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श्री लालबहार – समाज की एक अनुकरणीय प्रतिभा

भूमिका

श्री लालबहार – समाज की प्रेरक नज़ीर

28 वर्षों की सेवा और हर इंसान से मिली सीखों ने उन्हें एक ऐसा व्यक्तित्व बना दिया है,
जिसके जीवन में शिकायत का एक पन्ना नहीं
और आभार की अनगिनत शीटें जुड़ी हैं।

संतोष, सहजता और कृतज्ञता से भरा उनका जीवन आज समाज के लिए उदाहरण है।
एक ऐसा मुसाफिर, जिसने जीवन को केवल जिया नहीं—समझ भी लिया।

श्री लालबहार – समाज की एक अनुकरणीय प्रतिभा

(हमारे मध्य के एक ऐसे व्यक्तित्व की जीवनगाथा, जिसने हर इंसान से कुछ न कुछ सीखकर आज का मुकाम पाया)

सरकारी सेवा के 28 वर्ष…

एक लंबा अंतराल, जिसमें केवल समय नहीं बीता—जीवन परिपक्व हुआ, अनुभव गहरे हुए और दृष्टिकोण व्यापक।

श्री लालबहार का यह सफर केवल नौकरी का सफर नहीं था, बल्कि आत्मबोध, आत्मसंयम और आत्मविकास की महायात्रा था।

जब उन्होंने इस पथ पर कदम रखा, तब हसरतों और उम्मीदों का बोझ कंधों पर था। उत्साह था, सपने थे, और अपने आप को साबित करने की बेचैनी भी। लेकिन समय के साथ—अभिलाषाएँ शांत हुईं, अपेक्षाएँ संयमित हुईं और जीवन के अर्थ को पढ़ने की दृष्टि बदल गई।

जीवन ने उन्हें कई बार उलझाया भी—कभी सही गलत लगने लगा, कभी गलत ही सही साबित हो गया। कभी लोगों ने समझाया, कभी गलतफ़हमियाँ भी दीं। लेकिन इस अनवरत प्रवाह में श्री लालबहार ने महसूस किया कि हर व्यक्ति, चाहे वह कुछ क्षणों के लिए मिला हो या वर्षों के लिए, उनकी आत्मा में अपना एक हिस्सा छोड़ गया।

और यही उनकी सबसे बड़ी पूँजी है—हर मनुष्य से कुछ न कुछ सीख लेने की क्षमता।

28 वर्षों की इस यात्रा ने उन्हें बताया कि चिंता तो हमने बस बना रखी थी—असली चिंता करने वाला तो ऊपर बैठा है।

इसलिए अब गंभीरता की जगह सहजता है, भय की जगह संतोष है और भविष्य की अनिश्चितता की जगह भविष्य का उत्साह है।

श्री लालबहार कहते हैं—

“मेरे जीवन का शिकायत वाला कॉलम बिल्कुल खाली है। किसी से कोई गिला नहीं। लेकिन धन्यवाद वाले पन्नों की गिनती नहीं—हर पन्ना उन लोगों से भरा है जो मेरे सफर में आए, मुझे संभाला, मुझे टटोला, मुझे परखा और मुझे गढ़ा।”

वह अक्सर कहते हैं—

“मैं भगवान को देखने का भाग्य शायद न पा सकूँ, लेकिन जीवन में कई लोग ऐसे आए जिन्होंने भगवान का रूप धारण कर मुझे राह दिखाई।”

आज वे बताते हैं कि जीवन अब केवल जीने की प्रक्रिया नहीं रहा; यह आनंद है—पूर्णता है—और स्वयं के होने के भ्रम से बाहर आकर ईश्वर में विलीन होने की यात्रा है।

जीवन उन्हें अब एक पुस्तक की तरह लगता है—हर अध्याय किसी एक व्यक्ति, एक अनुभव, एक सीख का।

और वे बताते हैं कि शीघ्र ही इसी जीवन दृष्टि को वे एक पुस्तक के रूप में समाज के सामने रखेंगे—ताकि जिसने उन्हें संवारा, उनकी सीखें औरों तक भी पहुँचे।

उनकी विचारधारा के दो पंक्तियाँ जैसे उनका जीवन-मंत्र बन गई हैं—

“हर काहु से दोस्ती,

न काहु से बैर।”

सृजक



ऐसे सरल, सहज, अनुभवी, विनम्र और आभार से भरे व्यक्तित्व **श्री लालबहार** समाज की वह अनुकरणीय प्रतिभा हैं,

जिन्होंने यह साबित किया कि—

जीवन हमें वही बनाता है, जिसे हम दूसरों से सीखते हुए बनना चुनते हैं।


उनका सफर जारी है—

लेकिन अब एक बदले हुए, पवित्र और निर्मल दृष्टिकोण के साथ।

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