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कोऑर्डिनेटर सुशील कुमार का आत्मकथ्य

भूमिका

समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब प्रत्येक व्यक्ति स्वास्थ्य, शिक्षा और जागरूकता जैसे मूलभूत अधिकारों तक सहज रूप से पहुँचे। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी अक्सर लोगों को समय पर उपचार से दूर कर देती है, विशेषकर नेत्र-स्वास्थ्य के मामले में। ऐसे समय में सामाजिक संस्थाओं द्वारा आयोजित निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर जन-कल्याण की आशा बनकर सामने आते हैं।

इन्हीं प्रयासों की शृंखला में कृपा फाउंडेशन गाज़ियाबाद द्वारा आयोजित यह नेत्र-जांच शिविर न केवल सेवा का एक माध्यम था, बल्कि मेरे लिए—एक कोऑर्डिनेटर होने के नाते—मानवता के प्रति अपने कर्तव्य को आत्मसात करने का अवसर भी। यह आत्मकथ्य उसी दिवस की अनुभूति का लेखा-जोखा है।

कोऑर्डिनेटर सुशील कुमार का आत्मकथ्य

“सेवा केवल एक कार्य नहीं, बल्कि एक भाव है”—यह विचार हमेशा मेरे मन में बसता है और शायद यही कारण है कि कृपा फाउंडेशन के हर कार्यक्रम में मैं पूरे मन-प्राण से जुड़ पाता हूँ।

28 नवंबर 2025 का दिन मेरे लिए विशेष था। कृपा फाउंडेशन गाज़ियाबाद के अध्यक्ष डॉ. महिपाल सिंह जी के मार्गदर्शन में, डॉ. श्राप चैरिटी आई हॉस्पिटल, मनानी (सहारनपुर) के सहयोग से हमने कृपा ग्राम बहादरपुर में एक नि:शुल्क नेत्र-जाँच शिविर का आयोजन किया।

सुबह शिविर की तैयारी के दौरान गाँव के लोगों की उम्मीद भरी आँखें देख मैंने अनुभव किया कि यह कार्य मात्र आयोजन नहीं, बल्कि विश्वास का दायित्व है।

शिविर में कुल 23 लोगों ने अपनी आँखों की जाँच कराई। जब विशेषज्ञ टीम ने इनमें से 4 मरीजों को ऑपरेशन के लिए चिन्हित किया, तो मन में एक संतोष का भाव आया कि हमारी छोटी-सी पहल किसी के जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकती है।

इन मरीजों में अहमदपुर, सकतपुर, बहादरपुर, नसरतपुर, सढ़ोली हरिया जैसे कई गाँवों के लोग शामिल थे—यह जानकर खुशी हुई कि हमारा प्रयास कई गाँवों तक पहुँचा।

शिविर को सफल बनाने में अस्पताल की टीम का अनुकरणीय योगदान रहा—विजन टेक्नीशियन शालिनी जरावरे और रजनी सहगल, काउंसलर योगिता, तथा सहयोगी संजय, राजीव, विकास और पवन।

उनका समर्पण देखकर मुझे अपना दायित्व और भी महत्त्वपूर्ण महसूस हुआ। व्यवस्था से लेकर लोगों को समझाने तक, हर कदम पर हमने एकजुट होकर कार्य किया।

एक कोऑर्डिनेटर होने के नाते मेरी सबसे बड़ी सीख यह रही कि सामाजिक कार्य तभी सार्थक होता है जब उसमें मनुष्यता की छाप हो।

इस शिविर ने न केवल लोगों को दृष्टि दी, बल्कि मुझे भी यह एहसास कराया कि सेवा का हर पल हमें भीतर से रोशन करता है।

यह दिन मेरे लिए केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि “मनुष्य होने का अर्थ” समझने का अवसर था।




सूचना स्रोत 

कॉर्डिनेटर सुशील कुमार

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 




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