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कोतवाल धन सिंह जी का स्मरण

भूमिका

इतिहास केवल पुस्तकों में लिखा हुआ अतीत नहीं होता, बल्कि उन अनसुने नायकों की दीर्घ साँसें भी होता है जो समय की धूल में दबकर भी राष्ट्र की आत्मा में धड़कते रहते हैं। 1857 की क्रांति के अद्वितीय योद्धा, क्रांतिनायक धनसिंह कोतवाल जी ऐसे ही वीरों में से एक हैं—जिनकी शहादत जितनी महान है, उतनी ही उपेक्षित भी। उनके सम्मान में आयोजित यह अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी मात्र एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि इतिहास के ऋण से मुक्ति का एक सामूहिक संकल्प थी। इस आयोजन का संचालन करने का सौभाग्य पाकर जो भाव मेरे अंतर में उपजे, वे केवल व्यक्तिगत अनुभूति नहीं—बल्कि उस समाज की प्रतिनिधि भावना हैं जो अपने नायकों को पुनः स्मरण, पुनः प्रतिष्ठित और पुनः गौरवान्वित होते देख रहा है। प्रस्तुत आत्मकथ्य उसी भाव-यात्रा का प्रतिबिंब है।

संचालक संजीव नागर का आत्मकथ्य

27 नवंबर 2025 का दिन मेरे जीवन में स्मरणीय ही नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक उत्तरदायित्व निभाने का अवसर लेकर आया। क्रांतिनायक धनसिंह कोतवाल शोध संस्थान मेरठ द्वारा आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का संचालन करते हुए मैं स्वयं को केवल एक सूत्रधार नहीं, बल्कि उन अनगिनत भावनाओं का वाहक महसूस कर रहा था, जिनमें हमारे महान क्रांतिनायक की अमरगाथा समाई हुई है।

चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ के नेताजी सुभाष चंद्र बोस सभागार में जब प्रदेश और देश के प्रतिनिधि, इतिहास-पुरोधा, प्रबुद्धजन और समाजसेवी एक ध्येय के साथ एकत्र हुए—तो वातावरण इतिहास की धड़कनों से गूंज उठा। मुख्य अतिथि हरियाणा सरकार के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री राजेश नागर जी का यह कथन कि *धनसिंह कोतवाल जी को हरियाणा और भारत के पाठ्यक्रम में शामिल कराने हेतु पत्राचार किया जाएगा*, एक युगांतकारी घोषणा की तरह प्रतीत हुआ। यह वह क्षण था जब लगा कि इतिहास की अनदेखी धारा आज पुनः अपना मार्ग पहचान रही है।

लोनी विधायक नंदकिशोर गुर्जर जी का यह स्वीकार कि *धनसिंह कोतवाल की शहादत जितनी महान है, उतनी ही गुमनामी में रही है*, उस पीड़ा को स्वर देता है जिसे वर्षों से हम सब महसूस करते आए हैं। पूर्व सांसद व प्रतिष्ठित नेतृत्वकर्ता श्री विजयपाल सिंह तोमर जी ने उनके बलिदान को 1857 की क्रांति का मजबूत स्तंभ बताते हुए जिस गंभीरता से उनके योगदान को सामने रखा, वह पूरे सभागार को एक आत्मिक गर्व से भर गया।

कार्यक्रम के दौरान 1857 की क्रांति में दो जेलें तोड़कर 800 से अधिक कैदियों को मुक्त कराने वाले इस अमर योद्धा की कथा जब-जब मुखरित हुई, सभाकक्ष में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति का हृदय आदर और आक्रोश—दोनों से भीग उठा। अंग्रेजों द्वारा उनके गांव पर तोपों से आक्रमण कर 400 से अधिक लोगों की हत्या और दिनों तक शवों को पेड़ों पर लटकाए रखने का दृश्य स्मृति में पुनर्जीवित होता तो स्वर भर्रा उठते।

इस अवसर पर 31 विशिष्ट व्यक्तियों को *क्रांतिनायक धनसिंह कोतवाल सम्मान 2025* से अलंकृत होते देखना मेरे लिए गहरी संतुष्टि का क्षण था। डॉ. अशोक चौधरी, डॉ. वेदपाल सिंह, प्रोफेसर प्रशांत कुमार सहित सभी विशिष्ट सम्मानित जनों के भीतर धनसिंह कोतवाल जी के आदर्शों के प्रति जो समर्पण था—वह इस सम्मान को और भी गरिमामयी बना रहा था।

सभागार में उपस्थित विद्वानों, शिक्षाविदों, समाजरत्नों, ब्रह्मकुमारी बहनों तथा युवाओं की विशाल उपस्थिति इस बात का प्रमाण थी कि यह आयोजन किसी संस्था का कार्यक्रम नहीं—बल्कि समाज की सामूहिक चेतना का जागरण था। शोध संस्थान के चेयरमैन एवं धनसिंह कोतवाल जी के प्रपोत्र श्री तस्वीर सिंह चपराना द्वारा संस्थान की प्रगति और सरकार से की गई मांगों की विस्तृत व्याख्या ने इस ऐतिहासिक दिवस को पूर्णता प्रदान की।

जब मैं मंच पर हर वक्ता, हर विचार, हर भावना को एक सूत्र में पिरोते हुए कार्यक्रम का संचालन कर रहा था—तब मेरे भीतर बार-बार यही भावना जन्म ले रही थी कि धनसिंह कोतवाल जी जैसे नायकों पर कार्यक्रम कर पाना हमारे जीवन का सौभाग्य है, और इसे जन-जन तक पहुँचाना हमारा कर्तव्य।

आज का यह कार्यक्रम केवल एक आयोजन नहीं था—यह एक प्रतिज्ञा थी, कि हम अपने इतिहास को उसके वास्तविक नायकों के साथ पुनर्लिखेंगे। और इस प्रतिज्ञा का विनम्र वाहक बनने का अवसर पाकर मैं स्वयं को धन्य मानता हूँ।

झलकियाँ 














सृजक
श्री संजीव नागर जी
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 



 




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