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'सीखने की कोई उम्र नहीं होती' ऐसा मानना है भीकम जी का

🌟 अपना या किसी का भी मार्गदर्शक बनना ही असली सफलता 

सफलता केवल पुरस्कार, पद, या प्रसिद्धि तक सीमित नहीं होती। सच्ची सफलता तो तब प्राप्त होती है जब किसी की प्रेरणा से किसी और का जीवन दिशा पा ले — जब हम किसी के भीतर की रोशनी जगाने का माध्यम बन जाएँ।  

आज के युवाओं को यह समझना आवश्यक है कि जीवन का हर मोड़ एक नया आरंभ हो सकता है, यदि भीतर सीखने और सिखाने की आग जीवित रहे। यही भावना तब साकार रूप लेती है जब कोई व्यक्ति स्वयं के अनुभवों को समाज के हित में रूपांतरित कर देता है। 

इसी विचार को अपने जीवन में साकार किया है भीकम सिंह जी ने।  

शिक्षण से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उन्होंने ठहराव नहीं चुना, बल्कि अपनी रचनात्मक चेतना को नया मार्ग दिया। भूगोल के अध्यापक से वे हिंदी साहित्य के चिंतक और लेखक बने — एक ऐसा परिवर्तन जो यह सिद्ध करता है कि उम्र कभी सीमा नहीं, केवल सोच का विस्तार होती है।  

उन्होंने हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर अध्ययन कर साहित्य की गहराइयों को समझा और देखते ही देखते कई पुस्तकों की रचना कर डाली। आज भी वे निरंतर नए विषयों पर चिंतनशील और सक्रिय हैं — मानो जीवन की हर साँस उनके लिए एक नई पंक्ति का आरंभ हो।

उनका जीवन हमें सिखाता है कि सेवानिवृत्ति अंत नहीं, बल्कि आत्म-अभिव्यक्ति का स्वर्णिम अवसर है।  

आज के तेज़ रफ्तार दौर में जब युवा वर्ग त्वरित सफलता की दौड़ में थकता जा रहा है, ऐसे में भीकम सिंह जैसे व्यक्तित्व यह याद दिलाते हैं कि स्थायित्व, संतोष और सार्थकता का मार्ग मार्गदर्शन से होकर गुजरता है।  

एक प्रशिक्षक, लेखक या कोच केवल अपना करियर नहीं बनाता — वह भविष्य की पीढ़ियों की नींव तैयार करता है। वह अनुभव को अभिव्यक्ति में और ज्ञान को प्रेरणा में बदल देता है।

इसलिए, यदि आप अपने जीवन में ऐसी छाप छोड़ना चाहते हैं जो दूसरों को भी आगे बढ़ने का हौसला दे —  

तो किसी को सिखाने, दिशा देने या लिखने का साहस करें। 

यही वह मार्ग है जहाँ व्यक्तिगत उपलब्धि, सामूहिक विकास में रूपांतरित हो जाती है।  

क्योंकि सफलता की सबसे ऊँची सीढ़ी वही है — जहाँ आप स्वयं चमकते हैं, और दूसरों को भी रोशनी देते हैं।



'सीखने की कोई उम्र नहीं होती' ऐसा मानना है भीकम जी का

प्रश्न १. आपने शिक्षण सेवा से सेवानिवृत्ति के बाद लेखन को अपना नया मार्ग चुना। इस बदलाव की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?  

उत्तर: शिक्षण के दौरान विद्यार्थियों से संवाद करते हुए हमेशा लगा कि ज्ञान बाँटने से बढ़ता है। जब अध्यापन समाप्त हुआ, तो वह ऊर्जा कहीं रुक न जाए, यही सोचकर मैंने लेखन को अपना नया माध्यम बनाया। शब्दों के ज़रिए वही काम जारी है — सीखना और दूसरों को कुछ सिखा जाना। साहित्य लेखन की तरफ मेरा रुझान विश्वविद्यालयी शिक्षा के आरम्भ से ही था, बाद में अध्यापन (नौकरी) की परिस्थितियों के चलते साहित्य लेखन बंद करना पड़ा और भूगोल विषय पर ही फोकस रहा।

प्रश्न २. भूगोल जैसे विषय से निकलकर हिंदी साहित्य की ओर आना एक बड़ा परिवर्तन है। क्या यह निर्णय कठिन था?  

उत्तर: नहीं, बल्कि यह जीवन का सबसे सहज निर्णय था। भूगोल ने मुझे धरती के आयाम सिखाए, और साहित्य ने मनुष्य के आयाम दिखा दिए। दोनों ही अध्ययन के क्षेत्र हैं — फर्क सिर्फ़ विषय का नहीं, दृष्टिकोण का है। मैंने अपने अनुभवों को शब्दों में ढालना शुरू किया, और वही मेरा नया अध्याय बन गया। विषय तो सभी अच्छे होते हैं, भूगोल तो मेरे लिए जीविका का साधन भी बना। भूगोल में मेरा शोधकार्य भी प्रकाशित हुआ और पच्चीस शोध पत्र विभिन्न शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुए, लेकिन आत्मसंतुष्टि साहित्य प्रकाशन से मिलना शुरू हुई।

प्रश्न ३. लेखन की यात्रा में आपने किन विषयों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया?  

उत्तर: मेरी लेखनी मनुष्य और समाज के संबंधों, शिक्षा, और नैतिक मूल्यों पर केंद्रित रहती है। मुझे लगता है कि साहित्य का कार्य केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि संवेदनशीलता को जागृत करना भी है। आज जब लोग तेज़ी से आगे बढ़ना चाहते हैं, तब ठहरकर सोचने की कला बहुत आवश्यक है — यही भाव मेरी रचनाओं का केंद्र है।

कविता लिखी हैं, हाइकु, ताँका, चोका पर मेरी पुस्तक आई है, लेकिन यह चुनौतीपूर्ण है, इनके पाठक कम हैं। गद्य आमतौर पर सभी पढ़ लेते हैं इसलिए अब मेरा लेखन गद्य (यात्रा संस्मरण, लघुकथा, व्यंग्य, शोधपरक लेख) की ओर मुड़ गया है।

प्रश्न ४. आपके अनुसार ‘सच्ची सफलता’ का अर्थ क्या है?  

उत्तर: सच्ची सफलता तब है जब हमारे काम से किसी और के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आए। पद, पुरस्कार, या प्रसिद्धि क्षणिक होती है, परंतु जब कोई कहे कि “आपसे प्रेरणा मिली”, तो वही सबसे बड़ा पुरस्कार होता है। मेरे हिसाब से जब आपके कृत्य से किसी को आनंद की अनुभूति हो, तो वही सच्ची सफलता है।

प्रश्न ५. आपकी दृष्टि में युवाओं को आज किस बात पर अधिक ध्यान देना चाहिए?  

उत्तर: युवाओं को यह समझना चाहिए कि करियर केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवन का निर्माण है। अगर वे अपने भीतर के शिक्षक, कोच या लेखक को पहचान लें, तो समाज में कई नई दिशाएँ खुल सकती हैं। ‘त्वरित सफलता’ से अधिक महत्वपूर्ण है ‘सतत प्रयास’। आज अनुशासन पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

प्रश्न ६. आपने हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर स्तर की पढ़ाई की — उस अनुभव ने आपके लेखन को कैसे प्रभावित किया?  

उत्तर: इस अध्ययन ने मेरी दृष्टि को परिपक्व किया। पहले मैं केवल अनुभव लिखता था, अब विचारों के पीछे दर्शन भी देख पाता हूँ। यह समझ आया कि हर शब्द का अपना संसार होता है, और लेखक का कार्य उस संसार को जीवन देना है। मैंने भूगोल विषय में 1982 में एम. ए. किया और पी-एच. डी. 1992 में, जबकि हिन्दी साहित्य में एम. ए 2023 में किया, पहले एम.ए. के ठीक 31 वर्ष बाद।

प्रश्न ७. सेवानिवृत्ति के बाद सक्रिय रहना कैसे संभव हुआ?  

उत्तर: यदि मन में उद्देश्य हो तो उम्र कभी बाधा नहीं बनती। मैं हर दिन कुछ नया सीखने की कोशिश करता हूँ — कभी किताबों से, कभी लोगों से। सक्रियता भीतर की जिज्ञासा से आती है, बाहर के साधनों से नहीं।  

प्रश्न ८. आपके भविष्य की योजनाएँ क्या हैं?  

उत्तर: मैं चाहता हूँ कि मेरे अनुभव अगली पीढ़ी के लिए प्रेरणा बनें। फिलहाल मैं कुछ नई पुस्तकों पर काम कर रहा हूँ, जिनमें शिक्षा और जीवनदर्शन दोनों का समन्वय होगा। साथ ही, मैं युवा लेखकों को मार्गदर्शन देने की योजना भी बना रहा हूँ। भविष्य तो सुन्दर और सकारात्मक ही होता है।

प्रश्न ९. अंत में, हमारे पाठकों के लिए आपका कोई संदेश?  

उत्तर: हाँ — कभी यह मत सोचिए कि अब देर हो गई।

हर दिन एक नई शुरुआत हो सकता है, बस आपको अपने भीतर की रचनात्मकता को जगाना होगा। जीवन की सबसे ऊँची सफलता वही है, जहाँ आप खुद रोशनी बनकर दूसरों का रास्ता प्रकाशित करें। आप कोई भी कार्य करें, कोई भी पढ़ाई करें, किन्तु अंतर्मन के सौंदर्य के लिए साहित्य (हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू, तमिल, तेलुगु, बांग्ला या कोई भी विदेशी) अवश्य पढ़ें।

✨ यह साक्षात्कार केवल शब्दों में 

नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन में बदल जाता है — जो हमें सिखाता है कि 'सीखने और सिखाने की कोई उम्र नहीं होती।'

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