , सपने देखे; उन सपनों को पूरा करने का जतन भी ख़ूब किया, जब वे सपने पूरे न हुए तो उन सपनों की गठरी अपने गले में डाल दी। रात-दिन, खाते-पीते, उठते-बैठते उन सपनों के विषय में सोचते रहे। अफ़सोस करते रहे। काश!वह सपना पूरा हो जाता; लेकिन सपने पूरे न सही, हार न मानी । एक बार उन अधूरे सपनों को पूरा करने का माध्यम बनाया अपनी औलाद को। यह सोचा कि हम न सही, हमारी औलाद तो वह बनेगी जो हम बनना चाहते थे। हां, बेचारी वह औलाद! जिसके माँ के गर्भ में आते ही मां बाप ही नहीं परिजनों द्वारा अपने सपनों को पूरा करने का पाठ पढ़ाया जाता है; यही नहीं , जिसके जन्म से पहले ही यह तय कर लिया जाता है कि उसे किस स्कूल में दाखिला दिलाया जाएगा और वह क्या बनेगा या बनाया जाएगा। वगैरह, वगैरह। और! जन्मते ही तो उस पर अपेक्षाओं का बोझ लाद दिया जाता है। जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, परिजनों के सपनों को पूरा करने का बोझ उस नन्हीं मासूम जान पर लाद दिया जाता है। जिन हाथों में खिलौने होने चाहिए उन हाथों में समय से पहले ही किताब, कॉपी, पेंसिल थमा दी जाती है। बेचारा मासूम....।
आज बच्चों का चेहरा देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि उनका बचपन जैसे कहीं खो गया है। बचपन तो उनसे कोसों दूर चला गया है। उन पर सपने थोपे जा रहे हैं। हरेक किसी को उससे अनेक अपेक्षाएं हैं, अकेले मां बाप या परिजन ही नहीं, शिक्षक, मित्रगण, समाज सभी तो कुछ न कुछ अपेक्षा पाले बैठा है। उसे क्या करना है?, उसकी क्या पसंद - नापसंद है?, उन्हें क्या विषय चुनना चाहिए?, किस दिशा में जाना है? ये सब कुछ माँ-बाप ही तो तय करने लगे हैं।
मां-बाप यह भी भूल जाते हैं कि प्रत्येक बच्चा एक निश्चित उद्देश्य लेकर जन्मता है, उसकी एक निश्चित नियति होती है लेकिन अपने सपनों को पंख लगाने की अंधी दौड़ में यह सब कुछ गौण हो जाता है, वह ख़ुद भाग्य नियंता बन बैठते हैं। भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ.ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने अपनी पुस्तक अग्नि की उड़ान (Wings of Fire) में लिखा है
"ईश्वर की सृष्टि में प्रत्येक कण का अपना अस्तित्व होता है। प्रत्येक को कुछ न कुछ करने के लिए ही परवरदिगार ने बनाया है।"
लेकिन आज मां-बाप या परिवारीजन इन सबमें विश्वास नहीं करते।उनका मानना है कि बच्चे की भलाई किसमें है यह वे स्वयं तय करेंगे।और! फिर अपने बच्चे से भी वही सब अपेक्षाएं होने लगी हैं, जैसा पड़ोस का उसका हमउम्र कर रहा है या उसकी कक्षा में अन्य बच्चे कर रहे हैं। अन्य की देखादेखी एक आयु के पश्चात् कोचिंग रूपी फैक्ट्री में उसे भेज दिया जाता है, मानो कोई इंसान न हो कच्चा माल हो जो परिष्कृत होकर नए रूप में सामने आएगा। और! इंजीनियर, डॉक्टर या कुछ और बनकर ही सामने आएगा। वह बच्चा कोचिंग में एडमिशन ले तो लेता है, मां-बाप या परिजनों के चाहने पर; लेकिन अधिकांश बच्चे स्वयं से ही संघर्ष करते हुए नज़र आते हैं।मां बाप से तो जब भी संवाद होता है ,उनका यही प्रश्न होता है: टेस्ट में क्या स्कोर चल रहा है? इस बार क्या रैंक रही? अबकी बार क्लियर तो कर लेगा न !और हां रुपयों पैसों की जरूरत हो तो भेज देंगे।कोई उससे यह नहीं पूछता कि उसे क्या कोई तकलीफ़ है,घर की याद तो नहीं सता रही,मन करे तो एक दिन के लिए ही सही घर चला आ ।उसे तो त्यौहार पर भी घर आने की मनाही कर दी जाती है।किसी रिश्तेदारी में शादी समारोह क्या होता है वह तो यह भी नहीं जानता।बस एक मशीन की तरह रात दिन चलते रहना है और उन सपनों को पूरा करना है जो उसने नहीं देखे हैं,उसने उनका चयन नहीं किया है।बल्कि उसके मां बाप,परिवारजन ने वह सपने देखे हैं और माध्यम बनाया है अपनी औलाद को।वह अपनी व्यथा,अपनी पीड़ा कहना चाहता है,अपनी भावनाओं से अवगत कराना चाहता है,वह क्या बनना चाहता है यह बताना चाहता है ।अफ़सोस! बताए किसे ।वहां तो सब बहरे हैं।वही सुनना चाहते हैं ,जो उन्हें पसन्द है,बच्चों को भी वही सब कहने की आज़ादी है जैसा मां बाप चाह रहे हैं,सोच रहे हैं।आखिर सब तरफ से टूट चुका किशोर जिसकी पुकार सुनने को कोई तैयार नहीं है।परेशान ,हैरान है।ईश्वर की बनाई इस खूबसूरत दुनिया से वह जल्द ही ऊबने लगता है।वह करे भी तो क्या करे।सबको परिणाम चाहिए । उसे क्या चाहिए,उसके मन में क्या कुछ है ।इसे सुनने को ,समझने को कोई तैयार नहीं है। चारों तरफ़ से प्रश्नों की बौछार... ।उसकी असफलता पर घायल मन को संवेदना रूपी मरहम के बजाए चारों तरफ से उसे घेर लिया जाकर जले पर नमक छिड़कने का काम किया जाता है जिसकी शुरुआत घर से,अपनों से होती है।तुम किसी काम के नहीं,तुम्हारे साथी को देखो ,हमारी जमा पूंजी सब तुम पर लगा दी,तुम कुछ नहीं कर सकते ,और भी न जाने किन किन उपाधियों से विभूषित किया जाता है। वह जाए भी तो कहां ।निराश होकर फिर वह ऐसा कदम उठाता है जिसकी कल्पना से रूह तक कॉप उठती है और फिर उन माँ-बाप ,परिजनों के पास जीवन भर अफसोस करने के सिवाय कुछ नहीं रह जाता। दूसरी तरफ यदि माँ-बाप के सपनों पर बच्चे खरा उतर भी जाते हैं।उनके सपनों को पूरा कर भी देते हैं तो एक बार सफलता का स्वाद क्या चखा, घर की दहलीज पार करने के बाद वापिस मुड़ कर नहीं देखते।
यह समस्या केवल महानगरों तक ही सीमित न रही ,अब तो कस्बे और गांव भी इससे दो चार हो रहे हैं।मां बाप वृद्धावस्था में उन बच्चों की राह तकते-तकते परलोक गमन तक कर जाते हैं, बच्चे उनके अंतिम संस्कार में सम्मिलित होने तक के लिए समय ही नहीं निकाल पाते।आज के दौर में यह समस्या आम हो गई है। जिस आयु में बच्चों को रिश्तों के प्रति संवेदनशील होना,एक दूसरे के लिए सोचना,दूसरे के मनोभाव का सम्मान करना सिखाया जाना था तब उसे रेस के घोड़े की तरह सिर्फ़ और सिर्फ़ रेस में दौड़ना और जीतना सिखाया जाता रहा।और उम्र के एक पड़ाव पर जब उससे कुछ लेने की बारी आती है तब परिवार ,समाज का भ्रम टूटता है ।और एक असंवेदनशील व्यक्ति सामने होता है। आज मां की चिता पर स्वयं लेटकर अपना हिस्सा लेने की शर्त पूरी होने पर ही मृत शरीर को मुखाग्नि देने जैसी दिल दहला देने वाली घटनाएं देखी सुनी जा रही हैं।यही नहीं बुढ़ापे में वृद्ध मां बाप पांवों की बेड़ियां न बनें ,उनके लिए वृद्धाश्रम तलाशे जाने लगे हैं।इससे भी बदतर स्थिति,बीमार मां बाप को किसी मंदिर या अनाथालय अथवा किसी रेलवे स्टेशन,बस अड्डे ,तीर्थ स्थल में छोड़ देने जैसी घटनाएं मन को कचोटती हैं।और विकसित हो रहे समाज के इस दोहरे चरित्र पर देर तक सोचने को मजबूर करती हैं।
आखिर इन सबके लिए कौन है दोषी ? माँ-बाप, समाज, व्यवस्था या फिर बच्चे...? बच्चों पर अपने सपने थोपने का अंजाम क्या होता है?
मां बाप के ऊंचे सपनों की उड़ान का क्या परिणाम होता है?
क्या हरेक बच्चा वही सब बनेगा जैसा उसकी हमउम्र के अन्य बच्चे कर रहे हैं?
क्या बच्चे सिर्फ़ अच्छे अंक लाने की मशीन मात्र हैं?
क्या बच्चों के भीतर एक नन्हे ,मासूम दिल की पुकार सुनने वाला कोई है,जो उसे वैसा करने दे जो वह चाहता है?
फिर बच्चे सफल हो भी जाएं,उन सपनों को पूरा कर भी लें जो कभी मां बाप ने देखे थे।क्या गारंटी है कि वही बच्चे सफल और संवेदनशील इंसान बन सकेंगे और समाज के कमजोर,मजबूर लोगों के आंखों में आए आंसुओं को देख उनका दिल पसीजेगा या फिर रिश्तों के लिए समय निकाल सकेंगे?
दरअसल आज घर परिवार की महत्वपूर्ण इकाई बच्चे और वृद्धजन दोनों ही इस समस्या को झेल रहे हैं।दो चार हो रहे हैं।यह बात अलग है कि इन सबके लिए दोषी कौन है।हम स्वयं या हमारी बढ़ती महत्वाकांक्षाएं।कुछ भी हो प्रभावित तो घर परिवार और समाज हो रहे हैं।आने वाले समय में यह स्थिति और अधिक भयावह होगी।यदि समय रहते हम संभले नहीं तो....।
बस ,इन्हीं कुछ प्रश्नों की पड़ताल करता मेरा आगामी उपन्यास " अनकही पीर" जो पाँच खण्डों में विभाजित है।शीघ्र ही आपके हाथ में होगा।
आशा है मेरे स्नेही पाठकों को मेरे पूर्व के उपन्यास: रिश्तों की आंच,वसीयत,नियति चक्र ,ये कैसा रिश्ता,सांध्य पथिक,कहानी संग्रह :पापा फिर कब आओगे एवम् संस्मरण :मेरी ईजा की तरह यह उपन्यास अनकही पीर भी पसन्द आएगा।
इतना अवश्य सकूंगा बतौर लेखक कि आज की पीढ़ी के मां बाप को एक बार इस उपन्यास को ज़रूर पढ़ना चाहिए।
डॉक्टर सूरज सिंह नेगी
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